
Why Old Indian Houses Had Cow Dung Plaster: आज के समय में घरों की दीवारों पर पेंट और फर्श पर टाइल्स या मार्बल का इस्तेमाल आम बात है. वहीं, कुछ दशक पहले तक गांवों और कच्चे घरों में मिट्टी, गोबर और भूसे से लिपाई करना रोजमर्रा की जीवनशैली का हिस्सा हुआ करता था. यह सिर्फ एक पारंपरिक रीति नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कई व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण भी छिपे थे. यही वजह है कि आज भी कई ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है. आइए जानते हैं कि पुराने समय में घरों की लिपाई क्यों की जाती थी.
घर को रखती थी ठंडा और आरामदायक
मिट्टी और गोबर का मिश्रण प्राकृतिक थर्मल इंसुलेटर की तरह काम करता है. गर्मियों में यह बाहर की तेज गर्मी को घर के अंदर आने से काफी हद तक रोकता था, जिससे कमरों का तापमान अपेक्षाकृत ठंडा बना रहता था. वहीं, सर्दियों में यही परत घर के भीतर की गर्माहट बनाए रखने में मदद करती थी. उस समय बिजली और कूलिंग के आधुनिक साधन सीमित थे, इसलिए यह तरीका बेहद उपयोगी माना जाता था.
दीवारों की उम्र बढ़ाने में मिलती थी मदद
कच्चे मकानों की दीवारें समय के साथ कमजोर पड़ सकती थीं या उनमें दरारें आने लगती थीं. ऐसे में समय-समय पर गोबर, मिट्टी और भूसे से लिपाई करने पर दीवारों की सतह मजबूत बनी रहती थी. इससे दीवारों का क्षरण कम होता था और घर लंबे समय तक सुरक्षित रहता था.
धूल और गंदगी रहती थी कम
मिट्टी के फर्श पर चलने से धूल उड़ने की समस्या आम थी. लिपाई करने से फर्श की ऊपरी सतह मजबूत और चिकनी हो जाती थी, जिससे धूल कम उड़ती थी और घर अपेक्षा में साफ-सुथरा बना रहता था. यह तरीका रोजमर्रा की सफाई को भी आसान बना देता था.
कीड़े-मकौड़ों से मिलता था बचाव
लिपाई के दौरान मिट्टी के छोटे-छोटे गड्ढे और दरारें भर जाती थीं, जिससे कीड़े-मकौड़ों के छिपने की जगह कम हो जाती थी. इसके अलावा, गाय के गोबर में पाए जाने वाले कुछ प्राकृतिक एंटी-माइक्रोबियल गुणों के कारण घर की स्वच्छता बनाए रखने में भी मदद मिलती थी.
पर्यावरण के अनुकूल था यह तरीका
गोबर, मिट्टी और भूसा पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री हैं, जो आसानी से उपलब्ध हो जाती थीं. इनके इस्तेमाल से न तो पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ पड़ता था और न ही किसी तरह का रासायनिक प्रदूषण होता था. यही कारण है कि पुराने समय में यह तरीका किफायती होने के साथ-साथ टिकाऊ और प्रकृति के अनुकूल भी माना जाता था.
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