मेघना गुलजार की आने वाली फिल्म ‘दायरा’ का ट्रेलर रिलीज होते ही चर्चा में आ गया है. फिल्म का ट्रेलर सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं दिखाता, बल्कि किशोर अपराध, कानून और न्याय व्यवस्था को लेकर कई ऐसे सवाल खड़े करता है, जिनका जवाब आसान नहीं है. कहानी एक रेप केस के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक मां अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई लड़ती दिखाई देती है. वहीं पुलिस अधिकारियों के न्याय को लेकर अलग-अलग नजरिए कहानी को और गंभीर बना देते हैं.
ज्यूडिशियल सिस्टम के सवाल पर नहीं दिया जवाब
ट्रेलर में एक जगह सवाल उठाया जाता है कि अगर कोई Juvenile रेप और मर्डर जैसा गंभीर अपराध कर सकता है, तो फिर उसे कानून के तहत विशेष संरक्षण क्यों मिलना चाहिए? यही सवाल फिल्म के ट्रेलर को लेकर दर्शकों के बीच बहस का कारण भी बन गया है.
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ट्रेलर लॉन्च के दौरान इसी मुद्दे को लेकर ABP की रिपोर्टर निरमा पुरोहित ने फिल्म मेकर्स से सवाल किया. रिपोर्टर ने 16 साल की लड़की से जुड़े कथित गैंगरेप जैसे मामलों और निर्भया केस का संदर्भ देते हुए पूछा कि क्या रेप जैसे जघन्य अपराध करने वाले Juvenile को सजा देते समय एडल्ट की तरह देखा जाना चाहिए? साथ ही यह भी सवाल किया गया कि अगर Judicial System में कोई लूपहोल है, तो क्या उसमें बदलाव की जरूरत है?

हालांकि, रिपोर्टर अपना सवाल पूरी तरह खत्म कर पातीं, उससे पहले ही मेघना गुलजार ने बीच में हस्तक्षेप किया. उन्होंने कहा कि यह एक ‘Philosophical और Judicial सवाल’ है और ऐसे सवालों पर हर व्यक्ति का अपना नजरिया हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि इस मंच पर बातचीत को फिल्म तक सीमित रखना बेहतर होगा.

ज्यूडिशियल सिस्टम पर सवाल खड़ा करती है ‘दायरा’?
वहीं, फिर यहीं से एक दूसरा सवाल भी खड़ा हो जाता है. जब फिल्म का ट्रेलर खुद Juvenile Protection Law और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है, तो उससे जुड़े सवाल फिल्म से बाहर कैसे हो सकते हैं? ट्रेलर में जिस मुद्दे को कहानी का अहम हिस्सा बनाया गया है, उसी मुद्दे पर फिल्म की निर्माता-निर्देशक से सवाल होना स्वाभाविक भी है. जब फिल्म का एक किरदार पूछता है कि ‘Juvenile जो rape और murder कर सकता है, उसकी protection?’, तो दर्शकों के मन में भी यही सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर गंभीर अपराध और किशोर कानून के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
यह सवाल सिर्फ किसी एक फिल्म या घटना तक सीमित नहीं है. किशोर अपराध को लेकर कानून का उद्देश्य सुधार और संरक्षण है, लेकिन जब कोई नाबालिग बेहद गंभीर अपराध में शामिल होता है, तब न्याय, पीड़ित के अधिकार और अपराधी की उम्र के बीच संतुलन का सवाल बेहद पेचीदा हो जाता है.
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फिल्में अक्सर समाज के उन सवालों को सामने लाती हैं, जिन पर आम बातचीत में चर्चा करना मुश्किल होता है. ऐसे में किसी संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन दर्शकों की उत्सुकता यह जानने की भी होती है कि फिल्म बनाने वाले खुद उस मुद्दे को किस नजर से देखते हैं. यही वजह है कि ट्रेलर लॉन्च पर पूछा गया यह सवाल भी पूछा गया. लेकिन गजब की बात है कि मेकर्स की तरफ से जवाब बहुत ही निराशाजनक और बेहद असंवेदनशील साबित हुआ.

दमदार नजर आता है ‘दायरा’ का ट्रेलर
इन तमाम सवालों के बीच ‘दायरा’ का ट्रेलर कहानी के स्तर पर काफी प्रभावशाली नजर आता है. एक मां की बेबसी, बेटी के लिए न्याय पाने की उसकी जिद, पुलिस अधिकारियों की अलग-अलग सोच और न्याय व्यवस्था को लेकर उठते सवाल ट्रेलर को गंभीर और भावनात्मक बनाते हैं. ट्रेलर की सिनेमैटोग्राफी भी कहानी के तनाव और गंभीरता को मजबूत करती है. कई दृश्य ऐसे हैं, जो दर्शकों को कहानी के भीतर खींच ले जाते हैं. फिल्म सिर्फ अपराध की घटना दिखाने के बजाय उसके बाद पैदा होने वाले सवालों और व्यवस्था से जुड़े पहलुओं को भी सामने लाने की कोशिश करती नजर आती है.
अब असली सवाल यही है कि ‘दायरा’ सिर्फ सवाल उठाकर रुक जाएगी या उन सवालों के जवाब तलाशने की भी कोशिश करेगी? मेघना गुलजार की यह फिल्म न्याय, कानून और इंसानियत के बीच खिंची उस महीन रेखा को कितना मजबूती से पर्दे पर उतार पाती है, इसका जवाब फिल्म की रिलीज के बाद ही मिलेगा.
Input By : निरमा पुरोहित
