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बच्चों को डांटे बिना सिखाएं डिसिप्लिन, गांधीजी की ये 5 सीख आएंगी काम

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Parenting Tips: बच्चों को डिसिप्लिन सिखाना हर माता-पिता के लिए आसान नहीं होता. कई बार बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए जिद करता है, गलती होने पर सच नहीं बताता या अपने छोटे-छोटे काम के लिए भी माता-पिता पर निर्भर रहता है. ऐसे में माता-पिता अक्सर बच्चे को डांटने लगते हैं. लेकिन डिसिप्लिन का मतलब सिर्फ बच्चे से हर बात मनवाना नहीं है. बच्चे को यह समझाना भी जरूरी है कि सही क्या है, गलत क्या है और अपनी जिम्मेदारी कैसे निभानी है. महात्मा गांधी के जीवन और लेखन में सच, सादगी, धैर्य, अहिंसा और मेहनत जैसी बातों को महत्व मिलता है. उनकी ऑटोबायोग्राफी सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा में उन्होंने अपने जीवन के एक्सपीरियंस और अपनी गलतियों के बारे में भी लिखा है. गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनकी ऑटोबायोग्राफी और दूसरे ओरिजिनल लिखावटों में मौजूद हैं. आज के माता-पिता इन विचारों से प्रेरणा लेकर बच्चों में भी कुछ अच्छी आदतें डाल सकते हैं.

बच्चे को सच बोलना और अपनी गलती मानना सिखाएं

गांधीजी के जीवन में सच का बहुत बड़ा महत्व था. उन्होंने अपनी किताब 'सत्य के प्रयोग' में अपनी जिंदगी की कई घटनाओं और अपनी भूलों के बारे में बिना किसी हिचकिचाहट के खुलकर लिखा है. गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनके असली लेखन में भी अपनी गलती मानने से जुड़ी कई बातें पढ़ने को मिलती हैं. माता-पिता इससे अपने बच्चों को एक बहुत अच्छी आदत सिखा सकते हैं. अगर बच्चे से कोई गलती हो जाए, तो फौरन उस पर डांटने-चिल्लाने के बजाय सबसे पहले उसकी पूरी बात सुनें. उससे प्यार से पूछें कि आखिर क्या हुआ था. उसे इस बात का यकीन दिलाएं कि वह अपनी गलती के बारे में सच-सच बता सकता है और उसे डरने की जरूरत नहीं है. मान लीजिए, खेलते-खेलते बच्चे से घर की कोई चीज टूट गई. अगर वह खुद आकर आपको बता देता है कि उससे नुकसान हो गया है, तो उसकी इस ईमानदारी की तारीफ करें. फिर उसे प्यार से समझाएं कि आगे से थोड़ा ध्यान और सावधानी रखे. इससे बच्चे को धीरे-धीरे यह बात समझ में आ जाएगी कि गलती होने पर उसे छिपाने के बजाय मान लेना और आगे से सुधारना ही सही रास्ता है.

गुस्से में खुद को संभालना सिखाएं

बच्चों को छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना आम बात है. कभी उनकी पसंद की चीज़ नहीं मिलती तो वे ज़िद करने लगते हैं, तो कभी किसी दोस्त की बात बुरी लगने पर नाराज हो जाते हैं. ऐसे समय में बच्चे को डांटने के बजाय उसे अपनी भावनाओं को संभालना सिखाना जरूरी है. गांधीजी के विचारों में अहिंसा और धैर्य को बहुत खास जगह मिली. उनके असली लेखन के संग्रह में सच और अहिंसा से जुड़े विचार मिलते हैं. माता-पिता बच्चे को समझा सकते हैं कि गुस्सा आना गलत नहीं है, लेकिन गुस्से में किसी को मारना, चीजें फेंकना या बुरा बोलना सही नहीं है. जब बच्चा बहुत गुस्से में हो तो उसे कुछ देर शांत होने दें. इसके बाद आराम से बैठकर उसकी बात सुनें. बच्चे को यह भी सिखाया जा सकता है कि जब उसे बहुत गुस्सा आए तो तुरंत जवाब देने के बजाय थोड़ी देर रुक जाना बेहतर है. धीरे-धीरे वह अपनी भावनाओं को समझना और उन्हें संभालना सीख जाएगा.

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बच्चे को जरूरत और इच्छा का फर्क समझाएं

गांधीजी की जिंदगी हमेशा सादगी से जुड़ी रही। उनकी ऑटोबायोग्राफी में सादगी से जुड़ी यह बात साफ दिखाई देती है. गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनके विचारों में कहा गया है कि सादगी सिर्फ बाहर से दिखाने के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह इंसान की आदत और स्वभाव में होनी चाहिए. आजकल बच्चे अपने किसी दोस्त के पास नया खिलौना, कपड़े या कोई महंगी चीज देखकर वही लेने की जिद करने लगते हैं. इंटरनेट और विज्ञापनों के कारण भी उनके सामने रोज नई-नई चीजें आती रहती हैं. ऐसे में बच्चे की हर जिद तुरंत पूरी करने के बजाय उससे आराम से बात करें. उससे पूछें कि क्या उसे उस चीज की सच में जरूरत है या वह बस दूसरों को देखकर उसे पाना चाहता है. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बच्चे की हर मांग को मना कर दिया जाए. बल्कि उसे धीरे-धीरे यह समझाना है कि हर पसंद आने वाली चीज जरूरी नहीं होती. इससे बच्चा अपनी असली जरूरत को समझना और चीजों की सही कीमत पहचानना सीख जाएगा.

मेहनत और अपनी जिम्मेदारी की आदत डालें

बच्चों को डिसिप्लिन सिखाने के लिए उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से कुछ छोटे-छोटे काम खुद करने की आदत डालना बहुत अच्छा तरीका हो सकता है. गांधीजी की जिंदगी और उनके विचारों में मेहनत और काम को बहुत महत्व दिया गया था. उनके असली लेखन का संग्रह गांधी हेरिटेज पोर्टल पर देखने को मिलता है. माता-पिता इस सीख को बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ सकते हैं. छोटे बच्चे खेलने के बाद अपने खिलौने खुद समेट कर रख सकते हैं. स्कूल जाने वाले बच्चे अपनी किताबें सही जगह पर रख सकते हैं, अपना बैग तैयार कर सकते हैं और अपनी चीजों को संभालकर रख सकते हैं. शुरुआत में बच्चा इन कामों को करने में थोड़ा आनाकानी या नखरे कर सकता है. ऐसे समय में उसे डांटने के बजाय प्यार से समझाएं. जरूरत हो तो शुरू में उसके साथ मिलकर काम करवाएं. फिर बाद में धीरे-धीरे उसे अपना काम खुद करने दें. इससे बच्चे को यह बात समझ आने लगेगी कि उसकी अपनी चीजों और अपने छोटे-छोटे कामों की जिम्मेदारी भी उसी की है.

दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना सिखाएं

बच्चों को डिसिप्लिन सिखाने का मतलब सिर्फ समय पर उठना, पढ़ाई करना या अपना काम निपटाना ही नहीं है. दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना भी अच्छी परवरिश का एक बहुत जरूरी हिस्सा है. गांधीजी के विचारों में अहिंसा को बहुत खास जगह मिली. उनके असली लेखन में सच और अहिंसा से जुड़े विचार बार-बार देखने को मिलते हैं. गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनके विचारों का बड़ा संग्रह मौजूद है. माता-पिता बच्चों को समझा सकते हैं कि किसी को जानबूझकर परेशान करना, मारना या उसका मजाक उड़ाना सही बात नहीं है. घर के बड़े लोगों से हमेशा इज्जत से बात करनी चाहिए और छोटे बच्चों से भी प्यार से पेश आना चाहिए. लेकिन सिर्फ बच्चे को समझा देना ही काफी नहीं है। माता-पिता को खुद भी बच्चे के सामने दूसरों से इज्जत से बात करनी चाहिए. बच्चे अपने आसपास के लोगों को देखकर ही सबसे ज्यादा सीखते हैं. इसलिए अगर माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा शांत तरीके से बात करे, तो उन्हें खुद भी बच्चे के सामने वैसा ही व्यवहार करने की कोशिश करनी चाहिए.

डांट से ज्यादा जरूरी है सही उदाहरण देना

बच्चों को डिसिप्लिन सिखाने के लिए हर छोटी गलती पर डांटना जरूरी नहीं है. बहुत ज्यादा डांटने पर बच्चा डर के मारे अपनी गलती छिपाने लग सकता है. इसके बजाय उसे अपनी बात कहने और गलती सुधारने का मौका देना ज्यादा मददगार साबित हो सकता है. गांधीजी की जिंदगी और उनकी किताबों से सच, सादगी, धीरज, मेहनत और अहिंसा जैसी कई सीख मिलती हैं. उनकी आत्मकथा और उनके बाकी असली लेखन गांधी हेरिटेज पोर्टल पर देखने को मिलते हैं. यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि गांधीजी ने आज के जमाने की तरह बच्चों की परवरिश के लिए ये पांच नियम एक साथ बनाकर नहीं दिए थे. इस आर्टिकल में उनकी जिंदगी और विचारों से जुड़ी बातों को आज के माता-पिता और बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर समझाया गया है. माता-पिता बच्चे की उम्र और समझ के हिसाब से इन अच्छी आदतों को उसकी रोज की जिंदगी में शामिल कर सकते हैं. बच्चे को प्यार से समझाना, खुद उसके सामने सही उदाहरण पेश करना और उसकी अच्छी कोशिशों की तारीफ करना ही डिसिप्लिन सिखाने का सबसे आसान तरीका हो सकता है.

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