राज्य की राजनीति में पारिवारिक रिश्ते अक्सर दिलचस्प मोड़ लेते हैं। कई बार एक ही घर के सदस्य अलग-अलग राजनीतिक दलों में शामिल हो जाते हैं। टिकट की दौड़, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बदलते समीकरण इसके मुख्य कारण हैं। इसी वजह से पंजाब के कई राजनीतिक परिवार अलग-अलग खेमों में बंट गए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के भाई मनोहर सिंह ने 2022 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर बस्सी पठाना से निर्दलीय चुनाव लड़ा। कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा और उनके भाई फतेह जंग सिंह बाजवा भी इसका उदाहरण हैं। प्रताप बाजवा कांग्रेस में विपक्ष के नेता बने रहे जबकि फतेह जंग ने भाजपा का दामन थामा।
बादल परिवार में भी चचेरे भाइयों के रास्ते अलग हुए। मनप्रीत सिंह बादल ने अकाली दल छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई, फिर कांग्रेस और बाद में भाजपा में गए। वहीं, सुखबीर सिंह बादल अकाली दल की कमान संभालते रहे। दिवंगत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। उनके चचेरे भाई गुरकीरत सिंह कोटली कांग्रेस में ही विधायक और मंत्री बने रहे। बटाला के अश्वनी सेखड़ी और इंदरवीर सिंह सेखड़ी ने 2017 में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। बाद में दोनों भाजपा में शामिल हुए, पर 2023 में जमीन विवाद में हाथापाई तक हुई।

