चुनाव खत्म हो गए। अब बारी चुनावी वादों को पूरा करने की है। नई सरकारों के सामने राज्यों पर लदे कर्ज, कम आमदनी व बढ़ते खर्च जैसे संकट सामने खड़े हैं। चुनावी वादों के एक्सप्रेसवे पर यह स्पीड ब्रेकर की तरह दिखने लगे हैं। बंगाल, असम में भाजपा की नई सरकार के सामने जो संकट है, उससे कहीं बड़ा संकट तमिलनाडु में टीवीके सरकार के सामने आने वाला है, जिसने सोना बांटने की भी बात कही है। जहां डबल इंजन की सरकार है, वहां यह संकट अपेक्षाकृत कम होगा।

बंगाल की जर्जर हालत, सातवें वेतनमान की आस : 15 साल में बंगाल पर कर्ज चार गुना बढ़कर 8 लाख करोड़ से ज्यादा का हो गया है। अब भाजपा सरकार को सोनार बांग्ला बनाने के लिए बड़ी रकम का इंतजाम करना होगा। हर महिला को तीन हजार महीना देने व एक करोड़ कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें के अनुरूप वेतन दिलाने का काम करने हैं। युवा स्नातकों को तीन हजार रुपये देने का वादा भी निभाना है।
विजय के सामने जर्जर खजाना
फिल्म स्टार से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके ने गरीबों को मिलने वाली सहायता राशि 1,000 से बढ़ाकर 2,500 रुपये करने का वादा किया था। इसे पूरा करने के लिए हर साल 14,411 करोड़ के बजाए अब 36,029 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। इसके लिए 21,617 करोड़ अलग से जुटाने होंगे। टीवीके का घोषणापत्र में शादी सहायता के रूप में 8 ग्राम सोना, कमजोर वर्ग की महिलाओं को शादी पर रेशमी साड़ी, प्रत्येक परिवार को सालाना 6 मुफ्त सिलेंडर देना शामिल है।
स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के परिवारों को सालाना 15,000 रुपये देने, बेरोजगार स्नातकों को 4,000 तक मासिक सहायता देने, 5 लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा भी है। पांच एकड़ से कम जमीन वाले किसानों के फसल ऋण की पूर्ण माफी और बड़े किसानों के लिए 50% तक ऋण माफी भी होगी। वरिष्ठ नागरिकों 3,000 मासिक पेंशन, 200 यूनिट मुफ्त बिजली भी दी जाएगी। सारे वादे पहले साल में न भी पूरे हों, तो भी पहले साल एक लाख करोड़ का खर्च तो आ ही जाएगा।
बंगाल, केरलम व पंजाब जैसे राज्य बड़े राजकोषीय घाटे के दायरे में
नीति आयोग की राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल, केरल और पंजाब जैसे राज्य बड़े राजकोषीय घाटे और ऋण का सामना कर रहे हैं। राजस्व, व्यय और कर्ज के मामले में इन राज्यों की हालत नाजुक है। पंजाब, पश्चिम बंगाल, और केरल में लगातार राजस्व घाटे है।
बाढ़ मुक्त असम के लिए 18,000 करोड़ की जरूरत
यहां सत्तारूढ़ भाजपा ने 31 वादे किए थे। इसमें बाढ़ मुक्त असम मिशन शुरू करने के लिए 18,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करना होगा। 2 लाख सरकारी नौकरियां देने का काम भी करना है। एक जिला, एक मेडिकल कॉलेज, एक विश्वविद्यालय, एक इंजीनियरिंग कॉलेज की योजना के लिए बड़ी रकम की जरूरत है। महिलाओं को, ओरुनोदोई योजना के तहत मासिक प्रत्यक्ष बैंक हस्तांतरण 3,000 रुपये किया जाना है। चाय बागान के मजदूरों की मजदूरी अगले पांच वर्षों में बढ़ाकर 500 प्रतिदिन करने और उन्हें आवास उपलब्ध कराने का भी वादा किया गया है।
नकद हस्तांतरण से बढ़ रही खपत, कर्ज के दलदल में फंस रहे राज्य :क्रिसिल
महंगाई और जरूरी खर्चों के दबाव के बीच राज्य सरकारों की नकद सहायता योजनाएं गरीब परिवारों के लिए बड़ा सहारा बन रही हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, सीधे बैंक खातों में भेजी जा रही राशि ने ग्रामीण और शहरी गरीबों की खपत को गिरने से बचाया है। हालांकि, यही राहत अब राज्यों की वित्तीय सेहत पर दबाव बढ़ा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में सिर्फ चार राज्य ऐसी नकद सहायता योजनाएं चला रहे थे। 2026 तक 28 में से 17 राज्यों और दिल्ली ने इन्हें अपना लिया है। सर्वाधिक 20 फीसदी परिवारों के लिए औसतन 1,500 रुपये की मासिक सहायता काफी अहम है। यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों में उनके मासिक खर्च का करीब 74 और शहरों में 51 फीसदी तक कवर कर रही है। इससे गरीब परिवारों की खर्च क्षमता बढ़ी है। अतिरिक्त आय के सहारे कई ग्रामीण परिवार खर्च के सबसे निचले 5 फीसदी वर्ग से निकलकर 30-40 फीसदी के करीब पहुंच रहे हैं। इसका असर गैर-खाद्य खर्चों पर भी दिख रहा है।
राज्यों की बाजार उधारी 12.4 लाख करोड़
इन योजनाओं से राज्यों के खजाने पर बोझ भी बढ़ा है। 2025-26 में राज्यों की बाजार उधारी 15.2 फीसदी बढ़कर 12.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। नकद सहायता देने वाले 16 में से 12 राज्यों की उधारी दो अंकों में बढ़ी है। क्रिसिल ने चेताया है कि बढ़ती उधारी बॉन्ड बाजार के लिए जोखिम बन सकती है और निवेशकों के भरोसे पर असर डाल सकती है। क्रिसिल ने कहा, नकद हस्तांतरण स्थायी समाधान नहीं है। घरेलू मांग में टिकाऊ वृद्धि तभी होगी, जब रोजगार बढ़ेगा और लोगों की आय सुधरेगी।
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