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विधवा को मिला 2 करोड़ रुपए का बीमा क्लेम, 4 करोड़ रुपए के दावों पर कोर्ट ने सुनाए अलग-अलग फैसले

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एक विधवा महिला पिछले कई सालों से अपने दो जीवन बीमा के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रही थी. इस लड़ाई का कई सालों बाद अब अंत हो गया है. महिला के दो क्लेम में से एक क्लेम को स्वीकार करते हुए 2 करोड़ की राशि ब्याज के साथ दी जाएगी. जबकि इसी रकम के दूसरे दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया गया है. इस केस के बारे में जानना हर बीमा धारक के लिए जरूरी है.

दोनों बीमा हुए थे खारिज
ये मामला साल 2017 से लंबित था, जिसमें पॉलिसीधारक यानी महिला के पति की मृत्यु सेप्टिक शॉक के जरिए हो गई थी. मृतक की पत्नी ने दो अलग- अलग पॉलिसियों के तहत 4 करोड़ रुपये की कुल बीमा राशि के लिए आदित्य बिरला सनलाइफ इंश्योरेंस कंपनी से संपर्क किया था, तब कंपनी की तरफ से दोनों दावों को खारिज कर दिया गया था. इसके लिए बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि मृतक ने पॉलिसी के लिए आवेदन करते समय अपनी मौजूदा बीमा कवरेज की पूरी जानकारी नहीं दी थी. इसके बाद इस पूरे मामले की डीटेल में जांच हुई और ये मामला कानूनी लड़ाई बन गया.

कमियां नहीं बनीं केस का आधार
जब ये मामला कानूनी लड़ाई बना तक इसमें कई कमियों की बात सामने आई. हालांकि ये कमियां इस केस का आधार नहीं बनीं. दरअसल साल 2014 में जारी की गई पहली पॉलिसी की जांच की गई. आयोग को इस दौरान पता चला कि, बीमित व्यक्ति ने सभी मौजूदा पॉलिसियों का सटीक विवरण नहीं दिया था, लेकिन फिर भी उसमें काफी हद तक जानकारियां थीं. आयोग के अनुसार ये कमियां जानबूझकर नहीं थीं. इतना ही नहीं बीमित व्यक्ति ने पॉलिसी जारी करने से पहले अपना मेडिकल टेस्ट भी करवाया था, जिससे ये पता चलता है कि आवेदक के स्वास्थ्य का भी परीक्षण किया गया था.

मृत्यु का कारण बना महत्वपूर्ण
मामले की जांच में बीमा धारक की मृत्यु के कारण ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आयोग को पता चला कि सेप्टिक शॉक का बीमाकर्ता के पुराने किसी भी मेडिकल मुद्दे से लेना- देना नहीं था. इस बात ने भी आयोग को निर्णय लेने में मदद की. बीमाकर्ता को 2 करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया, साथ ही 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा.

दूसरी पॉलिसी क्यों हुई खारिज?
मृतक के द्वारा ली गई साल 2015 में दूसरी पॉलिसी को अलग तरह से देखा गया. इसमें आयोग ने पाया कि बीमित व्यक्ति के पास मौजूद कई उच्च मूल्य वाली पॉलिसियों की जानकारी प्रस्ताव प्रपत्र में बिल्कुल भी नहीं दी गई थी. इसे मामूली चूक नहीं माना गया. निर्णय में एक जरूरी बात ये भी थी कि हर बीमा आवेदन स्वतंत्र होता है. पिछली पॉलिसियों में दी गई जानकारी खुद ही अगली पॉलिसियों पर लागू नहीं होती. हर प्रस्ताव प्रपत्र में आवेदक की वर्तमान वित्तीय और बीमा स्थिति का पूर्ण विवरण होना चाहिए.

पर्याप्त कवरेज का विवरण न देकर, मृतक व्यक्ति इस आवश्यकता को पूरा करने में विफल रहा. जिसके चलते आयोग ने 2 करोड़ रुपये के दूसरे दावे को अस्वीकार करने के बीमाकर्ता के निर्णय में कोई त्रुटि नहीं पाई.

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