
अमेरिका और ईरान के बीच तीन हफ्ते पहले हुआ सीजफायर अब टूट चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि संघर्षविराम खत्म हो गया है. इसके बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के 80 से ज्यादा सैन्य ठिकानों पर हमले किए जबकि ईरान ने भी बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. इस टकराव का असर अब सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है. दुनिया की निगाहें तेल बाजार और होर्मुज स्ट्रेट पर टिक गई हैं क्योंकि यहीं से तय होगा कि आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी.
भारत के लिए भी यह दौर बेहद अहम है. वजह सिर्फ तेल नहीं बल्कि महंगाई, रुपये की चाल, रसोई गैस, शेयर बाजार और त्योहारी सीजन है. जून में हुए समझौते को अमेरिका अब खत्म करने की बात कह चुका है और अब अगले करीब 40 दिन यह तय करेंगे कि हालात सामान्य होंगे या तनाव और बढ़ेगा. अगर हालात बिगड़ते हैं तो इसका सीधा असर भारत के आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है.
पहला मोर्चा- क्या पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?
सीजफायर के दौरान ब्रेंट क्रूड 69-70 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था, लेकिन तनाव बढ़ने के बाद यह फिर 78 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है यानी कुछ ही दिनों में कच्चे तेल में करीब 7 फीसदी की तेजी आ चुकी है. भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में हर उछाल का असर भारत पर पड़ता है.
फिलहाल देश में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर हैं. दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रेंट क्रूड 75 से 78 डॉलर के बीच बना रहा तो अगले दो से चार हफ्तों में तेल कंपनियों पर कीमतें बढ़ाने का दबाव बढ़ सकता है. अगर कीमतें 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं तो ईंधन महंगा होने की आशंका और बढ़ जाएगी.

दूसरा मोर्चा- होर्मुज स्ट्रेट क्यों है सबसे बड़ी चिंता?
दुनिया के समुद्री तेल कारोबार का करीब 20 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है. यही वजह है कि इस समुद्री रास्ते पर बढ़ा तनाव पूरी दुनिया की चिंता बन गया है. भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रणनीति बदली है. अब देश का करीब 70 फीसदी कच्चा तेल होर्मुज के बाहर के वैकल्पिक स्रोतों से आता है जबकि पहले यह हिस्सा करीब 55 फीसदी था, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक असली चिंता LPG और LNG को लेकर है.
इनकी सप्लाई अभी भी काफी हद तक खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है. अगर होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई तो रसोई गैस, CNG और PNG की लागत पर असर दिखाई दे सकता है. इसके अलावा समुद्री बीमा और शिपिंग की लागत बढ़ने का असर दूसरे आयातित सामानों की कीमतों पर भी पड़ सकता है.
तीसरा मोर्चा- महंगाई और रुपये पर कितना असर?
महंगा तेल सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता. भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इससे रुपये पर दबाव बढ़ता है. बुधवार को रुपया करीब 60 पैसे टूटकर 95.56 प्रति डॉलर पर बंद हुआ जो लगभग एक महीने का सबसे कमजोर स्तर रहा. कमजोर रुपया इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल, मशीनरी और दूसरे आयातित सामान को महंगा बना देता है. इसका असर धीरे-धीरे महंगाई पर भी दिखाई देता है. अगस्त और सितंबर में त्योहारी सीजन की शुरुआत होती है. इसी दौरान बाजार में मांग बढ़ती है. अगर उस समय तक तेल महंगा रहा और रुपया कमजोर बना रहा तो त्योहारों से पहले महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.
चौथा मोर्चा- शेयर बाजार पर नजर क्यों?
तनाव का असर शेयर बाजार में भी दिखाई दे चुका है. सेंसेक्स 1,677 अंक टूटा, निवेशकों की करीब 9 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति घट गई और इंडिया VIX में करीब 30 फीसदी की तेजी दर्ज हुई. विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 40 दिनों में बाजार तीन बातों पर नजर रखेगा. पहला- अमेरिका-ईरान तनाव किस दिशा में जाता है. दूसरा- जुलाई में अमेरिकी फेडरल रिजर्व क्या फैसला लेता है. तीसरा- अगस्त के मध्य तक दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ती है या पूरी तरह टूट जाती है. अगर इन मोर्चों पर राहत नहीं मिली तो बाजार में उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है.
भारत के लिए अगले 40 दिन क्यों अहम?
भारत ने तेल आयात के स्रोत बढ़ाकर अपनी स्थिति पहले से मजबूत जरूर की है लेकिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. अगर तनाव कम हुआ होर्मुज स्ट्रेट खुला रहा और कच्चा तेल फिर 75 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आया तो भारत को राहत मिल सकती है, लेकिन अगर जंग लंबी चली सप्लाई प्रभावित हुई और तेल 85-90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा.
रसोई गैस, CNG, महंगाई, रुपये और शेयर बाजार हर मोर्चे पर दबाव बढ़ सकता है. यानी पश्चिम एशिया में छिड़ा यह टकराव हजारों किलोमीटर दूर जरूर है लेकिन अगले 40 दिन यह तय करेंगे कि भारत में तेल कितना महंगा होगा महंगाई कितनी बढ़ेगी और आम आदमी की जेब पर कितना बोझ पड़ेगा.
