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Us Iran Deal:समझौते के बाद भी अमेरिका के हाथ खाली, विशेषज्ञ बोले- उल्टा यूएस को नुकसान ही उठाना पड़ा – Us Iran Peace Deal Experts Said Only Restores Pre-war Status Quo Objectives Unfulfilled

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अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समझौते के बाद भी अमेरिका के हाथ खाली हैं और अमेरिका अपने कोई भी लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच शांति समझौता केवल युद्ध की पूर्व यथास्थिति की बहाली है। अगले 60 दिनों में होने वाली बातचीत तय करेगी कि अमेरिका को इस युद्ध और तबाही से कुछ हासिल होगा भी या नहीं। यह बात सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के पश्चिम एशिया प्रोग्राम के वरिष्ठ फेलो विल टॉडमैन ने कही। 

युद्ध के पूर्व स्थिति ही बहल हो पाई

टॉडमैन के अनुसार, इस समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना है, जिससे स्थिति अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर हमले से पहले जैसी ही होगी। उन्होंने कहा, ‘इस समय तक अमेरिका, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्ध शुरू करते समय तय किए गए किसी भी प्रमुख लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है।’

अमेरिका और ईरान रविवार को होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने पर सहमत हुए। इस कदम से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक के जरिए तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति फिर शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि समझौते का पूरा विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। ईरान ने संकेत दिया है कि औपचारिक हस्ताक्षर समारोह के बाद ही समझौते को लागू किया जाएगा। औपचारिक समारोह शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित होगा।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक की कोई बात नहीं

समझौते में ईरान के उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम भंडार और उसके परमाणु कार्यक्रम से जुड़े लंबित मुद्दों पर बातचीत के लिए 60 दिनों की समय-सीमा भी तय की गई है। अमेरिका और इस्राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। उन्होंने कहा कि अगले 60 दिनों की बातचीत यह तय करेगी कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के संबंध में अमेरिका अपने लक्ष्यों को हासिल कर पाता है या नहीं।

टॉडमैन का मानना है कि ईरान परमाणु मुद्दों पर बड़े समझौते करने को तैयार नहीं होगा और उसे लगता है कि समय उसके पक्ष में है। उन्होंने कहा, ‘ईरान संभवतः वार्ताओं को लंबा खींचने की कोशिश करेगा क्योंकि उसे नहीं लगता कि राष्ट्रपति ट्रंप मध्यावधि चुनावों से पहले फिर से सैन्य कार्रवाई करेंगे। ऐसे में अमेरिका के लिए अपने उद्देश्यों को हासिल करना कठिन होगा।’ टॉडमैन के मुताबिक समझौते के बाद ईरान के पश्चिम एशिया में और अधिक आर्थिक रूप से एकीकृत होने की संभावना है। अरब खाड़ी देश तेहरान के साथ आर्थिक परस्पर निर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं ताकि भविष्य में किसी संभावित हमले को रोका जा सके।

अमेरिका को उठाना पड़ा भारी रणनीतिक नुकसान

विशेषज्ञ के अनुसार तीन महीने से अधिक चले युद्ध ने अमेरिका के अपने प्रमुख क्षेत्रीय साझेदारों और सहयोगियों के साथ संबंधों को भी नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि अरब खाड़ी देशों को महसूस हुआ कि अमेरिका ने युद्ध से पहले और उसके दौरान उनकी चिंताओं और हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। इसी कारण ये देश अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम की जा सके।

टॉडमैन ने कहा, ‘यह संभावना कम है कि राष्ट्रपति ट्रंप या भविष्य का कोई अमेरिकी प्रशासन इस भरोसे की कमी को दूर करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पूंजी खर्च करेगा। ऐसे में अमेरिका और अरब खाड़ी देशों के संबंध धीरे-धीरे कमजोर हो सकते हैं।’ उन्होंने कहा कि इस युद्ध ने अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी दूरी बढ़ा दी है, क्योंकि अधिकांश पश्चिमी देशों ने युद्ध का समर्थन नहीं किया था। टॉडमैन के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप सार्वजनिक रूप से नाटो की आलोचना कर चुके हैं कि उसने युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया। उन्होंने कहा कि यह विवाद ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को और कमजोर करने वाला एक नया कारण बन गया है।

अमेरिका-इस्राइल के संबंधों में भी उभरे मतभेद

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और इस्राइल के हितों के बीच अभूतपूर्व मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं। इस्राइली सरकार को आशंका है कि यह समझौता उसकी सुरक्षा के लिए ईरान से उत्पन्न खतरे को पूरी तरह खत्म नहीं करता और भविष्य में उस खतरे के खिलाफ कार्रवाई की उसकी क्षमता को भी सीमित कर सकता है।

 

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