राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों ने शहरों की सियासत की तस्वीर बदल दी है। 309 निकायों के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर के साथ कई जगह निर्दलीयों ने दोनों दलों का गणित बिगाड़ दिया। खासकर नगर निगमों में तस्वीर एक जैसी नहीं रही। कहीं भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी तो कहीं कांग्रेस ने वापसी की। कुछ शहरों में निर्दलीय इतने मजबूत होकर निकले कि अब बोर्ड किसका बनेगा, इसका फैसला उनके हाथ में है।
10 नगर निगमों में अलग-अलग तस्वीर
10 नगर निगमों के नतीजों में जयपुर, कोटा और अलवर में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। उदयपुर और भीलवाड़ा में भी भाजपा बोर्ड बनाने की स्थिति में है। दूसरी ओर बीकानेर में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है, जबकि अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। भरतपुर में निर्दलीयों ने दोनों प्रमुख दलों को पीछे छोड़ दिया। जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला लगभग बराबरी का रहा।

अजमेर में 36 साल बाद बदला समीकरण
अजमेर का नतीजा भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। 80 वार्डों में कांग्रेस ने 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 32 पर रह गई। निर्दलीयों ने 11 वार्ड जीते हैं। बहुमत के लिए 41 सीट चाहिए, इसलिए कांग्रेस को भी बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत होगी।
खास बात यह है कि अजमेर में पिछली बार भाजपा के 48 पार्षद जीते थे और उसका बोर्ड बना था। इस बार कांग्रेस का सबसे बड़ा दल बनना शहर की राजनीति में बड़ा बदलाव है। यहां विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और पूर्व मंत्री अनिता भदेल की राजनीतिक पकड़ की भी परीक्षा हुई है।
भरतपुर में निर्दलीयों ने दोनों दलों को पीछे छोड़ा
भरतपुर में चुनाव परिणाम ने सबसे अलग तस्वीर दिखाई। 65 वार्डों में निर्दलीयों ने 36 सीटें जीत लीं। भाजपा को 20 और कांग्रेस को सिर्फ सात सीटें मिलीं। बसपा और आरएलपी ने एक-एक वार्ड जीता।
यानी यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों की सीटें जोड़ने पर भी आंकड़ा निर्दलीयों से काफी पीछे है। अब बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षद ही सबसे अहम होंगे। 73 फीसदी से ज्यादा मतदान वाले इस शहर में किसी एक बड़े दल के पक्ष में लहर दिखाई नहीं दी।
जयपुर में भाजपा सबसे आगे, पूर्व मेयर को हार
जयपुर के 150 वार्डों में भाजपा 75 सीटों के साथ सबसे आगे है। कांग्रेस ने 50 और निर्दलीयों ने 12 सीटें जीती हैं। बहुमत के लिए 76 सीट चाहिए, इसलिए भाजपा बहुमत से सिर्फ एक सीट दूर है।
जयपुर में सबसे चर्चित नतीजों में पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल की हार रही। कांग्रेस छोड़कर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं खंडेलवाल वार्ड 110 में कांग्रेस की सुनीता मेठी से हार गईं। खास बात यह रही कि वह अपने किसी भी बूथ पर बढ़त नहीं बना सकीं।
वहीं मेयर पद की दौड़ में माने जा रहे भाजपा के सुनील कोठारी ने 900 से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की। भाजपा ने मौजूदा मेयर कुसुम यादव का टिकट काटकर उन्हें मैदान में उतारा था। वार्ड 113 में कांग्रेस प्रत्याशी की 10,014 वोट की जीत भी जयपुर के नतीजों में चर्चा का विषय रही।
जोधपुर में अब तक बराबरी की लड़ाई
जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा। 99 वार्डों के घोषित नतीजों में दोनों दल 44-44 सीटों पर हैं, जबकि अन्य के खाते में 11 सीटें हैं। एक वार्ड में ईवीएम की तकनीकी दिक्कत के कारण नतीजा रुका है।
यहां कांग्रेस के शहर जिलाध्यक्ष ओमकार वर्मा की हार बड़ा झटका है। उन्हें भाजपा के पूर्व राज्यमंत्री मेघराज लोहिया ने हराया। दूसरी ओर भाजपा के पूर्व डिप्टी मेयर देवेंद्र सालेचा भी चुनाव हार गए और कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष नरेशचंद्र जोशी ने जीत दर्ज की। ऐसे में जोधपुर में बोर्ड गठन का फैसला उन सीटों पर निर्भर करेगा जो दोनों प्रमुख दलों के बाहर हैं।
कोटा और अलवर में भाजपा की बढ़त
कोटा के 100 वार्डों में अब तक भाजपा ने 55, कांग्रेस ने 39 और निर्दलीयों ने चार सीटें जीती हैं। भाजपा यहां स्पष्ट बढ़त में है। कुछ वार्डों में ईवीएम से जुड़ी तकनीकी दिक्कत के कारण परिणाम अटके हैं। अलवर के 65 वार्डों में भाजपा ने 28, कांग्रेस ने 23 सीटें जीती हैं। अन्य के खाते में 13 और बसपा के खाते में एक सीट गई है। यहां भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है।
बीकानेर में कांग्रेस की स्पष्ट बढ़त
बीकानेर में कांग्रेस ने इस चुनाव में सबसे मजबूत प्रदर्शन करने वाले शहरों में अपनी जगह बनाई है। पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने से बोर्ड गठन को लेकर कोई असमंजस नहीं है। यह नतीजा भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की शहरी राजनीति में कांग्रेस लंबे समय से कमजोर मानी जा रही थी।
सीकर में कांग्रेस की हैट्रिक
सीकर नगर परिषद में कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार बोर्ड बनाने का रास्ता साफ किया है। 65 वार्डों में कांग्रेस के 38 प्रत्याशी जीते, जबकि भाजपा को 22 सीटें मिलीं। चार निर्दलीय और एक आरएलपी प्रत्याशी भी जीता। सीकर में बहुमत का आंकड़ा 33 है, इसलिए कांग्रेस को किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं है। पूर्व सभापति जीवण खां और उनकी पत्नी खतीजा ने भी अपने-अपने वार्ड से जीत दर्ज की।
पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी, लेकिन बहुमत नहीं
पाली नगर निगम में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उसे अपने दम पर बोर्ड बनाने लायक बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में यहां भी निर्दलीय पार्षद महत्वपूर्ण हो गए हैं। पाली में भाजपा के लिए चुनौती यह है कि सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस को बोर्ड बनाने से रोकने के लिए उसे दूसरे दलों और निर्दलीयों का समर्थन जुटाना होगा।
बाड़मेर में 15 साल बाद भाजपा को बहुमत
बाड़मेर नगर परिषद में भाजपा ने करीब 15 साल बाद बहुमत हासिल किया है। 55 वार्डों में भाजपा ने 29, कांग्रेस ने 21 और निर्दलीयों ने पांच सीटें जीतीं। नई बनी चौहटन नगरपालिका में भी भाजपा ने 20 में से 11 वार्ड जीतकर बोर्ड बनाने का रास्ता साफ कर लिया। यहां कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला।
नतीजों का सबसे बड़ा संदेश क्या?
इन चुनाव परिणामों को एक साथ देखें तो सबसे बड़ा संदेश यही है कि राजस्थान के शहरों में मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रहा। कई जगह स्थानीय मुद्दों, प्रत्याशियों और बागियों ने चुनाव का गणित बदल दिया।
भरतपुर में निर्दलीय सबसे बड़ा गुट बने, अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी बहुमत से दूर रही और जोधपुर में दोनों बड़े दल लगभग बराबरी पर आ गए। वहीं जयपुर, कोटा और अलवर में भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत रखी। अब चुनाव की अगली लड़ाई बोर्ड और मेयर बनाने की है। जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां पार्षदों की बाड़ेबंदी से लेकर समर्थन जुटाने तक की राजनीति शुरू हो चुकी है। इसलिए इन चुनावों का अंतिम असर सिर्फ वार्डों के नतीजों से नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में बनने वाले बोर्ड से तय होगा।

