जम्मू-कश्मीर के कॉलेजों और पुस्तकालयों से बड़ी संख्या में किताबें हटाए जाने और 518 प्रकाशनों पर प्रतिबंध के बाद अब सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने किताबों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार ऐसे फैसले खुद नहीं ले सकती।
मामले में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने कार्रवाई को चिंताजनक बताते हुए हटाई गई किताबों के शीर्षक और उन्हें हटाने के कारण सार्वजनिक करने की मांग की। इस सब के बीच मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया, जबकि भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने कहा कि इतिहास तथ्यों के आधार पर पढ़ाया जाएगा, किस्से-कहानियों के आधार पर नहीं।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने का मुद्दा व्यापक बहस को जन्म देता है। लोकतंत्र में किताबों को प्रतिबंधित करना कितना सही है, इस पर उनके स्पष्ट विचार हैं। दुर्भाग्य से मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार ऐसे फैसले खुद नहीं ले सकती। उमर ने कहा कि परिस्थितियां बदलने पर पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी।
मीरवाइज ने पूछा…किसका एजेंडा लागू हो रहा
मीरवाइज उमर फारूक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कार्रवाई को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि विधानसभा में सरकार के जवाब से सामने आया है कि उच्च शिक्षा विभाग ने घाटी और जम्मू के कॉलेजों से 4,200 से अधिक किताबें हटा दी हैं। मीरवाइज ने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अकादमिक स्वतंत्रता तथा विविध विचारों व दृष्टिकोणों तक छात्रों की पहुंच स्वस्थ समाज और शिक्षा के विकास की मौलिक शर्त है। छात्रों को क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं, इसे थोपना सीखने की क्षमता और तार्किक सोच को कमजोर करता है।
मुख्य सचिव बोले, किताबों की जांच नियमित प्रक्रिया
सरकार का पक्ष रखते हुए मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने कार्रवाई को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि किताबों की जांच करना और उनके तथ्यों को देखना एक नियमित प्रक्रिया है। यदि कोई पुस्तक आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित है, उसमें आपत्तिजनक सामग्री है तो उसे सरकारी स्कूलों या परिसरों के पुस्तकालयों में नहीं रखा जाना चाहिए।
भाजपा ने कहा- इतिहास तथ्यों पर पढ़ाया जाएगा
उधमपुर से भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने सरकार के फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में इतिहास हमेशा तथ्यपरक ही पढ़ाया जाएगा। काल्पनिक किस्से-कहानियों, अफवाहों और किंवदंतियों के आधार पर लिखी गई किताबों को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
वहीं, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता जोरवार सिंह जमवाल ने कहा कि प्रतिबंधित पुस्तकों में गलत बाते थीं। इतिहास न तो तथ्यपरक था और न ही विश्वसनीय। इतिहास के नाम पर मनगढ़ंत सामग्री नहीं पढ़ाई जा सकती। शिक्षण संस्थानों में केवल वही पुस्तकें रहनी चाहिए जो ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक हों। सरकार का फैसला उचित है। युवा पीढ़ी को गुमराह करने की साजिश किसी भी स्तर से सफल नहीं होने दिया जाएगा।
21.81 लाख किताबों की स्क्रीनिंग के बाद कार्रवाई
यह विवाद लंगेट से अवामी इत्तेहाद पार्टी के विधायक खुर्शीद अहमद शेख के विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब के बाद सामने आया। सरकार के लिखित जवाब के अनुसार उच्च शिक्षा विभाग ने कॉलेजों और पुस्तकालयों में मौजूद 21,81,582 किताबों और प्रकाशकों की स्क्रीनिंग की।
कार्रवाई एक नजर में
- कुल स्क्रीनिंग: 21,81,582
- हटाई गईं किताबें: 4,767
- पूरी तरह प्रतिबंधित: 518
- कश्मीर से हटाई गईं: 4,474
- जम्मू से हटाई गईं: 293
- विशेषज्ञ समिति को भेजी गईं: 1,752
- 1,752 किताबों पर फैसला बाकी
जुलाई में दो किताबों के विवाद के बाद शुरू हुई स्क्रीनिंग
सरकार के मुताबिक जुलाई में दो ऐसी पुस्तकों की खरीद को लेकर विवाद हुआ था, जिनमें अत्यधिक आपत्तिजनक सामग्री होने की बात सामने आई। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने सभी पुस्तकालयों की स्क्रीनिंग के आदेश दिए। सरकार का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता और अखंडता के सम्मान वाला वातावरण सुनिश्चित करना जरूरी है।


