अमेरिका और ईरान के बीच पिछले छह महीनों से जंग चल रही है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन ने यूएन महासभा की बैठक के लिए ईरानी नेताओं को वीजा दे दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि संयुक्त राष्ट्र के मेजबान देश के तौर पर अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्होंने ईरान के ‘कोर डेलिगेशन’ को न्यूयॉर्क आने की मंजूरी दी है। इस प्रतिनिधिमंडल में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हैं। हालांकि, अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरानी नेताओं का यह दौरा पूरी तरह से पाबंदियों के साये में रहेगा।

अमेरिका की इस मजबूरी के पीछे की वजह क्या?
दरअसल, 1947 के ‘यूएन हेडक्वार्टर एग्रीमेंट’ के तहत अमेरिका की यह कानूनी मजबूरी है कि वह संयुक्त राष्ट्र में आने वाले वैश्विक नेताओं को रोक नहीं सकता। हालांकि, दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है और दोनों ओर से किसी समझौते के आसार नहीं दिख रहे हैं। एक तरफ जहां स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने और परमाणु वार्ता पर कोई सहमति नहीं बनी है, वहीं दूसरी तरफ यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में हमले तेज कर दिए हैं। इस वजह से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके साथ ही अमेरिका ने ईरान की वित्तीय रीढ़ तोड़ने के लिए कई नए कड़े प्रतिबंध भी लागू कर दिए हैं।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल पर अमेरिका ने कौन-कौन सी पाबंदियां लगाई हैं?
भले ही अमेरिका ने ईरानी नेताओं को आने की अनुमति दी है, लेकिन उनके रुकने और घूमने पर सख्त नियम लागू रहेंगे।
- सीमित दायरा: ईरानी अधिकारियों को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय और अपने मिशन के आसपास एक तय सीमा के भीतर ही रहने की इजाजत होगी।
- शॉपिंग पर पूरी तरह बैन: अमेरिकी नीति के तहत ईरानी प्रतिनिधिमंडल को अमेरिका के थोक बाजारों जैसे कॉस्टको या सैम क्लब से सामान खरीदने या कोई भी लग्जरी शॉपिंग करने की सख्त मनाही रहेगी।
- छोटा डेलिगेशन: अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस बार ईरानी प्रतिनिधिमंडल का आकार पिछले साल के मुकाबले काफी छोटा रखा है ताकि सुरक्षा और निगरानी में कोई चूक न हो।
- निगरानी और पाबंदी: संयुक्त राष्ट्र की आड़ में कोई गैर-जरूरी गतिविधि न हो, इसके लिए विदेश मंत्रालय की विशेष टीमें इस पूरे प्रतिनिधिमंडल पर चौबीसों घंटे निगरानी रखेंगी।
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फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास का वीजा क्यों खारिज किया गया?
अमेरिका का यह दोहरा रवैया तब और चर्चा में आ गया जब उसने एक दिन पहले ही फिलिस्तीनी प्राधिकरण के राष्ट्रपति महमूद अब्बास का वीजा खारिज कर दिया। अमेरिका ने आरोप लगाया कि फलस्तीनी प्रशासन गाजा युद्ध को अंतरराष्ट्रीय अदालतों आईसीजे और आईसीसी में ले जाकर मामले को उलझा रहा है और इस्राइली जेलों में बंद कैदियों के परिवारों को भत्ता दे रहा है। दूसरी ओर, फिलिस्तीन ने इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि शांति प्रक्रिया से जुड़े नेताओं पर ऐसी दंडात्मक पाबंदियां लगाना हिंसा को बढ़ावा देने और दो-राष्ट्र समाधान को कमजोर करने जैसा है।

