नेपाल में आई भीषण बाढ़ को लेकर शुरुआती तौर पर भूकंप की बात सामने आई थी, लेकिन अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक इसका तत्काल कारण भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद मलबे का तेज बहाव माना जा रहा है. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, शुरुआत में 4.4 तीव्रता का जो सिग्नल भूकंप के रूप में सामने आया था, वह वास्तव में ग्लेशियर के एक हिस्से के गिरने और मलबे के बहने से पैदा हुआ कंपन था. बाद में इस घटना से जुड़े कंपन को करीब 5.2 तीव्रता के सिग्नल के रूप में आंका गया.
सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिलता है कि करीब 5200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूटकर लगभग 1200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा. इसके बाद ल्हेन्दे खोला नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए रुक गया. पानी, मिट्टी और चट्टानों का दबाव बढ़ने के बाद अचानक भारी मलबा और पानी भोटेकोशी नदी की ओर बह गया. इस घटना को सामान्य मानसूनी बाढ़ से अलग माना जा रहा है, क्योंकि उस दिन रसुवा इलाके में बारिश बहुत कम हुई थी. इसलिए वैज्ञानिकों के सामने ग्लेशियर टूटने और उससे पैदा हुए मलबे के बहाव की वजह सबसे मजबूत संभावना के रूप में सामने आई है.
लैंगटांग लिरुंग के पास हुआ ग्लेशियर का हिस्सा ध्वस्त
बताया जा रहा है कि लैंगटांग लिरुंग चोटी के पास स्थित एक ग्लेशियर का निचला हिस्सा ढह गया. यह इलाका बाढ़ प्रभावित स्थान से करीब 15 किलोमीटर पश्चिम में है. ग्लेशियर का हिस्सा उत्तर-पश्चिम दिशा में गिरने के बाद पश्चिम की तरफ नदी के साथ आगे बढ़ा. ग्लेशियर के घाटी में गिरने से पैदा हुआ कंपन इतना तेज था कि उसे भूकंप जैसी गतिविधि के रूप में दर्ज किया गया. यही वजह मानी जा रही है कि शुरुआती रिपोर्ट में इसे भूकंप समझ लिया गया.
लिरुंग ग्लेशियर दिखता कैसा है?
लैंगटांग लिरुंग की करीब 7,234 मीटर ऊंची चोटी के नीचे लिरुंग ग्लेशियर का क्षेत्र है. यह सामान्य सफेद बर्फ की चादर जैसा नहीं दिखता. इसके निचले हिस्से में बर्फ के साथ पत्थर, मिट्टी और मलबा जमा रहता है. लंबे समय से चट्टानों और मलबे के गिरने के कारण ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा ढका हुआ है. कुछ जगहों पर नीले रंग के छोटे तालाब और खड़ी बर्फीली चट्टानें दिखाई देती हैं. ग्लेशियर के आगे घाटी में पत्थरों और मलबे की ऊंची संरचनाएं तथा ग्लेशियल धाराएं भी मौजूद हैं.
क्या जलवायु परिवर्तन भी इसकी वजह हो सकता है?
वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बढ़ता तापमान हिमालय के ग्लेशियरों और पर्माफ्रॉस्ट को प्रभावित कर रहा है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्टों के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ी है. इससे ग्लेशियल झीलों, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि, किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम कहना आसान नहीं है. वैज्ञानिक आमतौर पर लंबे समय के आंकड़ों और घटनाओं के पैटर्न को देखकर इसका आकलन करते हैं. गर्म होते वातावरण में ग्लेशियरों का सिकुड़ना, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना और पहाड़ी ढलानों का अस्थिर होना ऐसे खतरों को बढ़ा सकता है.
हिमालय में पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी घटनाएं
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों से जुड़ी आपदाएं पहले भी बड़े नुकसान का कारण बन चुकी हैं. फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर से जुड़े अचानक आए मलबे और पानी के तेज बहाव ने भारी तबाही मचाई थी. इस घटना में करीब 200 लोगों की मौत या लापता होने की जानकारी सामने आई थी. नेपाल और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में भी ग्लेशियल झील फटने और अचानक बाढ़ आने की घटनाएं सामने आती रही हैं. इससे यह साफ है कि ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियर और हिमतालों की निगरानी बेहद जरूरी है.
ग्लेशियल झील फटने का खतरा कैसे कम किया जा सकता है?
ग्लेशियल झीलों में जमा पानी अगर अचानक बाहर निकल जाए तो नीचे की घाटियों में बहुत तेज बाढ़ आ सकती है. ऐसे खतरे को कम करने के लिए इंजीनियरिंग उपायों के साथ लगातार निगरानी और समय पर चेतावनी देना जरूरी है. जोखिम वाली झीलों में जरूरत के अनुसार पानी का स्तर नियंत्रित किया जा सकता है. इसके लिए पंप, कृत्रिम नाली, आउटलेट चैनल या नियंत्रित निकासी मार्ग बनाए जा सकते हैं. नेपाल में इम्जा त्सो झील का जलस्तर नियंत्रित तरीके से कम किया गया था. त्शो रोलपा में भी पानी के बहाव को नियंत्रित करने की व्यवस्था विकसित की गई है.
बांध और नदी किनारों को मजबूत करना भी जरूरी
जहां जरूरत हो, वहां ग्लेशियल झीलों के प्राकृतिक बांधों को मजबूत किया जा सकता है. नदी किनारों को कटाव से बचाने, बड़े पत्थरों और मलबे को रोकने के लिए चेक डैम या अन्य संरचनाएं बनाई जा सकती हैं. कुछ इलाकों में ढलान को स्थिर करने के लिए पेड़-पौधों और दूसरे प्राकृतिक उपायों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, हर ऊंचाई वाले इलाके में बड़े निर्माण करना संभव नहीं होता.
शुरुआती अलर्ट सिस्टम बचा सकती है जान
सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग तकनीक से ग्लेशियल झीलों के आकार, पानी के स्तर और आसपास के बदलावों पर नजर रखी जा सकती है. ज्यादा जोखिम वाली झीलों में पानी का स्तर मापने वाले सेंसर और दूसरे निगरानी उपकरण लगाए जा सकते हैं. अगर किसी झील में अचानक बदलाव दिखाई देता है तो नीचे रहने वाले लोगों तक मोबाइल अलर्ट, सायरन और स्थानीय प्रशासन के जरिए तुरंत सूचना पहुंचाई जा सकती है.
स्थानीय लोगों की तैयारी भी उतनी ही जरूरी
सिर्फ तकनीकी निगरानी से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता. बाढ़ की चपेट में आने वाले इलाकों की मैपिंग, सुरक्षित स्थानों की पहचान और निकासी मार्ग तैयार करना भी जरूरी है. स्थानीय लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि खतरे की स्थिति में उन्हें किस दिशा में जाना है और किस स्थान पर सुरक्षित रहना है. नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन की तैयारी भी नुकसान कम करने में मदद कर सकती है. ऊंचाई, खराब मौसम, कठिन रास्तों और ज्यादा लागत के कारण हर ग्लेशियल झील पर एक जैसी व्यवस्था करना संभव नहीं है.

