प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक, कलात्मक और बौद्धिक विरासत से जुड़े कई खास उपहार भेंट किए। इनमें गोवा में आयोजित 2025 FIDE विश्व कप फाइनल की ऐतिहासिक याद संजोए ग्रैंडमास्टर जावोखिर सिंदारोव की मूल हस्तलिखित स्कोरशीट, प्रीमियम कांगड़ा चाय और चंदन से बनी शता तंत्री वीणा शामिल हैं। इन उपहारों के जरिए भारत ने न केवल अपनी विविध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया, बल्कि दोनों देशों के बीच साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को भी रेखांकित किया।
जावोखिर सिंदारोव की मूल हस्तलिखित स्कोरशीट
गोवा में 2025 FIDE विश्व कप फाइनल से ग्रैंडमास्टर जावोखिर सिंदारोव की मूल हस्तलिखित स्कोरशीट उनकी ऐतिहासिक जीत की एक अनूठी स्मृति है। इस स्कोरशीट में उस यादगार फाइनल में चली गई बाजियों की चालों को संरक्षित किया गया है। इसे चमड़े के कवर में रखा गया है, जिस पर जावोखिर सिंदारोव की तस्वीर भी है। यह स्मृति-चिह्न गोवा में हुए ऐतिहासिक FIDE विश्व कप और सिंदारोव की उल्लेखनीय उपलब्धि को यादगार बनाता है।
उज्बेकिस्तान के इस शतरंज प्रतिभावान ने महज 12 साल की उम्र में ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल कर लिया था। वह 2022 में शतरंज ओलंपियाड जीतने वाली उज्बेकिस्तान की टीम का भी हिस्सा रहे। 2025 FIDE विश्व कप के फाइनल में उन्होंने चीन के वेई यी को हराकर इतिहास रच दिया और सबसे कम उम्र के FIDE विश्व कप चैंपियन बने। इस जीत के साथ उन्होंने 2026 कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिए भी क्वालीफाई किया।
लकड़ी के नक्काशीदार बक्से में प्रीमियम कांगड़ा चाय
प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव को लकड़ी से बने खूबसूरती से नक्काशीदार बक्से में प्रीमियम कांगड़ा चाय के दो पैकेट भी भेंट किए। इनमें कांगड़ा फर्स्ट फ्लश ब्लैक टी और कांगड़ा ग्रीन टी शामिल हैं। यह प्रीमियम चाय हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी की विशिष्ट चाय परंपरा और विरासत को दर्शाती है। कांगड़ा में चाय की खेती की शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी।
कांगड़ा फर्स्ट फ्लश ब्लैक टी अपने नाजुक स्वाद, पुष्पीय सुगंध और परिष्कृत खुशबू के लिए जानी जाती है। इसका स्वाद हल्का, सुगंधित और बेहद सूक्ष्म मिठास लिए होता है। वहीं, कांगड़ा ग्रीन टी अपने ताजगी भरे और मधुर स्वाद के साथ हल्के वनस्पति और पुष्पीय सुरों का अनुभव कराती है।
ये दोनों चाय मिलकर कांगड़ा क्षेत्र की विशिष्ट हिमालयी मिट्टी और चाय बनाने की पारंपरिक कारीगरी की झलक पेश करती हैं। यह उपहार हिमाचल प्रदेश की चाय विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने के साथ भारत की विविध कृषि और शिल्प परंपराओं का भी प्रतिनिधित्व करता है।
चंदन की शता तंत्री वीणा ने जोड़े संगीत के तार
राष्ट्रपति मिर्जियोयेव को दिया गया एक और खास उपहार चंदन से बनी शता तंत्री वीणा है, जिसे संतूर के नाम से भी जाना जाता है। यह वाद्ययंत्र भारत की समृद्ध संगीत विरासत को चंदन की नक्काशी की बारीक और कलात्मक कारीगरी के साथ जोड़ता है।
शता तंत्री वीणा एक समलम्बाकार, अनेक तारों वाला वाद्ययंत्र है, जिसका संबंध जम्मू-कश्मीर की संगीत परंपराओं से माना जाता है। इसकी बनावट और वादन शैली उज्बेकिस्तान के पारंपरिक वाद्ययंत्र चांग से काफी मिलती-जुलती है। यह समानता भारत और उज्बेकिस्तान के बीच साझा संगीत परंपराओं और सांस्कृतिक समानताओं की ओर संकेत करती है।
चंदन से तैयार किया गया यह वाद्ययंत्र भारत में लकड़ी पर बारीक नक्काशी की सदियों पुरानी परंपरा को भी सामने लाता है। इस तरह वाद्ययंत्र और उस पर की गई कलात्मक कारीगरी मिलकर यह संदेश देते हैं कि संगीत किस तरह भारत और उज्बेकिस्तान की साझा विरासत और संस्कृतियों को जोड़ने का माध्यम बन सकता है।
किर्गिस्तान के पीएम एडिलबेक कासिमलियेव को डोकरा कलाकृति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिस्तान के प्रधानमंत्री एडिलबेक कासिमलियेव को पारंपरिक संगीतकारों की जोड़ी की डोकरा कलाकृति भेंट की। यह कलाकृति भारत की प्राचीन धातु ढलाई परंपरा और जीवंत लोक कला विरासत को दर्शाती है। इसमें दो संगीतकारों को पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाते हुए दिखाया गया है।
यह कलाकृति पारंपरिक ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ तकनीक से तैयार की गई है। प्रत्येक कलाकृति को हाथ से बनाया जाता है, इसलिए हर टुकड़े का अपना अलग रूप और विशिष्ट चरित्र होता है। लोक जीवन और प्रदर्शन कलाओं से प्रेरित यह कलाकृति इस बात को दर्शाती है कि संगीत किस तरह सांस्कृतिक कहानियों और सामूहिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस कलाकृति का संबंध किर्गिस्तान की समृद्ध लोक संगीत और प्रदर्शन कला परंपराओं से भी जोड़ा जा सकता है। इस तरह यह भारत और किर्गिस्तान, दोनों समाजों में संगीत के साझा सांस्कृतिक महत्व का प्रतीक बनती है।
लद्दाखी त्सुग-दुल कंबल में हिमालयी विरासत की झलक
प्रधानमंत्री मोदी ने किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सादिर जापारोव को लद्दाखी त्सुग-दुल कंबल भी भेंट किया। यह लद्दाख का पारंपरिक ऊनी वस्त्र है, जो अपने जीवंत रंगों तथा ज्यामितीय, पुष्पीय और शैलीबद्ध डिजाइनों के लिए जाना जाता है।
इसे पारंपरिक रूप से स्थानीय स्तर पर प्राप्त ऊन से बुना जाता है। इसमें गर्माहट और टिकाऊपन के साथ कुशल हस्तशिल्प की झलक दिखाई देती है। यह कंबल लद्दाख के ग्रामीण और खानाबदोश जीवन की तस्वीर भी प्रस्तुत करता है।
इसकी सांस्कृतिक विरासत किर्गिस्तान की लंबे समय से चली आ रही खानाबदोश परंपराओं से स्वाभाविक रूप से जुड़ती है। पहाड़ों, ग्रामीण जीवन और ऊन आधारित हस्तशिल्प से आकार लेने वाली दोनों देशों की परंपराओं में कई समानताएं देखने को मिलती हैं। इसलिए यह कंबल केवल भारत की हिमालयी कपड़ा विरासत का प्रतीक नहीं है, बल्कि भारत और किर्गिस्तान के पर्वतीय तथा ग्रामीण समुदायों के बीच साझा सांस्कृतिक संबंधों को भी दर्शाता है।
बिबेक देबरॉय की 10 खंडों वाली ‘महाभारत’
राष्ट्रपति सादिर जापारोव को प्रधानमंत्री मोदी की ओर से बिबेक देबरॉय की 10 खंडों वाली ‘महाभारत’ भी भेंट की गई। बिबेक देबरॉय द्वारा किया गया यह अंग्रेजी अनुवाद महाभारत की संपूर्ण कथा को संक्षिप्त और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें इसकी प्रमुख कथा के साथ दार्शनिक चिंतन, वंशावली, संवाद और कई सहायक कहानियां भी शामिल हैं।
परंपरागत रूप से वेदव्यास को समर्पित महाभारत भारतीय साहित्यिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत की आधारशिला मानी जाती है। पांडवों और कौरवों की कथा के माध्यम से यह धर्म, कर्तव्य, न्याय, नैतिकता, निष्ठा और शासन-कौशल जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पड़ताल करता है। भारतीय साहित्य के साथ-साथ प्रदर्शन और दृश्य कलाओं पर भी महाभारत का गहरा और स्थायी प्रभाव रहा है।
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महाभारत का किर्गिस्तान के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘मानस’ के साथ भी एक सांस्कृतिक साम्य दिखाई देता है। दोनों महाकाव्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों, मूल्यों और सामूहिक स्मृति को संरक्षित करने का काम करते हैं। इस लिहाज से महाकाव्य परंपरा विरासत और पहचान के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सेतु का काम करती है।

