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ईरान-अमेरिका समझौते पर मंडराया संकट:वेंस बोले- अब ईरान की परीक्षा शुरू, इस्राइल को हमारी मदद नहीं भूलनी चाहिए – Jd Vance Warns Tehran Over Iran-us Deal Vance Says Their Behavior Will Now Face A Real Test

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ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध विराम और शांति समझौते की दिशा में बढ़ी प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने घोषणा की है कि दोनों देशों के बीच 60 दिन की आधिकारिक वार्ता अवधि शुरू हो गई है। इस दौरान यह तय होगा कि ईरान समझौते की शर्तों का पालन करता है या नहीं। हालांकि अमेरिका ने समझौते को बड़ी सफलता बताया है, लेकिन वेंस के बयानों से साफ है कि वाशिंगटन अब भी तेहरान के रवैये को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। यही वजह है कि समझौते पर संकट के बादल अभी भी बने हुए हैं।

नेतन्याहू पर क्या बोले वेंस?

उपराष्ट्रपति वेंस ने इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर नाराज होने की खबरों को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि मीडिया में आई रिपोर्टें उनकी नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत को नहीं दर्शाती हैं। वेंस ने कहा कि उनकी बातचीत में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई जिससे लगे कि नेतन्याहू समझौते को लेकर बेहद नाराज हैं।


इस्राइल को हमारी मदद नहीं भूलनी चाहिए- वेंस

वेंस ने इस्राइल के कुछ मंत्रियों द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस समय पूरी दुनिया में ट्रंप ही ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं जो इस्राइल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। वेंस ने याद दिलाया कि पिछले तीन महीनों में इस्राइल की सुरक्षा में इस्तेमाल हुए लगभग दो-तिहाई रक्षात्मक हथियार अमेरिकी सहयोग से उपलब्ध हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस्राइल में जो लोग यह सोचते हैं कि उनकी सबसे बड़ी समस्या अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, उन्हें वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए। वेंस के बयान को अमेरिका-इस्राइल संबंधों और ईरान समझौते पर जारी बहस के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या है 60 दिन की वार्ता अवधि और क्यों अहम है?

जेडी वेंस ने कहा कि समझौता भले ही एक दिन पहले लागू हुआ हो, लेकिन 60 दिन की आधिकारिक बातचीत अवधि अब शुरू हुई है। इस दौरान अमेरिका ईरान के व्यवहार, उसकी प्रतिबद्धताओं और समझौते के पालन की निगरानी करेगा। वेंस ने कहा कि अब यह देखा जाएगा कि क्या ईरान ट्रंप की शांति योजना के अगले चरण का पालन करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान अपना रवैया बदलता है तो उसके लिए पश्चिम एशिया और वैश्विक समुदाय के साथ नए संबंधों का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो समझौते के लाभ उसे नहीं मिलेंगे।


मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की क्या मांग है?

वेंस ने दावा किया कि अमेरिकी कार्रवाई में ईरान की बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें और उनके लॉन्चर नष्ट कर दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी देश से आत्मरक्षा का अधिकार नहीं छीनना चाहता। जैसे इस्राइल को आत्मरक्षा का अधिकार है, वैसे ही ईरान को भी है। लेकिन अंतिम समझौते का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान ऐसे मिसाइल विकसित न कर सके जो व्यापक स्तर पर दुनिया के लिए खतरा बनें। वेंस ने यह भी दावा किया कि ईरान का परमाणु हथियार कार्यक्रम पूरी तरह नष्ट हो चुका है और उसे फिर से खड़ा करने के लिए भारी संसाधनों की आवश्यकता होगी।



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क्या आर्थिक दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश हो रही है?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि फिलहाल ईरान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में है। उनके अनुसार अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखा है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक तेहरान अपने व्यवहार में मूलभूत बदलाव नहीं दिखाता। वेंस ने कहा कि समझौते के तहत समृद्ध यूरेनियम के भंडार को भी समाप्त किया जाना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोबारा पूरी तरह शामिल होने के लिए यह साबित करना होगा कि वह क्षेत्रीय अस्थिरता और आतंकवाद को समर्थन नहीं दे रहा है।



होर्मुज जलडमरूमध्य में क्या बदला?

वेंस ने कहा कि समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उनके अनुसार एक रात में 1.25 करोड़ बैरल तेल इस मार्ग से गुजरा, जो संघर्ष शुरू होने के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। उन्होंने कहा कि लगातार दूसरी रात ईरान ने किसी भी जहाज को निशाना नहीं बनाया। वेंस के मुताबिक अमेरिका ने भी अपनी प्रतिबद्धता निभाते हुए ईरानी बंदरगाहों तक एक दर्जन से अधिक जहाजों को पहुंचने की अनुमति दी है। इसके साथ ही नाकेबंदी में ढील दी गई है, जिससे ईरान को सीमित स्तर पर तेल निर्यात की अनुमति मिली है।

क्या तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिली है?

अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि समझौते के शुरुआती असर दिखाई देने लगे हैं। वेंस ने कहा कि तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंच गई हैं और अमेरिका में गैस की कीमतें भी कम हुई हैं। उनके अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में सुधार हुआ है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों को राहत मिली है। हालांकि विशेषज्ञों की नजर इस बात पर है कि यह स्थिति कितने समय तक बनी रहती है और क्या दोनों पक्ष समझौते की शर्तों का पालन करते हैं।



क्या समझौते का भविष्य अब ईरान के हाथ में है?

वेंस ने स्वीकार किया कि कई लोग इस समझौते को लेकर संदेह जता रहे हैं और मानते हैं कि ईरान अपना व्यवहार नहीं बदलेगा। लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इतनी कमजोर स्थिति में पहुंचे ईरान को बदलने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए। अमेरिका का मानना है कि सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक दबाव के बाद अब तेहरान के पास समझौते का पालन करने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं। आने वाले 60 दिन यह तय करेंगे कि यह समझौता पश्चिम एशिया  में स्थायी शांति का आधार बनेगा या फिर क्षेत्र एक बार फिर नए तनाव और टकराव की ओर बढ़ेगा।

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