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ट्रंप की जान को खतरा या नेतन्याहू का मास्टरस्ट्रोक? जानें क्यों ईरान पर US फाइटर जेट्स बरसाने लगे बारूद

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मिडिल ईस्ट में एक बार फिर युद्ध की आग भड़क चुकी है. 22 दिन पहले जिस अमेरिका-ईरान समझौते को डोनाल्ड ट्रंप अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता बता रहे थे, अब उसी समझौते को उन्होंने लगभग खत्म मान लिया है. एक तरफ अमेरिकी लड़ाकू विमान लगातार दूसरे दिन ईरान के सैन्य ठिकानों पर बमबारी कर रहे हैं, तो दूसरी ओर ईरान अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइलें दाग रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि ट्रंप अचानक बातचीत से युद्ध की तरफ लौट आए? क्या इसकी वजह ईरान था या फिर इजरायल की खुफिया रिपोर्ट?

नाटो समिट में दिखे ट्रंप के अलग तेवर

नाटो शिखर सम्मेलन के लिए तुर्किए पहुंचे डोनाल्ड ट्रंप का अंदाज पहले से बिल्कुल अलग था. उन्होंने पहली बार खुलकर कहा कि ईरान के साथ बातचीत अब समय की बर्बादी है. उन्होंने ईरान को ‘बुरे लोग’ और ‘घटिया खिलाड़ी’ बताया. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ट्रंप ने दावा किया कि वह कई वर्षों से ईरान की हिटलिस्ट में नंबर-वन पर हैं और उन्हें हर समय अपनी जान का खतरा महसूस होता है. उन्होंने कहा कि ईरान किसी को भी निशाना बना सकता है और वह खुद भी उसका प्रमुख लक्ष्य हैं.

खुफिया रिपोर्ट की टाइमिंग पर उठ रहे सवाल

सवाल उठता है कि आखिर ट्रंप को अचानक यह भरोसा कैसे हो गया कि ईरान उन्हें मारना चाहता है? इसका जवाब अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों में छिपा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल और CNN की रिपोर्टों के मुताबिक, इजरायल ने अमेरिका को एक नई खुफिया जानकारी दी. दावा किया गया कि ईरान डोनाल्ड ट्रंप की हत्या के लिए विशेष योजना बना रहा है. रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पहले से ट्रंप के खिलाफ संभावित खतरे की जानकारी थी, लेकिन इजरायल ने एक नई और अधिक गंभीर साजिश का इनपुट साझा किया.

हालांकि, इस कथित किलिंग प्लॉट की आधिकारिक पुष्टि न अमेरिका ने की है और न ही इजरायल ने. यही वजह है कि इस रिपोर्ट की टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं. यह रिपोर्ट ठीक उसी समय सामने आई जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को अंतिम रूप देने की बातचीत चल रही थी. दोनों पक्ष मसौदे पर काफी हद तक सहमत बताए जा रहे थे. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह खुफिया इनपुट वास्तव में सुरक्षा चेतावनी थी या फिर शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने की रणनीति?

कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ट्रंप बने ईरान का संभावित निशाना

ट्रंप के लिए ईरान का खतरा कोई नई बात नहीं है. जनवरी 2020 में ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी ड्रोन हमले में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या हुई थी. तभी से अमेरिकी एजेंसियां मानती रही हैं कि ईरान ट्रंप को संभावित निशाने के रूप में देखता है. खुद ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने सुलेमानी को इसलिए मरवाया क्योंकि वह अमेरिकी ठिकानों पर बड़े हमले की योजना बना रहा था. ऐसे में नई खुफिया रिपोर्ट ने ट्रंप की पुरानी आशंकाओं को और मजबूत कर दिया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

इसी दौरान ईरान में दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा चल रही थी. तेहरान से लेकर मशहद और फिर कोम तक लाखों लोग सड़कों पर उमड़ पड़े. अंतिम यात्रा में अमेरिका और ट्रंप के खिलाफ नारे लगाए गए. कई जगह ट्रंप की तस्वीरों पर विरोध प्रदर्शन हुआ. इन दृश्यों ने भी ट्रंप की चिंता और गुस्से को बढ़ा दिया. ऐसे माहौल में इजरायल की खुफिया रिपोर्ट और ईरान में उग्र जनभावनाओं ने मिलकर ट्रंप के रुख को पूरी तरह बदल दिया.

दो दिनों में US ने 170 ईरानी ठिकानों पर किए हमले 

इसके तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिए. दो दिनों में ईरान के करीब 170 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया. बुशहर के परमाणु संयंत्र के आसपास धमाके हुए. बंदर अब्बास, सिस्तान, चाबहार और कई अन्य सैन्य प्रतिष्ठानों पर एयरस्ट्राइक की गई. जवाब में ईरान ने बहरीन, कतर, जॉर्डन और अन्य देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए. पूरा पश्चिम एशिया फिर युद्ध के मुहाने पर पहुंच गया.

नेतन्याहू की सोच ने ट्रंप को किया प्रभावित?

यहीं पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका चर्चा में आ जाती है. नेतन्याहू पहले से ही अमेरिका-ईरान समझौते के आलोचक रहे हैं. उनकी प्राथमिकता हमेशा ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना और ईरान समर्थित मिलिशिया नेटवर्क को कमजोर करना रही है. उनका मानना है कि जब तक ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक इजरायल सुरक्षित नहीं हो सकता. इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौता उनके रणनीतिक हितों के अनुकूल नहीं माना जाता.

दिलचस्प बात यह भी है कि हाल के दिनों में नेतन्याहू और ट्रंप दोनों ने ईरान के लिए लगभग एक जैसी भाषा का इस्तेमाल किया. नेतन्याहू ने पहले ईरान को ‘कैंसर’ बताया था और बाद में ट्रंप ने भी लगभग वही शब्द दोहराए. इससे यह चर्चा और तेज हो गई कि क्या इजरायल की सुरक्षा चिंताओं ने ट्रंप की सोच को प्रभावित किया.

अली खामेनेई के जनाजे में मुज्तबा की गैरहाजिरी चर्चा का विषय

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और रहस्य दुनिया का ध्यान खींच रहा है—ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की लगातार गैर-मौजूदगी. अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा तेहरान, कोम, इराक और मशहद तक चली, लेकिन हर जगह उनके तीन बेटे तो दिखाई दिए, मुज्तबा कहीं नजर नहीं आए. न अंतिम दर्शन, न जनाजे में कंधा, न दफन के समय मौजूदगी. यह अनुपस्थिति पूरे ईरान और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन गई. 

मुज्तबा खामेनेई की गतिविधियों को बेहद गुप्त रख रहा ईरान

ईरानी मीडिया में दावा किया जा रहा है कि मुज्तबा खामेनेई जल्द सार्वजनिक रूप से सामने आ सकते हैं और अपने पिता की श्रद्धांजलि सभा में शामिल हो सकते हैं. हालांकि, दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि सुरक्षा कारणों से उनका सार्वजनिक कार्यक्रम बेहद सीमित रखा जाएगा. कुछ रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया कि हालिया हमलों में उनके घायल होने के कारण वह सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम लीडर बनने के बाद मुज्तबा अब इजरायल और उसके सहयोगियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक लक्ष्य बन चुके हैं. यही वजह है कि ईरान उनकी लोकेशन और गतिविधियों को पूरी तरह गोपनीय रख रहा है. यदि वह सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं, तो सुरक्षा जोखिम कई गुना बढ़ सकता है.

संघर्ष के बीच कई सवालों के जवाब मिलना बाकी

इस पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या ट्रंप ने वास्तव में ईरान के कथित किलिंग प्लॉट के कारण बातचीत छोड़कर युद्ध का रास्ता चुना? क्या इजरायल की खुफिया रिपोर्ट ने अमेरिकी नीति बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई? क्या ईरान की अंतिम यात्रा के दौरान उभरे जनाक्रोश ने ट्रंप की आशंकाओं को और बढ़ाया? और सबसे अहम, क्या मुज्तबा खामेनेई पहली बार दुनिया के सामने आकर इन तमाम अटकलों पर विराम लगाएंगे?

फिलहाल इतना तय है कि अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बढ़ता सैन्य टकराव पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर चुका है. युद्ध का दायरा बढ़ने पर इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह टकराव फिर किसी नए समझौते तक पहुंचेगा या मिडिल ईस्ट एक और लंबे युद्ध की ओर बढ़ जाएगा.

यह भी पढ़ेंः सीजफायर खत्म होने से बढ़ा वर्ल्ड वार का खतरा! जानें कौन सा देश अमेरिका-ईरान के बीच सुलह कराने फिर कूदा?

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