
Indian Traditional Houses Double Door Design: आजकल ज्यादातर घरों में सिंगल पैनल या स्लाइडिंग दरवाजे देखने को मिलते हैं. शहरों से लेकर गांवों तक नए घरों का डिजाइन काफी बदल चुका है. लेकिन अगर आप पुराने गांवों या अपने दादा-दादी के जमाने के मकानों पर नजर डालें, तो वहां अक्सर दो पल्लों वाले बड़े-बड़े लकड़ी के दरवाजे दिखाई देंगे. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पहले के समय में दो पल्लों वाले दरवाजे ही क्यों लगाए जाते थे?
दरअसल, यह डिजाइन केवल सुंदरता के लिए नहीं था, बल्कि इसके पीछे कई व्यावहारिक और वास्तु संबंधी कारण छिपे हुए थे.
बड़े परिवारों और आयोजनों के लिए थे सुविधाजनक
पुराने समय में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था. एक ही घर में कई लोग रहते थे और शादी-ब्याह या अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में मेहमानों की संख्या भी ज्यादा होती थी. ऐसे में दो पल्लों वाले दरवाजे पूरी तरह खोल देने पर प्रवेश और निकास का रास्ता काफी चौड़ा हो जाता था. इससे लोगों के आने-जाने के साथ-साथ बड़े सामान को अंदर-बाहर ले जाना भी आसान हो जाता था.
प्राइवेसी बनाए रखने में मिलती थी मदद
दो पल्लों वाले दरवाजों का एक बड़ा फायदा यह भी था कि जरूरत पड़ने पर केवल एक पल्ला खोला जा सकता था. इससे बाहर खड़े व्यक्ति से बातचीत या सामान का लेन-देन तो हो जाता था, लेकिन घर का पूरा अंदरूनी हिस्सा दिखाई नहीं देता था. इससे परिवार की निजता बनी रहती थी.
भारी लकड़ी के वजन को संभालने का बेहतर तरीका
पहले के दरवाजे मजबूत और टिकाऊ लकड़ियों जैसे सागौन, शीशम या नीम से बनाए जाते थे. यदि इतने बड़े दरवाजे को एक ही पैनल में बनाया जाता, तो उसका वजन काफी अधिक हो जाता. इससे कब्जों और दीवारों पर दबाव बढ़ता. दो हिस्सों में बांटने से वजन संतुलित रहता और दरवाजे लंबे समय तक सुरक्षित बने रहते थे.
हवा और रोशनी का बेहतर प्रबंधन
पुराने घरों में प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा को विशेष महत्व दिया जाता था. दो पल्लों वाले दरवाजों को आवश्यकता के अनुसार आधा या पूरा खोला जा सकता था. इससे घर के अंदर हवा का प्रवाह बेहतर बना रहता था और मौसम के अनुसार वेंटिलेशन को नियंत्रित करना भी आसान हो जाता था.

यही कारण है कि पुराने जमाने के दो पल्लों वाले दरवाजे केवल एक डिजाइन नहीं, बल्कि उस दौर की जरूरतों और समझदारी का बेहतरीन उदाहरण माने जाते हैं.
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