- भू-राजनीतिक संकट से बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ा.
Brent & WTI Decline: अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता में सकारात्मक प्रगति हुई है. इससे बाजार को उम्मीद है कि पिछले 3 महीने से बंद पड़ा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ दोबारा खुल जाएगा और दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई सामान्य हो जाएगी.
इसी खबर के बाद आज अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेज की कीमतों में तेजी से गिरावट आई है. ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 5.4% तक गिरकर 97.97 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 92 डॉलर से नीचे कारोबार कर रहा है.
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह गिरावट भारत के लिए काफी राहत भरी बात है, जो अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल आयात करता है. इधर, क्रूड ऑयल की कम होती कीमतों के बीच भारत में सरकारी तेल कंपनियों ने पिछले 10 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम करीब 7.50 रुपये तक बढ़ा दिए हैं. इससे बेशक जेहन में इस ख्याल का आना लाजिमी है कि आने वाले समय में देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होगी, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है.
क्यों बढ़ेगी पेट्रोल-डीजल की कीमत?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स और Kotak Securities की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच तेल कंपनियों का हिसाब अब भी सही नहीं बैठ रहा है. 28 फरवरी से शुरू हुई ईरान-अमेरिका में जंग ने कच्चे तेल की कीमतों को 70 डॉलर प्रति बैरल से 114 डॉलर प्रति बैरल पर ला खड़ा कर दिया है. इस बीच तेल कंपनियों ने पूरे 76 दिनों तक कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की और महंगे आयात का बोझ खुद उठाया.
Livemint के फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि दोनों देशों में जंग शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की लागत में 39% का भारी उछाल आया, जबकि उस मुकाबले पेट्रोल-डीजल के दाम अभी सिर्फ 3-7% के बीच ही बढ़ाए गए हैं. ऐसे में कंपनियों को अपना पूरा घाटा वसूलने के लिए कीमतों में सैद्धांतिक रूप से 11-14 रुपये प्रति लीटर की ओर बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.
कीमतें बढ़ने की यह भी एक वजह
पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने की एक और वजह यह है कि भले ही आज कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 98 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गई है, लेकिन होर्मुज पर तनाव अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है. अगर अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता सफल हो भी जाती है, तो स्थिति के सामान्य होने में अभी वक्त लगेगा.
ऊपर से इस भू-राजनीतिक संकट के कारण अमेरिका और उत्तरी यूरोप से आने वाले तेल टैंकरों का समुद्री बीमा प्रीमियम और फ्रेंट चार्ज (माल ढुलाई पर खर्च) काफी बढ़ चुका है. इसकी भरपाई भी अंतत रिटेल कीमतें बढ़ाकर ही की जाएंगी.
अभी भी हो रहा नुकसान
पेट्रोल-डीजल की कीमतें 4 बार बढ़ाने के बाद भी तेल कंपनियों को पेट्रोल पर प्रति लीटर 10 रुपये और डीजल पर प्रति लीटर 13 रुपये का नुकसान हो रहा है. रोज के स्तर पर इतनी बड़ी रकम का नुकसान कंपनियां लंबे समय तक उठा नहीं सकतीं इसलिए वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए कीमतें बढ़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता है.
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