नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और सैलाब के पीछे हिमालय की ऊंची चोटियों से शुरू हुई घटनाओं की एक खतरनाक कड़ी सामने आ रही है. ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने के बाद बर्फ, चट्टानों और मलबे ने बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर रुख किया. रास्ते में इस मलबे ने और चट्टानों, मिट्टी और पानी को अपने साथ मिला लिया और देखते ही देखते यह एक विशालकाय सैलाब में बदल गया. ऊंचे हिमालय से शुरू हुई यह घटना कुछ ही समय में नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही का कारण बन गई.
5000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई से टूटा ग्लेशियर
बताया जा रहा है कि हिमालय में समुद्र तल से 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूट गया. बर्फ का यह विशाल हिस्सा पहाड़ की तीखी ढलान पर तेज रफ्तार से नीचे की ओर बढ़ा. इतनी ऊंचाई से नीचे आते समय सिर्फ बर्फ ही नहीं गिरी. बर्फ के विशाल हिस्से ने एक बुलडोजर की तरह रास्ते में मौजूद हजारों चट्टानों को उखाड़ दिया और मिट्टी तथा मलबे को भी अपने साथ बहा ले गया. ग्लेशियर टूटने से शुरू हुई यह घटना देखते ही देखते बर्फ, चट्टानों और मलबे के बेहद तेज मिश्रण में बदल गई. इस तरह की घटना को आइस-रॉक एवलांच कहा जाता है.
नदियों में गिरते ही बढ़ता गया सैलाब
भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा पहाड़ी नदियों के सिस्टम में जा गिरा. वहां उसे और पानी तथा मलबा मिलता गया. इसके बाद पूरा मलबा नदियों के प्राकृतिक रास्ते से नीचे की ओर बढ़ता चला गया. इस तरह जो घटना शुरुआत में ग्लेशियर टूटने की एक सीमित घटना थी, वह नदियों में पहुंचने के बाद विशालकाय और बेहद विनाशकारी सैलाब में बदल गई.
सुपरकार की रफ्तार से आया सैलाब
हिमालय की भौगोलिक संरचना ने इस सैलाब की रफ्तार को और बढ़ा दिया. कम दूरी में ऊंचाई का बड़ा अंतर और बेहद तीखी ढलान होने के कारण बर्फ, चट्टानों और मलबे का मिश्रण बहुत तेजी से नीचे आया. जानकारी के मुताबिक, महज 7 मिनट में इस एवलांच ने करीब 20 किलोमीटर की दूरी तय कर गिरॉन्ग पोर्ट को अपनी चपेट में ले लिया.
ग्लेशियर टूटने वाले स्थान और गिरॉन्ग पोर्ट के बीच ऊंचाई में करीब 3,300 मीटर का अंतर था. जिस स्थान पर ग्लेशियर टूटा, उसकी ऊंचाई समुद्र तल से करीब 5,140 मीटर बताई जा रही है, जबकि गिरॉन्ग पोर्ट करीब 1,800 मीटर की ऊंचाई पर है. दोनों स्थानों के बीच दूरी करीब 20 किलोमीटर है.
7 मिनट में 20 किलोमीटर का सफर
उपलब्ध जानकारी के अनुसार ग्लेशियर टूटने का समय चीन के समयानुसार करीब 10:52 बजे था. वीडियो फुटेज में गिरॉन्ग पोर्ट पर सैलाब के करीब 10:59 बजे पहुंचने की बात सामने आती है. यानी करीब सात मिनट में मलबे और पानी ने 20 किलोमीटर का सफर तय कर लिया. इसकी अनुमानित रफ्तार करीब 50 मीटर प्रति सेकेंड यानी लगभग 180 किलोमीटर प्रति घंटा थी. इतनी तेज रफ्तार के कारण लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थान पर जाने का मौका तक नहीं मिला. गिरॉन्ग से यह मलबा मुख्य नदी चैनल में पहुंचा. सैलाब की रफ्तार इतनी अधिक थी कि इसका एक हिस्सा नदी के सामान्य बहाव के विपरीत दिशा में त्रिशूली नदी में करीब तीन किलोमीटर ऊपर तक चला गया.
सैलाब ने कैसे तय किया तबाही का रास्ता
ग्लेशियर टूटने के बाद बर्फ, चट्टानों और मलबे का भारी प्रवाह सबसे पहले लहेंदे खोला नाम की पहाड़ी नदी में पहुंचा. यह नदी तिब्बत और नेपाल की सीमा के पास बहती है. इसके बाद यह विनाशकारी प्रवाह भोटे कोशी नदी में जा मिला. इससे नेपाल के रसुवा जिले के टिमुरे और रसुवागढ़ी जैसे सीमावर्ती इलाकों में कुछ ही मिनटों में भारी तबाही मच गई. सैलाब आगे बढ़ते हुए त्रिशूली नदी के रास्ते नेपाल के नुवाकोट जिले की बस्तियों तक पहुंचा और कई इलाकों को प्रभावित किया. इसके बाद जलप्रवाह नेपाल के नारायणी नदी तंत्र से होते हुए भारत की गंडक नदी की ओर बढ़ा. इसके मद्देनजर भारत के मैदानी इलाकों में भी सतर्कता और बाढ़ को लेकर अलर्ट जारी किया गया.
जलवायु परिवर्तन से क्यों बढ़ रहा है खतरा?
ऊंचे पहाड़ी इलाकों में जलवायु परिवर्तन ग्लेशियर, पर्माफ्रॉस्ट, चट्टानों और पानी के बीच के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है. तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल सकते हैं. वहीं, पर्माफ्रॉस्ट यानी ऐसी जमीन जो लगातार दो साल या उससे अधिक समय तक शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे जमी रहती है, उसके पिघलने से पहाड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है.
बर्फ पिघलने के साथ पानी बर्फ और चट्टानों की दरारों में प्रवेश करता है, जिससे चट्टानें कमजोर हो सकती हैं. ग्लेशियरों के पीछे हटने और पिघलने से कई जगह ग्लेशियल झीलें भी बनती हैं. इन परिस्थितियों में पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर हर ग्लेशियर टूटने की घटना का कारण हो, यह कहना उचित नहीं होगा, लेकिन यह ऊंचे पहाड़ों में उन परिस्थितियों को बदल सकता है जो ग्लेशियर, चट्टान और पानी से जुड़े खतरों को बढ़ाती हैं.
नेपाल में 21 खतरनाक ग्लेशियल झीलें
नेपाल में करीब 21 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जो ग्लेशियरों से जुड़ी हैं और इनके फटने या पानी तेजी से नीचे आने की स्थिति में नदी घाटियों और निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है. इसके अलावा तिब्बत में करीब 25 और भारत में एक ऐसी ट्रांसबाउंड्री ग्लेशियल झील की पहचान की गई है, जिनका पानी नेपाल की नदियों में पहुंचने का जोखिम माना जाता है.
ICIMOD ने ऐसी कुल 47 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की है. इन झीलों और ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में बदलती परिस्थितियों पर लगातार निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि ग्लेशियर, झील, चट्टान और नदी तंत्र में होने वाला बदलाव नीचे बसे इलाकों के लिए अचानक बड़े खतरे में बदल सकता है.

