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Explained: 8 हफ्तों से बाजार क्यों गिर रहा और किस सेक्टर में कितना नुकसान? आप पर असर क्या

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भारतीय शेयर बाजार इस समय इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. 1 अक्टूबर 2026 को बाजार लगातार आठवें हफ्ते गिरावट के साथ बंद हुआ. यह पिछले 25 साल में सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है. इस दौरान निवेशकों के करीब 26 लाख करोड़ रुपए डूब चुके हैं. अगर आसान भाषा में कहें तो बाजार में पिछले दो महीने से लगातार खून बह रहा है और निवेशकों की संपत्ति तेजी से घट रही है. आखिर 25 साल में बाजार का इतना बुरा हाल कैसे हुआ, किस सेक्टर को कितना नुकसान और बाजार से क्यों बह रहा खून…

कितना हुआ नुकसान?

इस आठ हफ्ते की गिरावट में सेंसेक्स 6,590 अंक और निफ्टी 2,149 अंक टूट चुका है. पूरे हफ्ते की बात करें तो सेंसेक्स में 2.7% और निफ्टी में 3.1% की गिरावट दर्ज हुई. 1 अक्टूबर 2026 को सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79% गिरकर 71,909.70 पर बंद हुआ. निफ्टी 50 198.50 अंक यानी 0.88% गिरकर 22,421.95 पर बंद हुआ. यह सेंसेक्स का पिछले 28 महीने का सबसे निचला स्तर है.

सिर्फ एक हफ्ते में BSE पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब 20 लाख करोड़ रुपए घट गया. अगर पूरे आठ हफ्तों की बात करें तो यह आंकड़ा 26 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा हो चुका है.

आखिर बाजार गिरने की वजहें क्या हैं?

केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया के मुताबिक, बाजार की गिरावट के पीछे 6 बड़े कारण है:

  • अमेरिकी बॉन्ड यील्ड: अमेरिकी 10 साल के ट्रेजरी यील्ड ने 5.34% का स्तर छू लिया है, जो 2002 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. इसका सीधा मतलब है कि जब अमेरिका में निवेश पर इतना अच्छा रिटर्न मिल रहा है, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका ले जा रहे हैं.
  • विदेशी निवेशकों की बिकवाली: FII यानी विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली कर रहे हैं. सितंबर में FII ने करीब ₹44,013 करोड़ के शेयर बेचे. 1 अक्टूबर को FII ने ₹9,484.22 करोड़ के शेयर बेचे, जबकि DII यानी घरेलू निवेशकों ने ₹10,041.84 करोड़ के शेयर खरीदे. साल की शुरुआत से अब तक FII ने ₹4.12 लाख करोड़ की बिकवाली कर चुके हैं.
  • कच्चे तेल की कीमतें बढ़ना: ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत फिर से 99 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई है. भारत तेल आयात करने वाला देश है, इसलिए तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ता है, महंगाई बढ़ती है और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ता है.
  • रुपये की कमजोरी: डॉलर के मुकाबले रुपया 96 के स्तर को पार कर चुका है. रुपये की कमजोरी से विदेशी निवेशकों के लिए भारत में निवेश करना महंगा हो जाता है, जिससे वे और ज्यादा पैसा निकालते हैं.
  • ऑटो सेक्टर की कमजोर बिक्री: सितंबर महीने में कई कंपनियों की बिक्री उम्मीद से कम रही, जिससे ऑटो शेयरों में भारी गिरावट आई.
  • RBI की ब्याज दर बढ़ोतरी की आशंका: RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक 5 से 7 अक्टूबर के बीच होनी है. जानकारों का मानना है कि रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है. ब्याज दर बढ़ने से कर्ज महंगा होता है और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है.

किन सेक्टरों में सबसे ज्यादा नुकसान?

इस गिरावट में सबसे ज्यादा मार ऑटो सेक्टर को पड़ी है, लेकिन IT, रियल्टी और PSU बैंकिंग भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं:

  • ऑटो सेक्टर: Nifty Auto इंडेक्स इस हफ्ते 5.9% गिरा, जबकि सितंबर सीरीज में इस सेक्टर में करीब 9% की गिरावट दर्ज हुई. बजाज ऑटो के शेयर में 1 अक्टूबर को करीब 8% की गिरावट आई. मारुति सुजुकी का शेयर 5% गिरकर ₹11,366 तक पहुंच गया. महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) भी 52 हफ्ते के निचले स्तर पर आ गया. हीरो मोटोकॉर्प, आइशर मोटर्स, बॉश, अशोक लेलैंड और TVS मोटर के शेयर भी लगभग 3% से 4% तक गिरे. सितंबर महीने में कई कंपनियों की बिक्री उम्मीद से कम रहना और कमजोर मानसून से डिमांड की चिंता ने मार्केट तोड़ दिया. इसके अलावा सरकार ने कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE) नॉर्म्स का तीसरा चरण नोटिफाई किया, जिससे 2027-28 से पैसेंजर व्हीकल्स के लिए फ्यूल एफिशिएंसी टार्गेट 16.7% तक सख्त हो जाएंगे.
  • कंज्यूमर ड्यूरेबल्स: इस सेक्टर का इंडेक्स 6.2% टूटा, जबकि सितंबर सीरीज में इसमें करीब 6.5% की गिरावट रही. इस सेक्टर की सबसे बड़ी टाइटन कंपनी, इस हफ्ते Nifty 50 के सबसे बड़े लूजर्स में शामिल रही. ग्रामीण खपत में सुस्ती और कमजोर मांग इस सेक्टर की गिरावट की मुख्य वजह रही.
  • IT सेक्टर: Nifty IT इंडेक्स सितंबर महीने में 11% गिरा और यह उस महीने का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला सेक्टोरल इंडेक्स बना. यह गिरावट Nifty 50 की 6% की गिरावट से कहीं ज्यादा थी. LTM का शेयर 13% गिरा, TCS 12% टूटा, जबकि Wipro और Infosys में करीब 10-10% की गिरावट आई. Mphasis 9% गिरा, Coforge 7% टूटा और HCL Technologies में 6% की गिरावट दर्ज हुई. इस गिरावट की वजह ग्लोबल टेक्नोलॉजी स्पेंडिंग में कटौती, ऊंची ब्याज दरें और जनरेटिव AI का IT सर्विसेज पर बढ़ता दबाव था.
  • रियल्टी सेक्टर: सितंबर सीरीज में करीब 7% की गिरावट दर्ज हुई. इस सेक्टर को ऊंची ब्याज दरों का सबसे ज्यादा असर पड़ता है, क्योंकि ब्याज दरें बढ़ने से होम लोन महंगे हो जाते हैं और प्रॉपर्टी की मांग पर दबाव पड़ता है.
  • PSU बैंक: Nifty PSU Bank इंडेक्स सितंबर सीरीज में करीब 7% गिरा. 28 सितंबर को PSU बैंक इंडेक्स 3.24% गिरकर 8,026.10 पर बंद हुआ था. बैंक ऑफ इंडिया, PNB और कैनरा बैंक जैसे बड़े PSU बैंकों में भारी बिकवाली देखी गई. इसकी मुख्य वजह FII की सबसे ज्यादा बिकवाली वित्तीय सेवाओं में होना और लिक्विडिटी की चिंता थी.
  • मेटल सेक्टर: इस हफ्ते 2% से 3% तक की गिरावट रही. वेलस्पन कॉर्प के शेयर में 3.86% की गिरावट आई, NALCO 3.19% गिरा और अडाणी एंटरप्राइजेज 2.97% टूटा. क्रूड ऑयल के ऊंचे दाम से ट्रांसपोर्ट और सप्लाई चेन कॉस्ट बढ़ने का सीधा असर मेटल सेक्टर पर पड़ा.
  • FMCG सेक्टर: 2% से 3% की गिरावट दर्ज हुई. हिंदुस्तान यूनिलीवर और अन्य बड़ी FMCG कंपनियों के शेयर दबाव में रहे. ग्रामीण मांग में कमी और महंगाई का दबाव इस सेक्टर की गिरावट की मुख्य वजह रही.
  • इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर: सितंबर सीरीज में करीब 7% की गिरावट रही. L&T जैसी बड़ी कंपनी का शेयर 2.81% गिरा. ऊंची ब्याज दरें और सरकारी खर्च में सुस्ती इस सेक्टर के लिए चिंता का विषय बनी हुई है.
  • मीडिया सेक्टर: 2% से 3% की गिरावट दर्ज हुई. विज्ञापन खर्च में कटौती और कमजोर कॉरपोरेट नतीजों ने इस सेक्टर को प्रभावित किया.
  • फार्मा सेक्टर: अकेला ऐसा सेक्टर रहा जिसने सितंबर सीरीज में 0.7% की मामूली बढ़त दर्ज की. डिफेंसिव सेक्टर होने के नाते फार्मा में मंदी के दौर में भी दवाओं की मांग बनी रहती है, जिससे यह सेक्टर बाजार की गिरावट में सहारा देता है.
  • एनर्जी, ऑयल एंड गैस सेक्टर: 1% से ज्यादा की गिरावट रही. रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 2.24% गिरा. क्रूड के ऊंचे दाम से रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव पड़ा.

तो मार्केट का हाल ऐसा कब तक रहेगा?

इतिहास पर नजर डालें तो 1992 से अब तक निफ्टी में आठ हफ्ते की गिरावट सिर्फ छह बार देखी गई है. पिछली बार ऐसा 2001 में हुआ था. हालांकि, इतिहास यह भी बताता है कि ऐसी गिरावट के बाद बाजार में तेजी आई है. पिछली छह बार में गिरावट खत्म होने के बाद निफ्टी ने एक महीने में औसतन 11%, तीन महीने में 12%, छह महीने में 14% और 12 महीने में 39% का रिटर्न दिया है.

हालांकि, इस बार हालात अलग हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में कमी नहीं आती, तेल की कीमतें नहीं थमतीं और रुपया मजबूत नहीं होता, तब तक विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रह सकती है.

PL कैपिटल के विक्रम कसाट के मुताबिक, ‘अक्टूबर के लिए मुख्य बात यह है कि जब तक वैश्विक लिक्विडिटी टाइट बनी हुई है, सिर्फ घरेलू बुनियादी बातें बाजार में टिकाऊ रिकवरी के लिए काफी नहीं होंगी.’

निवेशकों को सतर्क रहने और लंबी अवधि के नजरिए से निवेश करने की सलाह दी जा रही है. छोटे निवेशकों के लिए यह समय धैर्य बनाए रखने का है, क्योंकि बाजार में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और ऐसे मौकों पर घबराकर निवेश बेचना नुकसानदेह साबित हो सकता है.

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