ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां से दोनों में से किसी एक का जीत हासिल किए बिना रुकना अब नामुमकिन है. ईरान अमेरिकी ठिकानों को तबाह कर रहा है, इजरायली ठिकानों को तबाह कर रहा है तो अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरानी ठिकानों को तबाह करने में जुटे हैं. ऐसे में इंतेजार सिर्फ इस बात का है कि आखिर कब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में अमेरिकी सेना उतारेंगे. क्योंकि बिना जमीन पर लड़ाई लड़े इस जंग का खत्म होना मुमकिन नहीं दिख रहा है. लेकिन सवाल है कि ट्रंप अमेरिकी सेना को ईरान में आखिर क्यों नहीं उतार रहे हैं. आखिर वो कौन सा डर है, जो उन्हें इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर जमीनी हमला करने से रोक रहा है और इससे भी बड़ा सवाल कि अगर ट्रंप ने किसी कमजोर पल में ईरान में अमेरिकी सेना को उतारने का फैसला कर भी लिया, तो उस सेना का हश्र क्या होगा.
इस जंग को चलते हुए तकरीबन 24 दिन का वक्त बीत चुका है. इन 24 दिनों में ऊपरी तौर पर अमेरिका काफी मजबूत दिख रहा है, क्योंकि उसने एक-एक करके अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत ईरान के लगभग 50 से भी ज्यादा टॉप कमांडरों को मार गिराया है. इसके बावजूद ईरान न तो झुकने को तैयार है और न ही टूटने को, क्योंकि ईरान की कमान अब मुज्तबा खामेनेई के हाथ में है, जो ईरान की सबसे एलिट और घातक फोर्स आईआरजीसी के भी कमांडर रह चुके हैं. लिहाजा जब तक आईआरजीसी का खात्मा नहीं होता है, ईरान की तरफ से ये जंग जारी रहेगी. इसलिए ईरान को रोकने का इकलौता तरीका ये है कि आईआरजीसी का खात्मा हो. और उसके खात्मे के लिए हवाई हमले से काम नहीं चलने वाला है. उसके लिए आमने-सामने की लड़ाई लड़नी होगी, जिसके लिए अमेरिकी सेना और इजरायली सेना को ईरान में दाखिल होना होगा.
लेकिन ट्रंप अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं. क्योंकि मध्य पूर्व एशिया में अमेरिका के जितने भी मिलिट्री कमांड हैं, कुल मिलाकर वहां पर पहले से ही करीब 50 हजार अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. ट्रंप के आदेश पर और भी करीब 2500 अमेरिकी जवान मध्य पूर्व एशिया की ओर बढ़ रहे हैं. लेकिन इनमें से कोई भी सीधे ईरान में दाखिल होने की हिम्मत नहीं जुटा रहा है. पिछले दिनों ट्रंप साफ तौर पर कह चुके हैं कि वो ईरान में अमेरिकी सेना को नहीं भेजेंगे. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 18 मार्च को ही ट्रंप ने एक रिपोर्टर के सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि उनका सेना भेजने का कोई इरादा नहीं है और अगर वो सेना को भेजेंगे भी, तो किसी को इसके बारे में बताएंगे नहीं. क्योंकि अमेरिका के ट्रंप हों या फिर इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों को ईरान में सीधे दाखिल होने का अंजाम मालूम है.
और अंजाम है अमेरिकी-इजरायली सैनिकों की मौत. क्योंकि ईरान की भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि वहां पर किसी दूसरे देश से आए सैनिकों का लड़ना और जीतना बेहद मुश्किल है. दरअसल ईरान दो पर्वतमालाओं से घिरा हुआ है. इनमें सबसे बड़ी पर्वतमाला है जाग्रोस, जिसे ईरान की अभेद्य दीवार के तौर पर देखा जाता है. ईरान के उत्तर-पश्चिम से लेकर दक्षिण-पूर्व तक इस पहाड़ की लंबाई करीब 1500 किलोमीटर है, जिसमें 13000 फीट से भी अधिक ऊंचाई वाली चोटियां हैं. ये कोई एक पहाड़ नहीं बल्कि पहाड़ियों की पूरी श्रृ्ंखला है, जो किसी भी सेना का रास्ता रोक देता है. क्योंकि जमीनी सेना के पास जो हथियार होते हैं जैसे टैंक या फिर बख्तरबंद गाड़ियां, उन्हें इन पहाड़ों से गुजरने का रास्ता ही नहीं मिलता है. कुछ दर्रे हैं, जहां से अमेरिकी सेना अपने हथियारों को लेकर गुजर सकती है, लेकिन उन दर्रों पर पहले से ही ईरानी सेना का कब्जा है, जो घात लगाकर अमेरिकी सेना पर हमला कर सकते हैं. अगर अमेरिकी सेना एक घाटी को पार कर भी ले तो सामने तुरंत ही दूसरी घाटी आ जाएगी. इन पहाड़ियों के बीच संकरी गलियां हैं, जहां ईरानी सेना ‘एंटी-टैंक मिसाइलों’ के साथ मौजूद रहती है.
बाकी जाग्रोस के अलावा एक और बड़ी पर्वतमाला है ईरान के पास, जिसे कहते हैं अल्बोर्ज. कैस्पियन सागर से ईरान की राजधानी तेहरान को यही पहाड़ अलग करता है. अगर अमेरिकी सेना को ईरान की राजधानी तेहरान पर कब्जा करना होगा, तो उसे अल्बोर्ज के पहाड़ों से ही गुजरना होगा. लेकिन यहां पर भी ईरानी सेना की तैनाती है, जिसे पहाड़ों में हराना अमेरिका के लिए बेहद मुश्किल है. बाकी इस पहाड़ की एक चोटी करीब 5610 मीटर ऊंची है, जिसका नाम है माउंट दमावंद. इसकी वजह से अमेरिका के सैन्य जहाज भी इसके आस-पास नहीं फटक पाते हैं.
बाकी इन दोनों पहाड़ों के बीच का हिस्सा रेगिस्तान है. अगर किसी तरह से अमेरिकी सेना पहाड़ों को पार करके समतल इलाके में दाखिल हो भी जाती है तो उसे दश्त-ए-कवीर और दश्त-ए-लुत रेगिस्तान का सामना करना पड़ेगा. ये रेगिस्तान दुनिया के सबसे गर्म और सूखे इलाकों में शामिल हैं, जहां की जमीन नमक के दलदल जैसी है. अगर कोई भी भारी सैन्य साजोसामान जैसे कि टैंक, तोप या फिर बख्तरबंद गाड़ी इस रेगिस्तान से गुजरेगी तो उसका दलदल में धंसना तय है.
अब पूछने वाले पूछ सकते हैं कि ऐसी खराब भौगोलिक परिस्थिति सिर्फ अमेरिका के लिए ही थोड़ी होगी, धंसने को और फंसने को तो ईरानी सेना भी फंस सकती है. इसका जवाब है हां. मुश्किल जमीनी लड़ाई होने पर मुश्किल ईरानी सेना के लिए भी होगी. लेकिन इसका दूसरा पहलू ये है कि ईरानी सेना ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में ही तैयार हुई है. उनके लड़ने की ट्रेनिंग इन्हीं पहाड़ों की है. और ईरान ने भी इन पहाड़ों को अपनी सुविधा के हिसाब से काटकर उनके नीचे अपने बंकर बना रखे हैं.
इन पहाड़ों के नीचे ईरान ने पूरा का पूरा शहर बसा रखा है, जहां मिसाइलों का जखीरा है. जमीन से करीब 500 मीटर नीचे इसी भूमिगत शहर से ईरान मिसाइलें लॉन्च करता है. क्योंकि इस शहर में सिर्फ मिसाइल के गोदाम नहीं बल्कि लंबी-लंबी और बड़ी-बड़ी सुरंगे हैं, जिनमें ट्रक मिसाइल लेकर घूम सकते हैं और जरूरत पड़ने पर इन्हीं ट्रकों के जरिए मिसाइलों को लॉन्च पैड तक पहुंचाया जा सकता है. अमेरिका इस बात को बखूबी जानता है कि इस शहर को बंकर बस्टर बम गिराकर भी पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता.
बाकी तो ईरान को भी पता है कि वो आमने-सामने की लड़ाई में अमेरिका के सामने कहीं नहीं टिकता. ऐसे में ईरान ने अपनी सेना को कुछ इस कदर तैयार किया है कि अगर कोई कमांड सेंटर तबाह भी होता है, तो छोटे-छोटे ग्रुप में बंटी ईरानी सेना खुद से ही हमला कर सकती है. ईरान के दक्षिण में जहां पहाड़ और समुद्र मिलते हैं, वहां ईरान ने छोटी-छोटी गुफाओं में ‘सुसाइड ड्रोन’ और ‘फास्ट अटैक क्राफ्ट’ छिपा रखे हैं, जो अचानक निकलकर जहाजों पर हमला करते हैं.
अब अगर ईरान की ये भौगोलिक परिस्थितियां हम जैसे लोगों को मालूम हैं तो अमेरिका को तो इन परिस्थितियों के बारे में बखूबी मालूम होगा. अगर अमेरिकी सेना ईरान में दाखिल होती है तो उसे हर पहाड़ी चोटी और हर संकरी घाटी में ईरानी सेना से लड़ना होगा. और ये ठीक वैसा ही होगा, जैसा अमेरिकी सेना के साथ अफगानिस्तान में हुआ था.
अफगानिस्तान में भी ईरान की तरह की पहाड़ियां थीं और संकरी घाटियां थीं. तालिबानी लड़ाके हिंदुकुश की पहाड़ियों में घात लगाकर बैठे रहते थे. अमेरिकी सेना बड़े-बड़े हथियारों, टैंकों और तोप के साथ खुले मैदान में अजेय थी, लेकिन पहाड़ों में छिपे लड़ाकों को खोजकर मारना मुश्किल काम था. तालिबानी लड़ाके हमला करने के लिए बाहर आते, हमला करते और गुफाओं में छिप जाते. तब तालिबानी लड़ाकों ने एक जुमला उछाला था. वो कहते थे-
तुम्हारे पास घड़ियां हैं, लेकिन हमारे पास समय है.
तालिबान को पता था कि एक न एक दिन अमेरिकी जनता जंग से थक जाएगी. और जब अमेरिका में भी इस जंग को खत्म करने का दबाव बढ़ेगा तो राष्ट्रपति कोई भी हो, जंग खत्म करनी पड़ेगी. और यही हुआ भी. बिना कुछ हासिल किए अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर निकलना पड़ा. इससे पहले इराक और उससे भी पहले वियतनाम में भी अमेरिकी सेना के साथ यही हुआ था. जब लाखों-करोड़ों डॉलर जंग में बर्बाद होने लगे और अमेरिकी सैनिकों की लाशें अमेरिकी घरों में पहुंचने लगीं तो लोगों का गुस्सा विद्रोह में बदल गया. और अपनी सियासत को बचाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपतियों को जंग खत्म करनी पड़ी.
अब भी ये जंग शायद यूं ही खत्म होगी. क्योंकि ईरान अफगानिस्तान और इराक से भी दुर्गम है और अमेरिकी सेना के जमीन पर उतरने का मतलब इस जंग का अंतहीन हो जाना है. अपने राजनीति के उत्तरार्ध में पहुंचे ट्रंप को शायद ही इस जंग को लंबा खींचना गवारा होगा.


