इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वाली सगी बहनों को पिता की ओर से हिरासत में रखने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। कोर्ट ने कहा कि बालिग को अपनी आस्था, धर्म, निवास और जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने का अधिकार है। माता-पिता अपनी संतान के धार्मिक या व्यक्तिगत फैसलों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उनकी स्वतंत्रता नहीं छीन सकते।
इस टिप्पणी संग कोर्ट ने दोनों बहनों को अपनी पसंद के स्थान व व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दी। साथ ही पिता और प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये दोनों को मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया है।
आगरा निवासी सगी बहनों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। उसमें कहा गया था कि दोनों ने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपना लिया है। इससे नाराज माता-पिता ने उन्हें अवैध रूप से बंधक बना रखा है। कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने दोनों को पेश किया तो बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है।
उन्हें जबरन घर में रोका गया
एक बहन ने कहा कि मैं 35 वर्ष की है, जूलॉजी में एमएससी, एमफिल और बीएड कर चुकी हूं। मैंने धर्म परिवर्तन का निर्णय मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुष्टि के लिए लिया था। दोनों बहनों के अनुसार पिता उनके फैसले से सहमत नहीं थे। उन्हें वापस हिंदू धर्म अपनाने के लिए दबाव डालते रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें जबरन घर में रोका गया। बाहर जाने और अपनी पसंद से जीवन जीने की स्वतंत्रता नहीं दी गई।

