सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि चुनावी प्रक्रिया में काला धन लोकतंत्र, कानून के शासन और पूरी चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करता है। शीर्ष अदालत ने चुनाव के दौरान अवैध तरीके से हासिल धन की बरामदगी से जुड़े आपराधिक मामलों की समय पर जांच और जल्द सुनवाई पूरी करने पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा, “इस पसंद को प्रभावित करने वाले किसी भी बाहरी कारक में लोकतंत्र के मूल स्वरूप को कमजोर करने की क्षमता है।” पीठ ने कहा कि जब अवैध धन शामिल होता है तो व्यक्ति की ओर से किया गया चुनाव स्वतंत्र नहीं रहता। उसकी पसंद मौद्रिक या अन्य तरह के लाभ से प्रभावित हो जाती है। कभी ये लाभ वास्तविक होते हैं तो कभी भ्रामक वादों के रूप में होते हैं।
काले धन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने कहा, “चुनावी प्रक्रिया में काला धन, यानी जिस मुद्दे पर हम यहां विचार कर रहे हैं, ऐसा ही एक पहलू है जो लोकतंत्र, कानून के शासन और खुद चुनावी प्रक्रिया को कमजोर करता है।” शीर्ष अदालत ने कहा कि लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया में संदिग्ध धन के प्रसार और उसे दूषित करने का मुद्दा कोई हाल की घटना नहीं है। इसे बार-बार पहचाना गया है।
24 घंटे में देनी होगी जब्ती की रिपोर्ट
चुनाव प्रक्रिया के दौरान नकदी और संपत्ति की जब्ती का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि “जब्ती करने वाले प्राधिकारी को 24 घंटे के भीतर इसकी सूचना जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट या सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत को देनी होगी।” साथ ही लिखित कारणों में यह बताना होगा कि जब्त नकदी या अन्य संपत्ति का संदिग्ध चुनावी अपराध से प्रथम दृष्टया क्या संबंध है।
पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति संजय करोल ने कहा कि जब प्राथमिकी दर्ज हो जाती है तो जांच अधिकारी को हर संभव प्रयास करके एक साल के भीतर जांच पूरी करनी होगी। पीठ ने निर्देश दिया, “यदि यह समयसीमा पार होती है तो इसके कारण दर्ज किए जाएंगे और भारत निर्वाचन आयोग को बताए जाएंगे।”
10 लाख से अधिक की नकदी मिलने पर आयकर विभाग को सूचना
यह आदेश कर्नाटक सरकार की ओर से दायर एक याचिका पर आया। यह मामला 2014 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है, जब बेल्लारी जिले में चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर काला धन जब्त किया गया था। पीठ ने निर्वाचन आयोग और राज्य सरकारों को 18 नवंबर तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
अदालत ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त की मंजूरी के बाद नोडल अधिकारी के माध्यम से निर्वाचन आयोग को जांच की स्थिति की तिमाही रिपोर्ट देगा। शीर्ष अदालत ने कहा, “जब स्थैतिक निगरानी दल (SST) जांच के दौरान 10 लाख रुपये से अधिक की राशि पाते हैं तो इसकी जानकारी आयकर अधिकारियों को भेजी जाएगी।”
उम्मीदवारों और मौजूदा सांसदों-विधायकों के मामलों में तेजी लाने पर जोर
पीठ ने लोकतंत्र में चुनावों की अनिवार्यता का जिक्र करते हुए कहा कि जो लोग चुनाव लड़ रहे हैं, वे खुद चुनाव कराने की जिम्मेदारी नहीं संभाल सकते। पीठ ने कहा, “अगर ऐसा होता है तो चुनाव की पूरी प्रक्रिया ही निरर्थक हो जाएगी।” अदालत ने निर्देश दिया कि उम्मीदवारों और मौजूदा सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ मामलों का जल्द निपटारा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। इसमें चुनावों के बार-बार होने की प्रकृति को ध्यान में रखा जाए।
मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों को प्रक्रिया का पालन करने और ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई व निपटारे के लिए अदालतें निर्धारित करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, “किसी विशेष चुनावी चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ मामलों को वापस लेने के लिए संबंधित उच्च न्यायालय की मंजूरी अनिवार्य है।” अदालत ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का भी उल्लेख किया।
पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग के हलफनामे में 2024 के लोकसभा चुनाव और 2019 से 2025 के बीच हुए विधानसभा चुनावों से जुड़े लंबित मामलों की संख्या का विवरण दिया गया है। इससे पता चलता है कि काफी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। शीर्ष अदालत ने कहा, “संबंधित अदालतों को पूरी तत्परता के साथ मामलों को उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।”


