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पश्चिम बंगाल:2 जुलाई को कैबिनेट में पेश होगा समान नागरिक संहिता का मसौदा, सीएम शुभेंदु अधिकारी ने की घोषणा – Draft Ucc Bill For Bengal To Be Placed Before Cabinet On July 2: Cm Suvendu Adhikari

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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को घोषणा की कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक का मसौदा 2 जुलाई को राज्य कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। उन्होंने विधानसभा में यह जानकारी दी। 

इसके साथ ही मुख्यमंत्री शुभेंदु ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाएगी, जो इस यूसीसी विधेयक को तैयार करेगी। मुख्यमंत्री ने बताया कि यह विधेयक बाद में विधानसभा में भी पेश किया जाएगा। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में धर्म से ऊपर उठकर एक समान नागरिक ढांचा लागू करना है।

समान नागरिक संहिता क्या है?


  • समान नागरिक संहिता का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो।

  • समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी धर्मों का एक कानून होगा। शादी, तलाक, गोद लेने और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। 

ये भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल विधानसभा में पारित हुए ओबीसी से जुड़े दो संशोधन विधेयक, आरक्षण समेत और क्या बदलेगा?

यह मुद्दा कई दशकों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। यूसीसी केंद्र की मौजूदा सत्ताधारी भाजपा के लिए जनसंघ के जमाने से प्राथमिकता वाला एजेंडा रहा है।  भाजपा सत्ता में आने पर यूसीसी को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का भी हिस्सा था। इसके साथ ही उसके शासन वाले राज्यों में इसे जोर-शोर से लागू भी कराया जा रहा है। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल में यूसीसी लागू कराना पार्टी का अगला लक्ष्य है। 

संविधान इस पर क्या कहता है?

देश में संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि राज्य इसे लागू कर सकता है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव या पक्षपात को खत्म करना और देशभर में विविध सांस्कृतिक समूहों के बीच सामंजस्य स्थापित करना था। संविधान निर्माता डॉ. बीआर आम्बेडकर ने कहा था कि यूसीसी जरूरी है लेकिन फिलहाल यह स्वैच्छिक रहना चाहिए।

संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 35 को भारत के संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 44 के रूप में राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों के हिस्से के रूप में जोड़ा गया था। इसे संविधान में इस नजरिए के रूप में शामिल किया गया था जो तब पूरा होगा जब राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा और यूसीसी को सामाजिक स्वीकृति दी जा सकती है।

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