जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर हिमालय के हिस्सों में देखने को मिला है. हाल ही में आई नेपाल बाढ़ ने भारत और चीन की चिंता की लकीरें बढ़ा दी हैं. अब ऐसे में नेपाल के पीएम बालेंद्र शाह ने खुद से पहल करते हुए भारत और चीन से हिमालयी क्लाइमेट रिसाइलेंस मैकेनिज्म (हिमालय गतिविधियों को लेकर एक वॉर्निंग सिस्टम) में शामिल होने की अपील की है.
उन्होंने कहा है कि इसका मकसद सैटेलाइट डेटा शेयर करना है. साथ ही खतरनाक ग्लेशियल झीलों की संयुक्त रूप से निगरानी करना है. इसके अलावा प्राइमरी वॉर्निंग यूनिट को मजबूत करना है. साथ ही बॉर्डर पार समन्वय बनाए रखना है. बालेंद्र शाह ने यह बातें संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहीं हैं.
जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं मानता: बालेंद्र शाह
उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन बॉर्डर्स को नहीं मानता है. 26 अगस्त को आई बाढ़ में 1400 लोगों की मौत हो गई थी. 6 हजार से अधिक लोग लापता हो गए थे. संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पहले संबोधन में 36 साल के शाह ने कहा है कि ग्लेशियर और बाढ़ पासपोर्ट पर वीजा लगवाकर यात्रा नहीं करते हैं. 28 मार्च को पदभार संभालने के बाद बालेंद्र शाह की यह पहली विदेश यात्रा है.
नेपाल पीएम ने भारत-चीन को कहा- थैंक्यू
बालेंद्र शाह ने भारत और चीन को बाढ़ जैसे मुश्किल हालात में तत्काल सहायता देने के लिए धन्यवाद भी दिया. उन्होंने कहा कि ग्लोबल वॉर्मिंग पर्माफ्रॉस्ट को पिघलाकर, पहाड़ी ढलानों को कमजोर करके और बर्फ चट्टान के हिमस्खलन, बाढ़, लैंडस्लाइड और अन्य जुड़े हुए खतरों के जोखिम को बढ़ाकर नाजुक हिमालयी को अस्थिर कर रही हैं. उन्होंने कहा है कि 26 अघस्त को आपदा ने नेपाल-चीन सीमा के दोनों और भारी तबाही मचाई. इसके बाद बाढ़ का पानी भारत की ओर बहता चला गया. शाह ने हिमालयी क्लाइमेट रिसाइलेंस मैकेनिज्म का प्रस्ताव रखते हुए कहा है कि हिंदू कुश हिमालय पानी, इको सिस्टम, कृषि और आजीविका के माध्यम से लगभग दो अरब लोगों को फायदा पहुंचाता है.
हमने संकट पैदा नहीं किया, लेकिन भारी कीमत चुका रहे
बालेंद्र शाह ने साफ कहा है कि हिमालय को इंटरनेशनल सपोर्ट के लिए एक प्रयोगशाला बनने दें. शाह ने कहा है कि नेपाल वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 से भी कम योगदान देता है, लेकिन उसे इसका बहुत अधिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. हमने यह संकट पैदा नहीं किया है. फिर भी हम इसके लिए भारी कीमत चुका रहे हैं. इसके अलावा शाह ने कहा है कि जब एक गरीब देश की बुनियादी ढांचे को जलवायु से जुड़ी आपदाएं नुकसान पहुंचाती है, या नष्ट कर देती हैं तो इसका समाधान केवल एक और बड़ा कर्ज या छोटे अनुदानों का मिला जुला रूप नहीं हो सकता. शाह ने अपने बयान में कहा है कि हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है, जिसमें युद्ध के लिए एक बेहतरीन लॉजिस्टिक्स सिस्टम है लेकिन भोजन के लिए एक खराब सिस्टम है.

