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भारत में तेजी से घट रहा भूजल:34% निगरानी केंद्रों पर स्तर सामान्य से नीचे, डब्ल्यूएमओ की चेतावनी क्यों अहम? – India Groundwater Depleting Rapidly Levels Below Normal At 34pc Monitoring Stations Wmo Situation Alarming

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भारत में भूजल का संकट लगातार गहरा रहा है। खासकर उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में भूजल स्तर में लंबे समय से गिरावट दर्ज की जा रही है। अब वैश्विक जल संसाधनों पर जारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की ताजा रिपोर्ट ने इस गिरावट को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।

डब्ल्यूएमओ की स्टेट ऑफ ग्लोबल वॉटर रिसोर्सेज 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में भूजल का स्तर लगातार कई वर्षों से सामान्य से नीचे बना हुआ है। इसका सीधा संकेत है कि जमीन से जितना पानी निकाला जा रहा है, प्राकृतिक रूप से उसका उतना पुनर्भरण नहीं हो पा रहा।रिपोर्ट के अनुसार 2022 से 2025 के दौरान अमेरिका, यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में लगातार भूजल की कमी देखी गई। कई क्षेत्रों में अत्यधिक भूजल दोहन को इसका प्रमुख कारण पाया गया।

2025 में सामान्य से अधिक या बहुत अधिक भूजल स्तर

2025 में दुनिया के भूजल निगरानी केंद्रों में से 34% पर सामान्य से कम या बहुत कम भूजल स्तर दर्ज किया गया। 2024 में यह हिस्सा 25% था। यानी एक साल के भीतर सामान्य से कम भूजल वाले निगरानी केंद्रों का अनुपात बढ़ा। इसके उलट 2025 में करीब 31% निगरानी केंद्रों पर सामान्य से अधिक या बहुत अधिक भूजल स्तर दर्ज किया गया।हालांकि डब्ल्यूएमओ ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े उन्हीं क्षेत्रों के हैं, जहां भूजल निगरानी का डेटा उपलब्ध है। इसलिए इन्हें पूरी दुनिया की स्थिति का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। भूजल स्तर की तुलना 2001 से 2020 के 20 वर्षीय संदर्भ काल से की गई है।

सूखे के साथ नीचे जा रहा भूजल

डब्ल्यूएमओ के भूजल रुझानों के विश्लेषण में कई वर्षों से जारी सूखे और भूजल में लगातार कमी के बीच संबंध की ओर संकेत किया गया है। 2025 में उत्तरी भारत में जमीन पर मौजूद जल भंडार सामान्य से कम रहा। दुनिया के कई अन्य प्रमुख क्षेत्रों में भी जमीन पर उपलब्ध जल भंडारण सामान्य से नीचे दर्ज किया गया।रिपोर्ट की खासियत यह है कि स्टेट ऑफ ग्लोबल वॉटर रिसोर्सेज लगातार पांच वर्षों से प्रकाशित हो रही है। इससे प्रमुख जल संसाधनों और पूरे जल चक्र से जुड़े तुलनीय आंकड़ों का आधार तैयार हुआ है। इनके जरिए पानी की उपलब्धता में लंबे समय से हो रहे बदलावों को समझना संभव हो रहा है।

तीन दशकों में सबसे सूखे वर्षों में शामिल 2025

डब्ल्यूएमओ के मुताबिक 2025 दुनिया की नदियों के लिए तीन दशकों से अधिक समय में सबसे सूखे वर्षों में से एक रहा। संगठन ने कहा है कि यह स्थिति धरती के मीठे पानी के भंडार में लंबे समय से जारी गिरावट की ओर संकेत करती है।जल संकट का असर ग्लेशियरों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। 2025 में लगातार चौथे वर्ष दुनिया के सभी प्रमुख ग्लेशियर वाले क्षेत्रों में बर्फ का द्रव्यमान घटा। ग्लेशियरों का पीछे हटना उन क्षेत्रों के लिए विशेष चिंता का विषय है जहां नदियों और जलापूर्ति में पिघलती बर्फ की महत्वपूर्ण भूमिका है।

करीब दो-तिहाई कुओं में सामान्य स्थिति नहीं

भूजल निगरानी से जुड़ा एक और आंकड़ा स्थिति की गंभीरता को सामने रखता है। 2025 में दुनिया भर में निगरानी किए गए करीब दो-तिहाई कुओं में भूजल स्तर ऐतिहासिक सामान्य स्थिति से बाहर रहा। 2024 की तुलना में स्थिति सुधारने के बजाय कमी की ओर बढ़ी।डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने वैश्विक जल भंडार की मौजूदा स्थिति को समझाने के लिए कहा, हम उस बचत खाते को लगातार खाली कर रहे हैं।उनके मुताबिक वैश्विक स्थलीय जल भंडारण में 2014-16 से लगातार गिरावट का रुझान बना हुआ है। यानी दुनिया करीब एक दशक से जमीन पर जमा मीठे पानी के भंडार में कमी का सामना कर रही है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह चेतावनी?

भारत में भूजल का इस्तेमाल खेती, पेयजल और घरेलू जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में लंबे समय तक भूजल का पुनर्भरण कम और दोहन अधिक रहने पर इसका असर केवल जलस्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सिंचाई, पेयजल उपलब्धता और स्थानीय जल सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।डब्ल्यूएमओ ने चेताया है कि मीठे पानी के भंडार में लंबे समय से जारी गिरावट और ग्लेशियरों के पीछे हटने के भविष्य में लोगों और अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। रिपोर्ट के आंकड़े इस बात पर जोर देते हैं कि जल संकट को केवल सूखे या बारिश की कमी के रूप में नहीं, बल्कि पूरे जल चक्र में हो रहे बदलाव के रूप में देखने की जरूरत है।

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