यमन इस समय सिर्फ एक गृहयुद्ध से जूझ रहा देश नहीं है, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति के कारण पूरा पश्चिम एशिया और दुनिया का समुद्री व्यापार भी उससे प्रभावित होता है. उत्तर में सऊदी अरब, पूर्व में ओमान, पश्चिम में लाल सागर और दक्षिण में अदन की खाड़ी व अरब सागर से घिरा यमन बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास स्थित है. यह समुद्री रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
यमन में लंबे समय से सत्ता को लेकर संघर्ष चल रहा है. एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार है, जिसका केंद्र अदन है. दूसरी तरफ हूती आंदोलन है, जिसने राजधानी सना समेत देश के बड़े आबादी वाले हिस्सों पर अपना प्रभाव कायम कर रखा है. हाल के दिनों में हूतियों की पश्चिमी तट की ओर बढ़त ने बाब अल-मंदेब को लेकर चिंता और बढ़ा दी है. रॉयटर्स के अनुसार, हूती बल मोचा और धुबाब जैसे तटीय इलाकों के करीब पहुंच गए हैं.
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यमन में दो अलग-अलग सत्ता केंद्र
यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का प्रतिनिधित्व प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल यानी PLC करती है. इसके अध्यक्ष रशाद अल-अलीमी हैं. इस सरकार को सऊदी अरब का समर्थन प्राप्त है और संयुक्त राष्ट्र भी इसी पक्ष को यमन की मान्यता प्राप्त सरकार के रूप में मानता है. सरकार का प्रशासनिक केंद्र अदन में है. दूसरी तरफ हूती आंदोलन ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद से सना और उत्तर-पश्चिमी यमन के बड़े हिस्से में हूतियों का प्रभाव बना हुआ है. हालिया लड़ाई में उनका असर लाल सागर के तटीय इलाकों तक बढ़ने की खबरें भी सामने आई हैं.
यमन के नक्शे पर सरकार के नियंत्रण वाला इलाका क्षेत्रफल के हिसाब से बड़ा दिखाई दे सकता है, लेकिन देश के पश्चिम और उत्तर में बड़ी आबादी रहती है. यही कारण है कि केवल जमीन के क्षेत्रफल को देखकर यह समझना सही नहीं होगा कि किस पक्ष का प्रभाव कितना है.
हूती कौन हैं और उनका ईरान से क्या संबंध है?
हूती आंदोलन की जड़ें उत्तरी यमन के जैदी शिया समुदाय में हैं. जैदी समुदाय का उत्तरी यमन में सदियों पुराना इतिहास रहा है. 1962 की क्रांति के बाद यमन में इमामत व्यवस्था खत्म हुई और गणतांत्रिक शासन की शुरुआत हुई. समय के साथ उत्तरी यमन में सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ा. इसी माहौल से हूती आंदोलन मजबूत हुआ. शुरुआत में आंदोलन का जोर जैदी पहचान और धार्मिक-सामाजिक अधिकारों की रक्षा तथा केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध पर था. 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह की सरकार और हूती आंदोलन के बीच खुला संघर्ष शुरू हुआ. हुसैन अल-हूती की मौत के बाद उनके भाई अब्दुल मालिक अल-हूती आंदोलन के प्रमुख नेता बने.
हूतियों को ईरान से राजनीतिक और सैन्य समर्थन मिलने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं. मिसाइल, ड्रोन और सैन्य तकनीक के मामले में ईरान के साथ उनके संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा होती रही है. हालांकि यमन का संघर्ष केवल शिया और सुन्नी के बीच धार्मिक लड़ाई मानना तस्वीर को बहुत छोटा कर देता है. सत्ता, संसाधन, स्थानीय जनजातीय राजनीति और सऊदी अरब तथा ईरान की क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
2014 में सना पर कब्जे के बाद बदली तस्वीर
2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह की पकड़ कमजोर हुई. इसी दौर में हूतियों का प्रभाव बढ़ता गया. 2014 में हूतियों ने सालेह के समर्थकों के साथ गठजोड़ करते हुए सना पर कब्जा कर लिया. इसके बाद यमन की मान्यता प्राप्त सरकार को दक्षिण की ओर जाना पड़ा. 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू किया. इसके बाद संघर्ष ने क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लिया.
लड़ाई के दौरान हूतियों ने सऊदी अरब के सैन्य और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाया. दूसरी ओर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए. इस संघर्ष ने यमन में मानवीय संकट को भी गंभीर बनाया. 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से एक युद्धविराम हुआ था, जिसके बाद हिंसा में काफी कमी आई, लेकिन स्थायी राजनीतिक समझौता नहीं हो सका और अब संघर्ष दोबारा तेज होता दिखाई दे रहा है. Reuters के मुताबिक, हालिया लड़ाई में हजारों लोग दक्षिण की ओर भागे हैं और 1 लाख से अधिक लोगों के विस्थापित होने की बात सामने आई है.
बाब अल-मंदेब क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
यमन का सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से जुड़ा है. यह लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित संकरा समुद्री मार्ग है. इसके रास्ते जहाज लाल सागर में प्रवेश करते हैं और आगे स्वेज नहर के जरिए यूरोप तक पहुंच सकते हैं. अगर इस रास्ते पर बड़े स्तर पर खतरा पैदा होता है तो तेल, गैस और दूसरे सामान ले जाने वाले जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है. इससे माल ढुलाई की लागत और यात्रा का समय दोनों बढ़ सकते हैं. यही वजह है कि पश्चिमी यमन के तटीय इलाकों में हूतियों की हालिया बढ़त को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता बढ़ी है. रॉयटर्स के अनुसार, हूती बल मोचा और धुबाब जैसे इलाकों पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जो बाब अल-मंदेब के बेहद करीब हैं.
भारत के लिए भी यमन क्यों अहम है?
भारत के लिए यमन का महत्व केवल पश्चिम एशिया की राजनीति तक सीमित नहीं है. लाल सागर और बाब अल-मंदेब के रास्ते भारत का यूरोप और पश्चिमी बाजारों के साथ समुद्री व्यापार जुड़ा हुआ है. इसलिए इस इलाके में लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर भारतीय कारोबार और समुद्री परिवहन की लागत पर भी असर पड़ सकता है. भारत ने यमन में अपनी राजनयिक मौजूदगी को लेकर भी बदलाव किया है. सना में भारतीय दूतावास की सामान्य गतिविधियां युद्ध की परिस्थितियों से प्रभावित रही हैं. भारत ने 1 अक्टूबर 2025 से अदन में अपना प्रतिनिधि कार्यालय शुरू किया है. भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, इसका उद्देश्य यमन में कांसुलर सेवाओं को आसान बनाना है.
क्या यह सिर्फ शिया बनाम सुन्नी की लड़ाई है?
यमन के संघर्ष को केवल शिया बनाम सुन्नी संघर्ष कहना सही नहीं होगा. हूती आंदोलन की वैचारिक जड़ें जैदी शिया परंपरा में जरूर हैं, लेकिन उनके साथ समय-समय पर अलग-अलग जनजातीय और राजनीतिक समूह भी जुड़े हैं. इसी तरह सरकार के साथ खड़े सभी समूहों को केवल एक धार्मिक पहचान से नहीं समझा जा सकता. दक्षिणी अलगाववादी समूहों समेत यमन में कई राजनीतिक और सैन्य गुट हैं, जिनके अपने हित और लक्ष्य हैं, इसलिए यमन की लड़ाई को समझने के लिए धर्म के साथ सत्ता, क्षेत्रीय राजनीति, जनजातीय समीकरण, आर्थिक संसाधन और सऊदी-ईरान प्रतिद्वंद्विता को भी देखना जरूरी है.
मक्का ड्रोन विवाद में क्या हुआ?
हाल के घटनाक्रम में सऊदी अरब ने दावा किया कि हूतियों की ओर से मक्का के पास ड्रोन हमला करने की कोशिश की गई, जिसे सऊदी वायु रक्षा ने रोक दिया. हूती पक्ष ने इस आरोप को खारिज किया है और कहा है कि उसने मक्का या किसी अन्य पवित्र स्थल को निशाना नहीं बनाया. इसलिए इस मामले में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना जरूरी है. इस घटना के बाद इस्लामिक सहयोग संगठन यानी OIC ने सऊदी अरब के खिलाफ हूती हमलों की निंदा की और सऊदी सुरक्षा के प्रति समर्थन जताया है. OIC की स्वतंत्र मानवाधिकार संस्था ने भी सऊदी अरब में नागरिकों और महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे पर हूती हमलों की निंदा की है.
यमन की लड़ाई अब क्षेत्रीय संकट क्यों बन रही है?
यमन की मौजूदा लड़ाई का असर देश की सीमाओं से बाहर निकल चुका है. एक तरफ हूती और सऊदी समर्थित यमनी बल आमने-सामने हैं, दूसरी तरफ लाल सागर और बाब अल-मंदेब में समुद्री सुरक्षा का सवाल है. इसके साथ सऊदी तेल ढांचे पर हमले और क्षेत्रीय तनाव ने ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है. अगर हूती बाब अल-मंदेब के आसपास अपनी पकड़ और मजबूत करते हैं तो लाल सागर के समुद्री मार्ग पर जोखिम बढ़ सकता है. दूसरी ओर, लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई यमन में मानवीय संकट को और गहरा कर सकती है.
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