राजस्थान में विधानसभा चुनाव भले दो साल दूर हैं, लेकिन कांग्रेस ने राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन को नए सिरे से सींचना शुरू कर दिया है। पार्टी अब सिर्फ भजनलाल सरकार की कमियों को उजागर करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि संगठन को धार देने, युवाओं को साधने और नए सामाजिक समीकरणों के सहारे एक लंबी लड़ाई का आधार तैयार करने में जुटी है।
हालांकि, कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ सत्ताधारी भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर मौजूद अलग-अलग क्षत्रपों के बीच संतुलन और आपसी समन्वय बनाए रखने की भी है। राज्य में एक तरफ अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे स्थापित और भारी-भरकम चेहरे हैं तो दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की नई जोड़ी मुख्य भूमिका में उभरकर सामने आई है। विधानसभा के भीतर और बाहर डोटासरा अपने आक्रामक तेवरों से सरकार को लगातार घेर रहे हैं।
डोटासारा और टीकाराम की कर चुके हैं तारीफ
वहीं, टीकाराम जूली अपेक्षाकृत संतुलित और तथ्यों पर आधारित शैली में सत्ता पक्ष पर हमला बोलते हैं। जूली का अनुसूचित जाति वर्ग समेत कई सामाजिक समूहों में अच्छा प्रभाव माना जाता है, जबकि डोटासरा की गिनती प्रदेश के सबसे प्रभावशाली जाट नेताओं में होती है। वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में शून्य पर सिमटने वाली कांग्रेस ने 2024 में डोटासरा के संगठनात्मक नेतृत्व में सुधार कर आठ सीटें जीती। यही वजह है कि राहुल गांधी ने पुष्कर दौरे के दौरान गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली की कार्यशैली और आपसी तालमेल की खुलकर सराहना की थी।
कोटा चयन के पीछे की रणनीति और जन शताब्दी का सफर
नेताओं की इस महत्वाकांक्षा के बीच राहुल गांधी का पूरा ध्यान पार्टी को व्यक्तिगत एजेंडे से ऊपर उठाकर एक मजबूत और एकजुट मॉडल में ढालने पर है। इसी रणनीति के तहत कोटा से छात्रों की गूंज नाम के राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरुआत की जा रही है। युवाओं और आम जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करने के लिए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से जन शताब्दी एक्सप्रेस में सवार होकर कोटा रवाना होंगे। किसी वीआईपी तामझाम के बिना एक आम यात्री की तरह सफर करने के पीछे उनकी रणनीति इस अभियान को सीधे जमीन से जोड़ने की है। कोटा को चुनने के पीछे भी पार्टी की सोची-समझी रणनीति है।
यह शहर न केवल राजस्थान का शैक्षणिक केंद्र है, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आने वाले लाखों हिंदी भाषी छात्रों का सबसे बड़ा हब है।
पायलट की उम्मीदें और गहलोत के सियासी तेवर
दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय से चली आ रही सियासी तकरार थमती नजर आ रही है। हालांकि, चर्चा है कि सचिन पायलट अब भी आलाकमान से प्रदेश की कमान मिलने की उम्मीद लगाए हैं। जानकारों का मानना है कि पायलट को समय रहते संगठन की जिम्मेदारी मिलती है तो वह स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में खुद को स्थापित कर लेंगे।


