ग्लोबल ऑयल मार्केट में भारत का रुतबा बढ़ता जा रहा है. ऐसा हमनहीं कह रहे हैं, बल्कि एनर्जी इंटेलिजेंस फर्म Vortexa के ताजा आंकड़ों (सितंबर 2026) के मुताबिक, अगस्त में यूरोप के लिए बाब-एल-मंडेब से होकर जाने वाले कुल डीजल में से लगभग 60% की सप्लाई अकेले भारत ने की है.
अगस्त 2026 में बाब-अल-मंडेब (Bab-el-Mandeb) समुद्री मार्ग से रोजाना लगभग 2,00,000 बैरल डीजल (गैसऑयल) गुजरा, जबकि मार्च और अप्रैल में इस अहम शिपिंग रूट से होने वाला ट्रांसपोर्ट लगभग रुक गया था. वोर्टेक्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस दौरान इस समुद्री मार्ग से होकर यूरोप के लिए जितने भी डीजल की सप्लाई हुई, उसमें भारत की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही.
भारत ने कैसे हासिल किया ये मुकाम?
भारत इस मुकाम को हासिल करने में इसलिए कामयाब रहा क्योंकि एक तो रूस से होने वाले एक्सपोर्ट पर भारी रोक लगी हुई है और अमेरिका से होने वाली शिपमेंट भी कम हो रही है. यूक्रेन द्वारा रूसी तेल ठिकानों और रिफाइनरियों पर किए गए ड्रोन हमलों के बाद रूस में घरेलू ईंधन की कमी हो गई है. इसके चलते रूस ने अपने डीजल और गैसोलीन निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं.
अमेरिका से यूरोप को होने वाली डीजल की सप्लाई में भी भारी कमी आई है क्योंकि यहां की रिफाइनरियां पहले से ही रिकॉर्ड क्षमता पर काम कर रही हैं. बावजूद इसके अपने घरेलू स्टॉक को सुरक्षित रखने के साथ-साथ आगामी सर्दियों में यूरोप की बढ़ती मांग को एक साथ पूरा करने में पूरी तरह असमर्थ दिख रही हैं. इस स्थिति में भारत बाजी मार ले गया.
भारत को कितना होगा फायदा?
यूरोप में डीजल की भारी किल्लत के कारण रिफाइनिंग मार्जिन (GRMs) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं. इसका सीधा वित्तीय लाभ रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी निर्यातक कंपनियों को मिल रहा है, जिससे भारतीय शेयर बाजार में एनर्जी सेक्टर को मजबूती मिली है. जाहिर सी बात है कि जब बड़े पैमाने पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट किए जाएंगे, तो इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा और साथ ही व्यापार घाटा (Trade Deficit) को भी संतुलित करने में मदद मिलेगी.

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