आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित ‘एक दुनिया, एक मानवता’ कार्यक्रम में धर्म, मानवता, सेवा और सामाजिक एकता को लेकर अपना दृष्टिकोण रखा। धार्मिक नेताओं की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि दुनिया को बदलने की शुरुआत बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर से होनी चाहिए। उनका जोर इस बात पर था कि अलग-अलग समुदायों के लोग साथ काम करें, एक-दूसरे का सम्मान करें और सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएं।

भागवत ने कहा कि हर मनुष्य का अपना सम्मान है और इंसानों के बीच कोई भेद नहीं है। उनके मुताबिक वास्तविकता यह है कि हम सब एक हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में भी समानता पर जोर दिया गया है, लेकिन केवल राजनीति के जरिए समाज में यह बदलाव नहीं आ सकता। उन्होंने कहा कि जहां ‘मैं और मेरा’ की सोच होती है, वहां समाधान नहीं निकलता। इसके बजाय ‘हम और हमारा’ की भावना ही आगे बढ़ने का रास्ता है। उन्होंने भारत के अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि बदलाव की शुरुआत समाज से होनी चाहिए।
क्या धार्मिक संवाद को बड़े मंचों से नीचे तक ले जाने की बात हुई?
भागवत ने धार्मिक नेताओं से कहा कि अलग-अलग धर्मों के बीच संवाद केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों या वरिष्ठ नेताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे प्रांत, जिला और ब्लॉक स्तर तक ले जाने की जरूरत है। उनका कहना था कि यदि स्थानीय स्तर पर लोग एक-दूसरे से संवाद शुरू करेंगे और अपने-अपने क्षेत्रों में एकता तथा सेवा के उदाहरण बनाएंगे, तो यही छोटे प्रयास आगे चलकर अलग-अलग क्षेत्रों और देशों को जोड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह की दुनिया हम चाहते हैं, उसके छोटे मॉडल हमें अपने आसपास ही बनाने होंगे।
आरएसएस की मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ बातचीत को कैसे बताया?
भागवत ने कहा कि आरएसएस ने भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद शुरू किया है। उन्होंने बताया कि 2018 में उनके एक भाषण के बाद इस दिशा में बातचीत आगे बढ़ी और धीरे-धीरे इसे जारी रखा गया। उन्होंने स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देते। कुछ लोगों ने सात बार बातचीत के बाद भी ठोस बदलाव नहीं होने की बात कही। भागवत ने इसके जवाब में लगातार प्रयास जारी रखने की बात कही। उनके मुताबिक सामाजिक सोच और व्यवहार में बदलाव समय लेता है, इसलिए निराश होकर प्रयास छोड़ना समाधान नहीं है।
क्या भागवत ने सेवा को धार्मिक संवाद का जरूरी हिस्सा बताया?
भागवत ने कहा कि संवाद के साथ सेवा भी जरूरी है और दोनों काम एक साथ होने चाहिए। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस के स्वयंसेवक जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करते समय उसके धर्म या पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं करते। उन्होंने अपने संगठन की विभिन्न गतिविधियों का जिक्र करते हुए कहा कि समाज के सहयोग से करीब 1.30 लाख अलग-अलग स्तर की सेवा गतिविधियां चल रही हैं। उनका कहना था कि सेवा का उद्देश्य बदले में कुछ हासिल करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद की मदद करना है।
सेवा के उदाहरण के तौर पर किस घटना का जिक्र किया?
भागवत ने हरियाणा में दो विमानों की टक्कर की घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि आरएसएस के स्वयंसेवक घटनास्थल पर पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि दोनों विमान अरब देशों से जुड़े थे और उनमें ज्यादातर यात्री मुस्लिम थे। भागवत के अनुसार स्वयंसेवकों ने घायलों की मदद की, शवों को निकालने और अंतिम संस्कार की व्यवस्था में सहयोग किया तथा परिजनों को मृतकों की पहचान में सहायता दी। उन्होंने कहा कि उस समय स्वयंसेवकों ने यह नहीं देखा कि पीड़ित किस धर्म के हैं। उन्होंने इसे बिना भेदभाव सेवा करने का उदाहरण बताया।
धर्मों की विविधता को लेकर भागवत ने क्या कहा?
भागवत ने धार्मिक विविधता को मानवता की एकता के साथ जोड़ते हुए कहा कि धर्म अलग हो सकते हैं, उनकी पूजा-पद्धतियां और परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन मानवता एक है। उन्होंने कहा कि सत्य एक है, लेकिन लोग उसे अपनी समझ और अनुभव के अनुसार अलग-अलग तरीके से बताते हैं। उनके अनुसार धर्मों के रास्ते अलग हो सकते हैं, कोई रास्ता सीधा हो सकता है तो कोई लंबा या कठिन, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका अंतिम लक्ष्य अलग है।
धार्मिक अनुष्ठानों और अंतिम सत्य के बीच क्या संबंध बताया?
भागवत ने कहा कि धार्मिक अनुशासन और अनुष्ठान जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें धर्म का अंतिम उद्देश्य नहीं समझना चाहिए। उन्होंने इसे एक उंगली से प्रकाश की ओर इशारा करने के उदाहरण से समझाया। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति केवल उंगली को देखता रहे और उस दिशा में मौजूद प्रकाश को न देखे, तो वह उद्देश्य को नहीं समझ पाएगा। उनके अनुसार धर्म का उद्देश्य मनुष्य को सत्य और दिव्यता की ओर ले जाना है। इसी आधार पर उन्होंने अलग-अलग आध्यात्मिक रास्तों के बीच समानता की बात रखी।
रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण देकर क्या संदेश दिया?
भागवत ने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय मूल की परंपराओं के साथ इस्लाम और ईसाई धर्म का भी अभ्यास किया था। उनके मुताबिक अलग-अलग धार्मिक रास्तों के अनुभवों से यह समझ सामने आई कि रास्ते अनेक हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक हो सकता है। भागवत ने इसी संदर्भ में कहा कि यदि कोई खुद को हिंदू कहना चाहता है, तो उसे यह मानना होगा कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं। उन्होंने प्रत्येक मनुष्य के सम्मान को भी इसी विचार से जोड़ा।
भागवत ने कहा कि केवल ज्ञान से समाज क्यों नहीं बदलता?
भागवत के मुताबिक दुनिया के अलग-अलग समाजों और परंपराओं में अच्छाई, प्रेम और शांति का ज्ञान पहले से मौजूद है। समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस ज्ञान को व्यवहार में उतारने की है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति सही बात जानने के बावजूद अपनी इच्छाओं और लालच के कारण उसका पालन नहीं करता। उन्होंने अपने शुगर से परहेज के उदाहरण से समझाया कि सही चीज पता होने के बाद भी इंसान कभी-कभी अपने लिए बहाना खोज लेता है। इसलिए अच्छे व्यवहार को केवल जानकारी नहीं, बल्कि मजबूत आदत बनाने की जरूरत है।
अच्छे व्यवहार की आदत पर इतना जोर क्यों दिया?
भागवत ने कहा कि मानव समाज में बदलाव तभी स्थायी होगा, जब सेवा, प्रेम और सम्मान रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बनेंगे। केवल लोगों को समझा देना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार नई आदत इतनी मजबूत होनी चाहिए कि वह व्यक्ति को भौतिक सुख, सत्ता, प्रभाव और श्रेष्ठता की लालसा से दूर रख सके। उन्होंने धार्मिक परंपराओं में मौजूद सेवा और देने की भावना का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि व्यक्ति में यह भावना पैदा हो जाए कि उसे दूसरों के लिए भी कुछ करना है, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ सकता है।
भागवत का संदेश क्या था और आगे की राह क्या बताई?
भागवत ने धार्मिक नेताओं से अपील की कि वे अपने-अपने देशों और समाजों में एकता तथा निस्वार्थ सेवा के छोटे मॉडल तैयार करें और फिर उन्हें दूसरे क्षेत्रों से जोड़ें। उन्होंने कहा कि यह काम आसान नहीं है और इसमें समय लगेगा, लेकिन धीमे परिणाम देखकर प्रयास बंद नहीं किया जाना चाहिए। उनके पूरे संबोधन में ‘एक दुनिया, एक मानवता’, विविधता के सम्मान, बिना भेदभाव सेवा और लगातार संवाद का संदेश प्रमुख रहा। भागवत ने कहा कि विविधता प्रकृति का नियम है, जबकि उसके पीछे एकता का सत्य मौजूद है।
क्या बोले कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा?
- कांग्रेस नेता और इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के चेयरमैन सैम पित्रोदा ने न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी की मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा पर आलोचना को लेकर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। पित्रोदा ने कहा कि वह ममदानी की धर्मनिरपेक्षता और सभी धर्मों के सम्मान वाली मूल बात से सहमत हैं। दरअसल, जोहरान ममदानी भागवत की इस यात्रा का शुरूआत से ही विरोध करते आ रहे हैं।
- उन्होंने भागवत के कार्यक्रम का स्वागत करने से इनकार किया और इसे आयोजकों तथा अमेरिकी प्रशासन का फैसला बताया।पित्रोदा ने कहा कि आरएसएस को लेकर अलग-अलग लोगों की अलग राय हो सकती है, लेकिन संवाद और बातचीत के रास्ते खुले रहने चाहिए। उन्होंने इस बहस को भारत की प्राथमिकताओं से जोड़ते हुए महिलाओं की स्थिति, शिक्षा, रोजगार, समानता, स्वतंत्रता और बच्चों के भविष्य पर ध्यान देने की जरूरत बताई।
मोहन भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा पर क्या बोले ओवैसी?
ओवैसी ने मोहन भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी अपनी स्थिति खुद रख सकते हैं, लेकिन उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को भारत के बहुलवाद और विविधता के खिलाफ बताया। ओवैसी ने यह भी सवाल उठाया कि मोहन भागवत अमेरिका जा सकते हैं, जबकि तेलंगाना के निर्वाचित मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अमेरिका जाने की अनुमति क्यों नहीं मिली। उन्होंने इसे चयनात्मक रवैया बताया।
