फालता विधानसभा सीट का यह नतीजा इसलिए चौंकाने वाला माना जा रहा है, क्योंकि यह सीट डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के भीतर आती है। जिसे 12 वर्ष से अभिषेक बनर्जी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। 2021 विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस यहां करीब 40 हजार वोट से जीती थी, जबकि 2024 लोकसभा चुनाव में इसी क्षेत्र में अभिषेक बनर्जी को करीब एक लाख 68 हजार की भारी बढ़त मिली थी।

2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में फालता विधानसभा सीट पर तस्वीर बदली है। इसके पीछे अनगिनत कारण दिखाई देते हैं। छह मुख्य कारणों पर नजर डालते हैं।
पहला कारण, तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान का चुनाव प्रचार के अंतिम दिन मैदान से हटना, पार्टी कैडर और वोटरों में भ्रम पैदा कर गया। इससे संदेश गया कि पार्टी अंदरूनी दबाव या संकट में है।
दूसरा कारण, बंगाल में कई बार देखा गया है कि लोकसभा और विधानसभा में वोटिंग पैटर्न अलग होता है। अभिषेक बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता लोकसभा में काम आई, लेकिन विधानसभा चुनाव में स्थानीय असंतोष, उम्मीदवार की छवि और संगठन की स्थिति ज्यादा प्रभाव डालती है।
तीसरा कारण, डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी खुद पार्टी उम्मीदवार जहांगीर खान के चुनाव प्रचार में सक्रिय नहीं दिखे। इससे कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह कम हुआ और विरोधी दलों खासकर भाजपा को हमला करने का मौका मिला।
चौथा कारण, भाजपा का आक्रामक माइक्रो-कैंपेन। भाजपा ने इस चुनाव को प्रतीकात्मक लड़ाई बना दिया, “अभिषेक के गढ़ में सेंध” वाली चुनावी रणनीति के साथ। लगातार बूथ स्तर पर काम और ध्रुवीकरण की कोशिशों का असर दिखा।
पांचवां कारण, पुनर्मतदान और चुनावी तनाव।फालता समेत इलाके में पुनर्मतदान, शिकायतें और प्रशासनिक विवाद भी चर्चा में रहे। अमूमन ऐसे माहौल में एंटी-इंकम्बेंसी और असंतोष ज्यादा संगठित रूप में सामने आता है।
छठा कारण, अत्यधिक आत्मविश्वास का नुकसान। बड़ी लोकसभा बढ़त के बाद तृणमूल कांग्रेस ने शायद इस सीट को “सेफ” मान लिया। वहीं भाजपा ने इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बनाकर पूरी ताकत झोंक दी। कई चुनावों में यही अंतर परिणाम बदल देता है।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ एक सीट का परिणाम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बंगाल की राजनीति में एक संकेत की तरह देखा जा रहा है कि मजबूत गढ़ों में भी स्थानीय असंतोष, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक कमजोरी भारी पड़ सकती है। बंगाल की मुस्लिम बहुल सीटों की राजनीति में अब स्पष्ट बदलाव दिखाई भी दे रहा है। लंबे समय तक मुस्लिम वोट बैंक को तृणमूल कांग्रेस का एकतरफा समर्थन माना जाता था, लेकिन अब उसमें जबरदस्त विभाजन नजर आने लगा है।
मुस्लिम मतदाताओं की बदलती सोच
बदलाव का ही असर है कि इस बार राज्य की 142 मुस्लिम-बहुल सीटों में भाजपा न केवल अपना खाता खोलने में सफल रही, बल्कि आधे से अधिक यानी 73 सीटों पर जीत दर्ज की। हालांकि, भाजपा की ओर से अब भी एक भी मुस्लिम विधायक निर्वाचित नहीं हुआ है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस सिमटकर महज 63 सीटों पर रह गई है। तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायकों में 32 मुसलमान हैं। वहीं कांग्रेस, सीपीएम, आईएसएफ (नौशाद सिद्दिकी) और आजउपा (हुमांयू कबीर) के जितने भी विधायक जीतकर आए हैं, वे सभी मुस्लिम समुदाय से हैं।
यह बदलता राजनीतिक समीकरण संकेत देता है कि बंगाल में मुस्लिम मतदाता अब पहले की तरह एकजुट होकर किसी एक दल के साथ नहीं खड़े हैं, बल्कि स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और राजनीतिक विकल्पों को ध्यान में रखकर मतदान कर रहे हैं।
बहरहाल, यह स्थिति स्थायी भी नहीं है। बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद, मुस्लिम मतदाता एक बार फिर किसी एक राजनीतिक विकल्प के पक्ष में संगठित होने की कोशिश कर सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस से उनकी निराशा बढ़ी है, लेकिन भाजपा उनके लिए स्वाभाविक विकल्प नहीं बन पाती। ऐसे में वे लेफ्ट या कांग्रेस की ओर रुख कर सकते हैं।
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