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एआई खुद नए मॉडल बनाने की दहलीज पर:वैज्ञानिकों की चिंता- कहीं मशीनों के फैसलों पर इंसानी लगाम छूट न जाए

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एआई को लेकर अब तक सवाल था कि वह इंसानों का काम कितनी तेजी से कर सकता है। लेकिन अब चिंता इससे आगे की है। विशेषज्ञ पूछ रहे हैं- अगर एआई अगली पीढ़ी के मॉडल खुद बनाने लगे तो क्या इंसान उसे नियंत्रित कर पाएंगे? हाल में एआई कंपनी एंथ्रोपिक ने कहा था कि फ्रंटियर एआई डेवलपमेंट धीमा करने या अस्थायी रूप से रोकने का विकल्प होना चाहिए। कंपनी के अनुसार, मई 2026 में प्रकाशित कोड का 80% से ज्यादा हिस्सा एआई ने लिखा था। एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक जैक क्लार्क का अनुमान है कि 2028 तक ऐसा सिस्टम संभव है, जो इंसानी मदद के बिना अपना नया संस्करण तैयार कर सके। इसे रिकर्सिव सेल्फ इम्प्रूवमेंट कहते हैं। यानी एआई का एक मॉडल दूसरे को बनाए, दूसरा तीसरे को और तीसरा चौथे को। हर मॉडल पहले से ज्यादा सक्षम हो। एमआईटी के भौतिक विज्ञानी और एआई सुरक्षा विशेषज्ञ मैक्स टेगमार्क चेताते हैं कि यदि विकास की रफ्तार पर निगरानी नहीं रही तो एआई निर्णय लेने में इंसानों से आगे निकल जाएगा। ऐसे में सरकारों, कंपनियों और अहम संस्थानों में इंसानी भूमिका कमजोर हो सकती है। कुछ साल पहले तक एआई सिर्फ निर्देश मानता था। अब समाधान खोज रहा है। गूगल डीपमाइंड के एआई सिस्टम अल्फा इवॉल्व ने डेटा सेंटरों की कार्यप्रणाली सुधारने और एआई ट्रेनिंग तेज करने के तरीके सुझाए। यही वजह है कि वैज्ञानिकों का एक वर्ग मानता है कि इंसान शोधकर्ता के बजाय रिसर्च डायरेक्टर रह जाएंगे। वे सिर्फ दिशा देंगे। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ये बदलाव रातोरात नहीं होगा। एआई को अब भी डेटा सेंटर, महंगे चिप्स, बिजली और नई ट्रेनिंग सामग्री की जरूरत है। उसकी गति फिलहाल सीमित रहेगी। अभी एआई उत्तराधिकारी नहीं बनाता, पर ट्रेनिंग तेज कर रहा अभी कोई एआई मॉडल अपना उत्तराधिकारी पूरी तरह खुद नहीं बना सकता। पर बड़े मॉडल छोटे मॉडल खुद बना सकते हैं। ओपनएआई के पूर्व शोधकर्ता आंद्रेज कारपैथी ने जीपीटी-2 जितना सक्षम चैटबॉट प्रशिक्षित किया। जीपीटी-2 को ओपनएआई ने 2019 में बनाया था। तब 168 घंटे लगे थे। कारपैथी ने एक कंप्यूटर में 8 जीपीयू के साथ वही नतीजा 3 घंटे में हासिल किया। बाद में ये काम एआई एजेंट को दे दिया। उसने इसे 18% और कम कर दिया।

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