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महंगाई का असर:खपत की रफ्तार थामी तो विकास दर को लग सकता है झटका; Fmcg मांग में सुस्ती की आशंका ने बढ़ाई चिंता – Inflation And Weak Consumption Slow India Growth Momentum, Raising Economic Concerns

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भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत कारखाने नहीं बल्कि बाजार हैं। गांव की किराना दुकान से लेकर शहर के मॉल तक जो खर्च होता है, वही आर्थिक विकास की असली धड़कन है। यही वजह है कि उपभोग में थोड़ी भी सुस्ती अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दे सकती है। वह भी ऐसे समय में, जब देश पशि्चम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी निवेशकों की लगातार पूंजी निकासी, डॉलर की तुलना में रुपये में रिकॉर्ड गिरावट और बढ़ते आयात बिल जैसे संकटों से जूझ रहा है।

दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा घरेलू खर्च है। घरेलू जीडीपी में निजी खपत की हिस्सेदारी करीब 57 फीसदी है। यानी लोगों की जेब, खरीदारी और भरोसा ही विकास का सबसे बड़ा इंजन है। दिसंबर, 2025 तिमाही के दौरान निजी खपत बढ़कर जीडीपी के 57.5 फीसदी तक पहुंच गई।

चिंता इसलिए बढ़ी है, क्योंकि पिछले तीन महीनों में कई एजेंसियों ने भारत की वृद्धि दर के अनुमान घटाए हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के लिए विकास दर अनुमान को 6.6 फीसदी से घटाकर 6.4 फीसदी कर दिया है। मूडीज रेटिंग्स ने भी 2026 के लिए भारत की वृद्धि दर का अनुमान 6.8 फीसदी से घटाकर 6.0 फीसदी किया है। वहीं, इंडिया रेटिंग्स ने पश्चिम एशिया तनाव और अल-नीनो के जोखिम को देखते हुए 2026-27 में वृद्धि दर 6.7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। यानी भारत मौजूदा संकट में भी तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था तो बना हुआ है, लेकिन बाहरी झटकों से अछूता नहीं है।

एफएमसीजी मांग का थर्मामीटर कमजोर

रोजमर्रा के सामान साबुन, तेल, बिस्कुट, शैंपू, चाय, पैकेज्ड फूड…देश की खपत का सबसे तेज संकेत देते हैं। इसी मोर्चे पर चेतावनी दिख रही है।


  • वर्ल्डपैनल बाय न्यूमरेटर के मुताबिक, जनवरी-मार्च तिमाही में एफएमसीजी वैल्यू ग्रोथ 13.1 फीसदी और वॉल्यूम ग्रोथ 5.4 फीसदी रही। एजेंसी का अनुमान है कि 2026 में वॉल्यूम ग्रोथ 5 फीसदी तक जा सकती है, अगर कच्चा तेल स्थिर रहे और मानसून साथ दे। महंगाई और मौसम का दबाव बना रहा, तो एफएमसीजी की वृद्धि दर 3-4 फीसदी तक सिमट सकती है।  

  • महंगाई के दौर में उपभोक्ता गैर-जरूरी खरीद टालता है। महंगे ब्रांड से सस्ते विकल्पों की ओर जाता है और जहां बचत दिखती है, वहां बड़े वैल्यू पैक चुनता है। कंपनियों के लिए यह संकेत आसान नहीं है। कंपनियों की असली परीक्षा अब वॉल्यूम ग्रोथ में होगी, न कि सिर्फ महंगे दामों से बढ़े राजस्व में।

मानसून और कच्चा तेल…दो बड़े जोखिम


उपभोग की अगली परीक्षा मौसम और तेल से होगी। अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन के मुताबिक, मई-जुलाई, 2026 में अल नीनो उभरने की 82 फीसदी और इसके सर्दियों तक बने रहने की आशंका 96 फीसदी है।


  • आईएमडी के शुरुआती अनुमान बताते हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर रह सकता है। कमजोर बारिश का असर खेत से सीधे रसोई तक आता है। अनाज, सब्जी, दूध, चारा, ग्रामीण मजदूरी और ग्रामीण मांग सभी प्रभावित होते हैं। दूसरी तरफ, महंगा कच्चा तेल परिवहन, पैकेजिंग और उत्पादन लागत बढ़ाकर महंगाई को हवा देता है।

  • उपभोग की रफ्तार थमी, तो असर सिर्फ एफएमसीजी तक सीमित नहीं रहेगा। ऑटो, सीमेंट, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, छोटे कारोबार, जीएसटी संग्रह और रोजगार…सब पर दबाव आएगा।

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