पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुदुचेरी में चुनावी सरगर्मी चरम पर है। पश्चिम बंगाल और केरल में हिंसा की घटनाएं सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। मलदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। वहीं, केरल में कांग्रेस नेता शशि थरूर के काफिले पर शनिवार को हमला कर दिया गया। चुनावी हिंसा और उसके परिणामों पर असर को लेकर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अजय सेतिया मौजूद रहे।
राकेश शुक्ल: ममता बनर्जी दो राष्ट्रीय पार्टियों के बीच अपने आप को सैंडविच नहीं बनाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने ये मुद्दा चुना। वो नहीं चाहती थीं कि उनके 15 साल के शासन पर सवाल हो। इसलिए उन्होंने एसआईआर को मुद्दा बनाया। आजादी के बाद से जो भी बंगाल के मिजाज से पार्टियां बनीं वो सत्ता में रहीं। भाजपा अब तक बंगाल के मिजाज के हिसाब की पार्टी नहीं बन सकी है। इसलिए अब तक वो सत्ता में नहीं आ सकी है। बंगाल का ये चुनाव भय और विश्वास का चुनाव है। असम के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का मुद्दा क्यों बन गए। दो राज्यों का चुनाव दो मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। असम का चुनाव पाकिस्तान के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है। वहीं, पश्चिम बंगाल का चुनाव बांग्लादेश के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है।
अजय सेतिया: बंगाल के चुनाव में हिंसा का लंबा इतिहास है। बाकी राज्यों में अब चुनावी हिंसा लगभग खत्म हो चुकी है। मालदा की घटना को दूसरे परिपेक्ष्य में देखना चाहिए। ममता सुप्रीम कोर्ट नहीं आईं होतीं तो सुप्रीम कोर्ट वहां न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति नहीं करता। तो ये मामला होता ही नहीं। न्यायिक अधिकारियों का घेराव कोई छोटी मोटी घटना नहीं है। एसआईआर को मैं मुद्दा नहीं मानता। ये उनके लिए मुद्दा है जिनके वोट कट गए। जिनके वोट कट गए वो चुनाव को प्रभावित नहीं कर सकते हैं।
विनोद अग्निहोत्री: हिंसा की घटनाएं पश्चिम बंगाल के राजनीति संस्कृति का हिस्सा वर्षों से बना हुआ है। जहां तक सवाल ममता वर्सेज अमित शाह की बात है तो ऐसा होता है तो ममता बनर्जी फायदे में रहेंगी। चुनावी रणनीति, सामाजिक समीकरण साधने में अमित शाह की कोई सानी नहीं है। एसआईआर का मुद्दा बड़ा होने से ममता बनर्जी के खिलाफ जो सत्ता विरोधी लहर थी वो दब गई है। दूसरा शुवेंदु अधिकारी कभी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में चेहरा नहीं हो सकते हैं।
रामकृपाल सिंह: ऊसर जमीन में आप गेहूं नहीं बो सकते। बंगाल की पृष्ठभूमि को देखें तो वहां सबसे पहले वामपंथी विचारधारा पनपी। कम्युनिस्टों की विचारधारा यह थी कि वो इस सिस्टम को नहीं मानते। वहां सत्ता में रहे लोगों का नारा रहा है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। बंगाल और केरल दोनों जगह इस तरह की विचारधारा के लोग की संख्या बहुत अधिक है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: भाजपा प्रचार हर जगह कर रही है। तमिलनाडु और केरल हर जगह पार्टी अपनी सीटें बढ़ाने की कोशिश कर रही है। योगी आदित्यनाथ तमिलनाडु पहुंचे हैं, योगी जहां पहुंचते हैं वहां ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू हो जाती है। तमिलनाडु में भी यही कोशिश की गई है। इससे पहले असम में भी योगी आदित्यनाथ प्रचार करने पहुंचे थे। वहां भी उन्होंने उसी तरह की बातें की। भाजपा को इससे राजनीतिक फायदा होगा, कितना होगा यह तो चुनाव नतीजे बताएंगे।

