भारत की गर्मियां हमेशा से कोल्ड ड्रिंक्स कंपनियों के लिए बड़ा मौका रही हैं. चिलचिलाती धूप, पसीने से तर लोग और फ्रिज में ठंडी बोतलें… यह तस्वीर दशकों से बदली नहीं थी, लेकिन 2026 की गर्मी ने यह कैलकुलेशन पूरी तरह बदल दिया. देश का 1.1 लाख करोड़ रुपये का सॉफ्ट ड्रिंक्स बाजार इन दिनों एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है. किराना दुकानों के फ्रिज और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों के साथ-साथ अब छाछ, लस्सी और प्रोबायोटिक ड्रिंक्स भी जगह बना रहे हैं. यह बदलाव महज एक सीजन का नहीं है. यह भारतीय कंज्यूमर्स की सोच में आए एक गहरे बदलाव की कहानी है…
गर्मी ने तोड़ा रिकॉर्ड, बाजार ने बदली दिशा
इस साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया. एक तरफ जहां लोगों को ठंडक की तलाश थी, वहीं दूसरी तरफ उनकी पसंद बदल चुकी थी. कोरोना के बाद के दौर में लोग सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि सेहत भी ढूंढ रहे हैं.

मदर डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर जयतीर्थ चारी के मुताबिक, इस सीजन लस्सी और छाछ जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स ने 40% से ज्यादा की ग्रोथ दर्ज की है. क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी इनकी बढ़ोतरी देखी जा रही है.
यह ग्रोथ इतनी तेज है कि हेरिटेज फूड्स के CEO श्रीदीप केसवन कहते हैं कि कंपनी के रेवेन्यू में डेयरी बेवरेजेज का योगदान पिछले तीन साल में दोगुना हो चुका है. वहीं, पराग मिल्क फूड्स की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अक्षाली शाह ने बताया कि इस सेगमेंट में कंपनी की सालाना ग्रोथ 109% रही है.
इंस्टामार्ट के समर ट्रेंड्स 2026 रिपोर्ट भी इस बदलाव को साबित करती है. रिपोर्ट के मुताबिक, दही इस गर्मी में सबसे ज्यादा ऑर्डर किया जाने वाला प्रोडक्ट बनकर उभरा है. हैरान करने वाली बात यह है कि टॉप-10 सबसे ज्यादा ऑर्डर किए गए आइटम्स में से 6 आइटम दही से बने हैं.
कोल्ड ड्रिंक्स की मुश्किलें: टैक्स का बोझ और बदलती पसंद
कार्बोनेटेड ड्रिंक्स के पिछड़ने की 5 बड़ी वजहें हैं:
- टैक्स का बड़ा फर्क: कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पर 40% टैक्स लगता है (28% GST + 12% कम्पेंसेशन सेस), जबकि डेयरी ड्रिंक्स पर सिर्फ 5% GST लागू होता है. 35% का फर्क कंपनियों को 10 की कीमत पर प्रोडक्ट बेचने का मौका देता है. इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पर सबसे ज्यादा टैक्स लगता है.
- इनपुट लागत का दबाव: पीईटी रेजिन और एल्युमीनियम की बढ़ती कीमतें और मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से फ्रेट डिसरप्शन मिलकर कोल्ड ड्रिंक्स कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल रहे हैं. वरुण बेवरेजेज (पेप्सिको की सबसे बड़ी फ्रेंचाइजी बॉटलर) ने जनवरी-मार्च 2026 में 18.3% रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज की, लेकिन उसी दौरान इनपुट लागत करीब 18% बढ़ गई.
- एल्युमीनियम कैन की कमी: ईरान युद्ध की वजह से एल्युमीनियम कैन की ग्लोबल सप्लाई पर असर पड़ा है, जिससे कैन वाले कोल्ड ड्रिंक्स की कमी हो गई है. अप्रैल 2026 में कार्बोनेटेड ड्रिंक्स की बिक्री में सालाना आधार पर 19.4% की गिरावट आई.
- हेल्थ अवेयरनेस: कोरोना के बाद लोगों ने खान-पान पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है. लस्सी और छाछ को प्रोबायोटिक और कम शुगर वाला हेल्दी विकल्प माना जाता है.
- बदलता यंगस्टर्स का नजरिया: लाहौरी जीरा के को-फाउंडर निखिल डोडा का कहना है, ‘भारतीय बेवरेज मार्केट इस वक्त बहुत डायनामिक है. भारतीय बाजार बेवरेजेज की मजबूत ग्रोथ देख रहे हैं, क्योंकि कई कंज्यूमर्स वेस्टर्न कोलस के मुकाबले देसी फ्लेवर्स को तवज्जोह दे रहे हैं.’
देसी बेवरेज की वापसी: कैसे पलटी बाजी
देसी बेवरेज की वापसी की 7 बड़ी वजहें हैं:
- मॉडर्न पैकेजिंग और ट्रेडिशनल टेस्ट: कोकम, जलजीरा, आम पना और छाछ जैसी ड्रिंक्स अब हाइजीनिक पैकेजिंग में आ रही हैं. मदर डेयरी ने प्रोबायोटिक छाछ और मिंट छाछ जैसे नए वेरिएंट 10 रुपए की एंट्री-प्राइस पर लॉन्च किए हैं.
- क्विक-कॉमर्स का बूस्ट: इंस्टामार्ट के मुताबिक, जीरा मसाला सोडा ने मार्च में 900% की मंथली ग्रोथ दर्ज की, जबकि कोल्ड कॉफी ने करीब 700% की बढ़ोतरी देखी. छाछ, लस्सी और नारियल पानी जैसे रेगुलर ड्रिंक्स ने भी हाई डिमांड दर्ज की.
- शाम 6-9 बजे का गोल्डन टाइम: इंस्टामार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, बेवरेज कंजम्पशन की पीक शाम 6 से 9 बजे के बीच होती है. इसी समय आइसक्रीम की डिमांड भी दोगुनी हो जाती है.
- देसी फ्लेवर्स का दबदबा: देसी बेवरेजेज की मार्केट शेयर 2024 के 2% से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 6-7% हो गई है. वहीं, भारत का छाछ मार्केट 2025 में 16.13% की दर से बढ़ रहा है, जो 2029 तक 18.93% तक पहुंचने का अनुमान है.
- डेयरी सेक्टर का बड़ा आंकड़ा: भारत की पैकेज्ड फूड और बेवरेज इंडस्ट्री 9.51 लाख करोड़ रुपए की है, जो 2030 तक 14.27 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है. डेयरी ड्रिंक्स मार्केट 2031 तक 4.23 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है.
- लस्सी मार्केट का अनुमान: 2025 में भारत का लस्सी मार्केट 65.5 बिलियन डॉलर (करीब 6,550 करोड़ रुपए) का था, जो 2034 तक 264.9 बिलियन डॉलर (करीब 26,490 करोड़ रुपए) तक पहुंचने का अनुमान है.
- कोल्ड ड्रिंक्स पर असर: कार्बोनेटेड सॉफ्ट ड्रिंक्स सेगमेंट अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पा रहा है. GST के तहत टैक्स बड़ी बाधा है. GST कम्पेंसेशन सेस खत्म होने के बाद भी सरकार ने एरेटेड बेवरेजेज पर टैक्स 28% से बढ़ाकर 35% करने का प्रस्ताव रखा है.
बेवरेज अब नेस्ले, हिंदुस्तान यूनिलीवर, टाटा कंज्यूमर और डाबर जैसी बड़ी FMCG कंपनियों के लिए सबसे बड़ा ग्रोथ ड्राइवर बन गया है:
- हिंदुस्तान यूनिलीवर ने कॉफी और हॉर्लिक्स-बूस्ट सेगमेंट में स्ट्रॉन्ग डबल-डिजिट ग्रोथ दर्ज की.
- टाटा कंज्यूमर के रेडी-टू-ड्रिंक पोर्टफोलियो में 23% की बढ़ोतरी हुई.
- डाबर का नारियल पानी का बिजनेस दोगुना हुआ, जबकि रियल जूस में 26% ग्रोथ रही.
- पेप्सिको की मार्च तिमाही में 63% वॉल्यूम सेल्स कम-शुगर और जीरो-शुगर प्रोडक्ट्स की रही.
क्या लस्सी-छाछ बढ़त महज गर्मी का ट्रेंड है?
यह बदलाव लंबे समय तक रहने की तीन बड़ी वजहें हैं:
- टैक्स का फर्क बना रहेगा: जब तक कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पर 40% और डेयरी ड्रिंक्स पर 5% टैक्स का फर्क बना रहेगा, तब तक कीमत का फायदा देसी बेवरेजेज को मिलता रहेगा. 71% कार्बोनेटेड ड्रिंक ट्रांजैक्शन 20 रुपए या उससे कम की होती हैं. यूजर्स के लिए यह फर्क बहुत मायने रखता है.
- हेल्थ ट्रेंड बढ़ेगा: कोरोना के बाद हेल्थ के लिए जागरूकता बढ़ी है. लस्सी और छाछ को प्रोबायोटिक, कम शुगर और न्यूट्रिएंट से भरपूर माना जाता है. यह ट्रेंड उलटने के कोई संकेत नहीं दिख रहे.
- कंपनियों का बदला फोकस: पराग मिल्क फूड्स, मदर डेयरी और हेरिटेज फूड्स जैसी कंपनियां प्रोटीन, हेल्थ और वेलनेस प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रही हैं. पराग ने 15 ग्राम प्रोटीन वाली अवतार प्रोटीन कोल्ड कॉफी लॉन्च की है, यानी इनोवेशन भी इसी दिशा में हो रहा है.

