
ईरान की सत्ता के गलियारों से इस वक्त जो खबरें आ रही हैं, वे किसी बड़े राजनीतिक भूकंप से कम नहीं हैं. इस्लामिक रिपब्लिक के भीतर ‘हार्डलाइनर्स’ और ‘मॉड्रेट्स’ के बीच छिड़ी जंग अब सड़कों से निकलकर तेहरान के सबसे सुरक्षित दफ्तरों तक पहुंच गई है. रिपोर्ट्स की माने तो अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता को लेकर ईरान की लीडरशिप में ऐसी दरार पड़ी है, जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. क्या यह ईरान के ‘सुप्रीम लीडर’ के साम्राज्य के अंत की शुरुआत है? या फिर यह सत्ता पर काबिज होने के लिए एक नया खेल है?
अगर ये सच है और रिपोर्ट्स जो सामने आ रही हैं उनकी माने तो यह सिर्फ नेतृत्व की लड़ाई नहीं, बल्कि उस दिशा की जंग है जिसमें ईरान आगे बढ़ना चाहता है, समझौते की ओर या टकराव की ओर. सबसे बड़ा सवाल है कि क्या इस आंतरिक खींचतान से अमेरिका को रणनीतिक बढ़त मिल रही है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में दो ताकतवर शख्सियतें हैं- संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ और कट्टरपंथी नेता सईद जलीली. हाल ही में गालिबाफ ने पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत का नेतृत्व किया था, लेकिन जैसे ही वह लौटे, कट्टरपंथी धड़े ‘पायदारी’ ने उन पर हमला बोल दिया. आरोप है कि गालिबाफ ने परमाणु मुद्दे पर बातचीत करके नए सुप्रीम लीडर आयतोल्ला मुज्तबा खामेनेई के ‘रेड लाइन्स’ को पार किया है.
कट्टरपंथी सांसद महमूद नबवियां, जो खुद वार्ता टीम का हिस्सा थे, उन्होंने खुलेआम कहा कि बातचीत केवल ईरान के लिए नुकसानदेह है और परमाणु कार्यक्रम को इसमें शामिल करना एक ‘रणनीतिक गलती’ थी. वहीं, जलीली के समर्थकों का दावा है कि गालिबाफ एक ‘लिबरल’ हैं जो पश्चिमी देशों के सामने झुक रहे हैं.
तो फिर कौन हैं सईद जलीली?
‘लिविंग शहीद’ की वापसी ईरान के अगले ‘न्यूक्लियर नेगोशिएटर’ के रूप में सईद जलीली का नाम सबसे ऊपर है. 60 साल के जलीली को ईरान में ‘लिविंग शहीद’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध में अपना दाहिना पैर खो दिया था. जलीली कट्टरपंथ की उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अमेरिका के साथ किसी भी समझौते के खिलाफ है. वह 2007 से 2013 के बीच ईरान के मुख्य परमाणु वार्ताकार रह चुके हैं और उनके दौर में ईरान पर सबसे सख्त प्रतिबंध लगाए गए थे. जलीली को एक ‘अकुशल वार्ताकार’ माना जाता है जो घंटों तक दर्शनशास्त्र पर भाषण देते हैं लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते.
गालिबाफ: ‘प्रैग्मैटिक हार्डलाइनर’ या चतुर राजनेता?
दूसरी ओर गालिबाफ हैं, जिन्हें ‘प्रैग्मैटिक हार्डलाइनर’ कहा जाता है. वह रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के पूर्व कमांडर और तेहरान के मेयर रह चुके हैं. गालिबाफ पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. यहां तक कि उन्हें ‘ईरान का सबसे भ्रष्ट कमांडर’ तक कहा गया है. मेयर रहते हुए उन्होंने तेहरान की बेशकीमती जमीनों को अपने करीबियों को कौड़ियों के दाम बेचने का आरोप झेला, लेकिन सुप्रीम लीडर खामेनेई के साथ उनके करीबी रिश्तों ने उन्हें हमेशा बचाया है. गालिबाफ का मानना है कि शासन को बचाने के लिए पश्चिम के साथ कुछ हद तक समझौता जरूरी है.
‘बेत’: वह रहस्यमयी ताकत जो ईरान चलाती है
ईरान की असली ताकत न तो राष्ट्रपति के पास है और न ही संसद के पास. यह ताकत सिमटी हुई है ‘बेत-ए रहबरी’ के भीतर. यह एक ऐसी समानांतर सरकार है जिसमें 4,000 से अधिक कर्मचारी और अरबों डॉलर का साम्राज्य है. खामेनेई के बेटे मुज्तबा खामेनेई इस ‘बेत’ के भीतर ‘सुप्रीम लीडर’ की तरह काम करते हैं. इसी दफ्तर का नियंत्रण ईरान की सेना (IRGC), अर्थव्यवस्था और यहां तक कि लोगों की निजी जिंदगी पर भी है.
आर्थिक तबाही और डूबता ईरान ईरान इस वक्त केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि भीषण आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है. होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था दम तोड़ रही है. खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान की अर्थव्यवस्था इस नाकेबंदी को 6 से 8 सप्ताह से ज्यादा सहन नहीं कर पाएगी. इंटरनेट बंद होने के कारण 20% कार्यबल बेरोजगार हो चुका है और निजी क्षेत्र में 20 लाख और नौकरियां जाने का खतरा है.
जनता का गुस्सा और तख्तापलट का डर भीतर खाने खबर है कि सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने एक गुप्त बैठक की है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के कारण जनता का विद्रोह हो सकता है. सुरक्षा एजेंसियां विशेष रूप से निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी के आह्वान से डरी हुई हैं. इससे पहले जनवरी 2026 में हुए प्रदर्शनों में खौफनाक हिंसा हुई थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे.
क्या गालिबाफ ईरान के ‘ख्रुश्चेव’ बनेंगे?
विद्वान अब गालिबाफ की तुलना सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव से कर रहे हैं. क्या वह व्यवस्था को बचाने के लिए इसमें सुधार कर पाएंगे, या फिर कट्टरपंथी उन्हें रास्ते से हटा देंगे? जलीली की संभावित नियुक्ति यह संकेत देती है कि ईरान अब समझौते के बजाय ‘प्रतिरोध’ का रास्ता चुनेगा, जो उसे सीधे युद्ध की ओर ले जा सकता है.

