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Xप्लेन: कैसे ‘इकोनॉमिक सैंडविच’ बना सरकारी खजाना? टैक्स-GST कम होने पर भी खर्च बढ़ा

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बीजेपी सरकार ने एक तरफ टैक्स में कटौती की, तो दूसरी तरफ रक्षा बजट में इजाफा कर दिया. इस बीच सरकार का अपना खजाना ऐसे ‘इकोनॉमिक सैंडविच’ में फंस गया, जिससे निकलना मुश्किल हो रहा है. पिछले साल इनकम टैक्स और गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) में कटौती से करीब 2.44 लाख करोड़ रुपए सालाना नुकसान हुआ. इस बीच रक्षा बजट को बढ़ाकर 7.85 लाख करोड़ रुपए कर दिया. ये वो असली परेशानी है जो सीधे GDP, महंगाई और आम आदमी की जेब तक का सफर तय करती है. आइए इस उलझे हुए समीकरण के हर कोने को समझते हैं…

 पहली समस्या: टैक्स और GST से कमाई क्यों घटी?

सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती टैक्स कलेक्शन में आई भारी कमी है. वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार का कुल टैक्स रेवेन्यू बजट अनुमान से 2.44 लाख करोड़ रुपए कम रहने का अनुमान है. यानी सरकार को उम्मीद से कहीं कम पैसा हाथ लगा. इस कमी की तीन बड़ी वजहें हैं:

  • टैक्स में कटौती: फरवरी 2025 में सरकार ने पर्सनल इनकम टैक्स में कटौती की. इससे सरकारी खजाने को सालाना 1 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. इससे पहले 2019 में कॉर्पोरेट टैक्स कम करने से भी सरकार को 1.45 लाख करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान हुआ था.
  • GST दरों में कटौती: सितंबर 2025 में सरकार ने GST की दरों को तर्कसंगत किया. इसका असर यह हुआ कि GST से होने वाली कमाई की रफ्तार पांच साल के निचले स्तर 5.57% पर आ गई. वित्त वर्ष 2025-26 में कुल GST कलेक्शन 23.32 लाख करोड़ रुपए रहा. इसका मतलब है कि महंगाई और आर्थिक विकास के बावजूद GST से मिलने वाला पैसा उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा.
  • कमजोर अर्थव्यवस्था: देश में नॉमिनल GDP की वृद्धि दर धीमी पड़ गई है. इसके अलावा, शहरी इलाकों में खपत कमजोर है. वैश्विक अनिश्चितता ने भी टैक्स कलेक्शन पर नकारात्मक असर डाला है.

नतीजतन, कॉर्पोरेशन टैक्स, इनकम टैक्स, GST और कस्टम ड्यूटी चारों मिलाकर बजट अनुमान से करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए कम आए. इतना ही नहीं, GST कम्पेन्सेशन सेस को साल के बीच में ही ज्यादातर चीजों पर खत्म कर दिया गया. इससे 0.75 लाख करोड़ रुपए का और नुकसान हुआ.

दूसरी समस्या: युद्ध-खर्च क्यों बढ़ा?

जहां एक तरफ कमाई घट रही है, वहीं दूसरी तरफ रक्षा पर खर्च रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ गया है. 2026-27 के बजट में रक्षा के लिए 7.85 लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है. ये पिछले साल के मुकाबले करीब 15% (लगभग 1 लाख करोड़ रुपए) ज्यादा है. इस खर्च को बढ़ाने की दो बड़ी वजहें हैं:

  • दो मोर्चे पर चुनौती: भारत को एक तरफ चीन के साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर मोर्चा संभालना है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान की ओर से लगातार खतरा बना रहता है.
  • हथियारों का आधुनिकीकरण: पुराने हथियारों को बदलने और नई तकनीक के राफेल, तेजस एमके-1ए, सबमरीन्स और स्टील्थ डिस्ट्रायर्स खरीदने के लिए भारी निवेश की जरूरत है. पूंजीगत व्यय पर 2.1 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं.

बता दें कि भारत का रक्षा बजट GDP का करीब 2% है, जो कि चीन (1.7-1.8%) से तो ज्यादा है, लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी है कि वह 245 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च करता है. जो भारत से तीन गुना ज्यादा है.

पूरी परेशानी का सार क्या है?

ऐसे समझें कि जब कमाई घट रही है और खर्च बढ़ रहा है, तो सरकार के सामने राजकोषीय घाटा बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है. राजकोषीय घाटा यानी सरकार की कुल कमाई और कुल खर्च के बीच का अंतर.

FY26 में सरकार का टैक्स रेवेन्यू बजट अनुमान से 1.6 लाख करोड़ रुपए कम आने का अनुमान है. BMI (Fitch Solutions की यूनिट) की रिपोर्ट के मुताबिक, FY27 में राजकोषीय घाटा GDP के 4.3% के लक्ष्य से बढ़कर 4.6% तक पहुंच सकता है. अप्रैल-जून 2026 में ही राजकोषीय घाटा सालाना आधार पर 10% बढ़कर 3.1 लाख करोड़ रुपए हो गया. पिछले साल की समान अवधि में ये 17.9% था, जो इस साल बढ़कर 18.2% हुआ है.

अब सरकार के पास दो ही रास्ते हैं. या तो खर्च कम करे (जो विकास को नुकसान पहुंचा सकता है) या उधारी बढ़ाए (जिससे ब्याज का बोझ बढ़ेगा).

ये परेशानी आम आदमी और राज्यों को कैसे प्रभावित करती है?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आम आदमी और राज्यों पर 4 बड़े असर होंगे:

  • विकास दर पर असर: BMI की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण FY27 में भारत की विकास दर 7.7% से घटकर 6.7% रह सकती है.
  • तेल की बढ़ती कीमतें: युद्ध से पहले क्रूड ऑयल 65 डॉलर प्रति बैरल था, जो युद्ध के बाद 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया. इससे भारत का सालाना क्रूड इंपोर्ट बिल 70 अरब डॉलर बढ़ गया.
  • राज्यों पर बोझ: GST दरों में कटौती से राज्यों की अपनी कमाई पर भी असर पड़ा है. पंजाब, हिमाचल, पश्चिम बंगाल, बिहार, केरल और राजस्थान जैसे कई राज्यों पर पहले से ही GDP के 30% से ज्यादा का कर्ज है.
  • सब्सिडी पर दबाव: पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से तेल और उर्वरक सब्सिडी का बिल 37% तक बढ़ गया.

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