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‘वैकल्पिक नौकरी देनी चाहिए थी’:crpf को घायल जवान को नौकरी से हटाना पड़ा भारी, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार – Crpf Faces Backlash For Removing Injured Jawan From Service Supreme Court Reprimands The Force.

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की आलोचना की। बल ने सेवा के दौरान दृष्टिहीनता के शिकार हुए एक ड्राइवर को वैकल्पिक पद पर समायोजित करने के बजाय चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर दिया था। न्यायालय ने कहा कि बल एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने कर्तव्य में विफल रहा।

न्यायालय ने पूर्व कांस्टेबल को 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया। यह राशि बकाया वेतन, ब्याज और लागत के लिए है। न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के बहाली के निर्देश को संशोधित किया, क्योंकि कांस्टेबल पहले ही सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं।

सरकार की अपील को क्यों खारिज की?


न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी। यह अपील हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि सीआरपीएफ ने दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 47 का उल्लंघन किया। सीआरपीएफ ने प्रतिवादी को सेवा में बनाए रखने के बजाय चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर दिया था। न्यायालय ने पाया कि सीआरपीएफ उसे वैकल्पिक पद देने में विफल रहा। यह सरकारी प्रतिष्ठानों पर धारा 47 के तहत एक कर्तव्य है।

कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायालय ने कहा कि दिव्यांगजन अधिनियम की धारा 47 अनिवार्य प्रकृति की है। यह उचित समायोजन के अधिकार को दिखाती है। न्यायालय ने साफ किया कि अगर सेवा के दौरान शारीरिक दिव्यांगता आती है, तो व्यक्ति को समान वेतन और सेवा लाभ वाले किसी अन्य पद पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए। अगर यह संभव नहीं है, तो नियोक्ता को उसे किसी अन्य पद पर समायोजित करना होगा। इसके लिए एक सुपरन्यूमेरी पद भी बनाया जा सकता है।

पीठ ने सीआरपीएफ द्वारा संदर्भित 2002 की अधिसूचना का भी जिक्र किया। इस अधिसूचना ने सीआरपीएफ के लड़ाकू कर्मियों को अधिनियम की धारा 47 के आवेदन से छूट दी थी। न्यायालय ने कहा कि अधिसूचना 2002 में जारी की गई थी, न कि तब जब प्रतिवादी को 11 मार्च, 1998 को अयोग्य घोषित किया गया था। न्यायालय ने साफ किया कि एक प्रत्यायोजित कानून पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं हो सकता। दिव्यांगजन अधिनियम 1995 में लागू हुआ था। वहीं, प्रतिवादी को 1998 में सेवा से चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित किया गया था।

क्या है पूरा मामला? 

दरअसल, सीआरपीएफ में 1985 से ड्राइवर के पद पर कार्यरत एक व्यक्ति को 1996 में नेत्र रोग हो गया। जांच में पता चला कि उनकी बाईं आंख पूरी तरह अंधी हो गई और दाहिनी आंख की दृष्टि आंशिक रूप से कमजोर हो गई। सीआरपीएफ चिकित्सा बोर्ड ने उन्हें सेवा के लिए स्थायी रूप से अयोग्य घोषित कर दिया। 11 मार्च, 1998 को उन्हें सेवा से हटा दिया गया। उन्होंने पूर्ण वित्तीय और सेवा लाभों की मांग की, लेकिन उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। 

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