कुलगाम में प्रवासी मजदूर की टारगेट किलिंग को रक्षा मामलों के विशेषज्ञ आतंकियों की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसी टारगेट किलिंग का मकसद केवल किसी व्यक्ति की हत्या नहीं होता, बल्कि जम्मू-कश्मीर की बदलती तस्वीर पर सवाल खड़े करना, लोगों में डर पैदा करना और देश-दुनिया तक यह संदेश पहुंचाना भी होता है कि घाटी अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
निशाना सिर्फ व्यक्ति नहीं, भरोसा भी
रक्षा विशेषज्ञ सेवानिवृत्त कर्नल सुखबीर सिंह मनकोटिया का कहना है कि टारगेट किलिंग के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हैं। पहला, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह धारणा बनाना कि कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हुए हैं। दूसरा, घाटी में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों के मन में डर पैदा करना, ताकि उनके आने और कामकाज पर असर पड़े। उन्होंने कहा कि बागवानी, निर्माण और कई अन्य क्षेत्रों की गतिविधियां बाहरी मजदूरों पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाने से केवल सुरक्षा का संदेश नहीं जाता, बल्कि स्थानीय कारोबार और लोगों के भरोसे पर भी असर पड़ता है।
विकास की रफ्तार भी निशाने पर
पाकिस्तान मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार संत शर्मा का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में पर्यटन, विकास परियोजनाओं और निवेश की रफ्तार बढ़ने से प्रदेश की सकारात्मक छवि मजबूत हुई है। ऐसे में आतंकी संगठन ऐसी घटनाओं के जरिए उस माहौल को प्रभावित करना चाहते हैं। मौजूदा समय में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के घटनाक्रम, सिंधु जल संधि को लेकर बने हालात और अमरनाथ यात्रा जैसे अहम घटनाक्रमों के बीच ऐसी वारदातों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों की लगातार कार्रवाई से आतंकी नेटवर्क दबाव में हैं। इसलिए वे कम संसाधनों में ज्यादा मनोवैज्ञानिक असर डालने वाली घटनाओं के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और डर का माहौल बनाने की कोशिश करते हैं।
1989 से 2000 के बीच कश्मीर घाटी की प्रमुख घटनाएं
- 14 सितंबर 1989 : भाजपा नेता और अधिवक्ता टीका लाल टपलू की श्रीनगर में हत्या।
- 04 नवंबर 1989 : सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या।
- 13 फरवरी 1990 : दूरदर्शन श्रीनगर के निदेशक लासा कौल की हत्या।
1990 के दौरान शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों और कश्मीरी पंडित परिवारों को निशाना बनाया गया, जिसके बाद घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ।
1990 के दशक से 2000 के बीच आतंकियों ने अंतराल पर अल्पसंख्यक समुदायों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों पर हमला जारी रखा। कई सामूहिक हत्याएं भी हुईं।
2021 से टारगेट किलिंग का नया दौर
2021 में आतंकियों ने फिर से गैर स्थानीय मजदूरों, शिक्षकों, कश्मीरी पंडितों और व अन्य समुदाय के लोगों को निशाना बनाया।
- अक्तूबर 2021 : श्रीनगर में स्कूल की प्रधानाचार्य सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या।
- अक्तूबर 2021 : प्रसिद्ध कश्मीरी फार्मासिस्ट माखन लाल बिंदरू की हत्या।
- मई 2022 : बडगाम में राजस्व विभाग के कर्मचारी राहुल भट की हत्या।
- मई 2022 : कुलगाम में शिक्षिका रजनी बाला की हत्या।
- जून 2022 : बैंक प्रबंधक विजय कुमार (राजस्थान निवासी) की कुलगाम में हत्या।
2023 से 2026 तक छिटपुट घटनाएं
इस अवधि में भी छिटपुट आतंकी हमले हुए। हालांकि 2021–22 जैसी लगातार टारगेट किलिंग की शृंखला नहीं रही। अप्रैल 2025 में पहलगाम-बैसरन में पर्यटकों पर बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई। लेकिन इसे आतंकी हमला मानते हुए भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया। घुटनों पर ला दिया।

