चीन ने शिक्षा व्यवस्था में कब और क्यों किए बड़े बदलाव?
चीन ने 1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत में अपनी शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार शुरू किए। उस समय वहां भी शिक्षा की गुणवत्ता, परीक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसी कई चुनौतियां थीं। इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने कई बड़े फैसले लिए, जिनका असर आने वाले वर्षों में दिखाई दिया।
1. विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाने पर बड़ा निवेश
चीन ने प्रोजेक्ट 211 और प्रोजेक्ट 985 जैसी योजनाएं शुरू कीं। इनका उद्देश्य चुनिंदा विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय संस्थान बनाना था। सरकार ने रिसर्च, विज्ञान और उच्च शिक्षा के विकास पर बड़े पैमाने पर निवेश किया ताकि चीनी विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
2. कॉलेजों में दाखिले की सीटें बढ़ाईं
चीन के शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट “China’s Education: 40 Years of Epic Achievements” के अनुसार, 1999 में कॉलेजों की सीटों में 47.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई।
उसी वर्ष कॉलेजों में दाखिले की संख्या 10.8 लाख से बढ़कर 15,96,800 हो गई। इसके बाद उच्च शिक्षा का दायरा लगातार बढ़ता गया। जहां 1997 में करीब 10 लाख छात्र कॉलेज पहुंचते थे, वहीं 2020 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 96 लाख प्रति वर्ष हो गई। इस कदम का उद्देश्य अधिक से अधिक युवाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ना और उन्हें रोजगार के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना था।
3. गाओकाओ परीक्षा में सख्त नियम लागू किए
चीन की राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा गाओकाओ (Gaokao) को दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में माना जाता है। इस परीक्षा में नकल और पेपर लीक रोकने के लिए चीन ने बेहद कड़े नियम बनाए। परीक्षा में धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और कई मामलों में जेल तक की सजा का प्रावधान किया गया।
4. स्किल आधारित शिक्षा पर दिया जोर
चीन ने केवल डिग्री देने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि स्किल आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया। स्कूलों और कॉलेजों को उद्योगों तथा तकनीकी कंपनियों से जोड़ा गया ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकें।


