मोदी सरकार मध्य सितंबर के बाद परिसीमन व महिला आरक्षण के लिए दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। सरकार की योजना विशेष सत्र से पहले कैबिनेट विस्तार के जरिये एनडीए में शामिल होने के इच्छुक दलों को साधने की है। विशेष सत्र और कैबिनेट विस्तार पर अंतिम विमर्श का दौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मध्य एशिया के दौरे से लौटने के बाद शुरू होगा। विशेष सत्र का विकल्प खुला रखने के लिए मानसून सत्र के 15 दिन बीत जाने के बावजूद सत्रावसान नहीं हुआ है।

सरकार के सूत्र के मुताबिक, विशेष सत्र और कैबिनेट विस्तार में दो बड़े पेच हैं। सरकार चाहती है कि विस्तार से पहले एनसीपी के दोनों धड़ों का विलय हो जाए और डीएमके सरकार का हिस्सा बने। दोनों ही मामलों में बातचीत अपने अंतिम दौर में है। परिसीमन के संदर्भ में सरकार ने डीएमके को पहले ही राज्यों की सीटों की संख्या में आनुपातिक आधार पर 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी को विधेयक के मसौदे में लिखित रूप में शामिल करने का आश्वासन दिया है। एनसीपी के दोनों धड़ों में विलय को लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लगातार बातचीत कर रहे हैं। इन दोनों ही मामलों में हुई प्रगति की जानकारी पीएम मोदी को विदेश दौरे से लौटने के बाद दी जाएगी।
डीएमके की हां पर निर्भर होगा विशेष सत्र
परिसीमन के सवाल पर सरकार एनसीपी-एसपी के समर्थन को लेकर आश्वस्त है। मामला डीएमके को लेकर फंसा हुआ है। तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना-यूबीटी, आम आदमी पार्टी में बड़ी टूट और शरद पवार, अकाली दल के समर्थन के संकेत के बाद भी विशेष सत्र का रुख डीएमके ही तय करेगी, जिसके पास लोकसभा में 22 तो राज्यसभा में 8 सांसद हैं। इनके बिना सरकार विधेयक को पारित कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी। सूत्र के मुताबिक, डीएमके से परिसीमन ही नहीं बल्कि राजग में शामिल होने, कैबिनेट में प्रतिनिधित्व देने जैसे मामले पर भी बात हो रही है। डीएमके की सहमति मिलते ही विशेष सत्र के साथ कैबिनेट विस्तार की रूपरेखा भी तैयार कर ली जाएगी।
ये भी पढ़ें: इसरो का सैटेलाइट अध्ययन: हिमालय में 676 ग्लेशियर झीलें बढ़ीं 130 भारत में, खतरा यहां भी कम नहीं
कानून बनाए जाने के तीन साल बाद मध्यस्थता परिषद का गठन
कानून बनाए जाने के करीब तीन साल बाद एक संसदीय समिति के सुझाव पर केंद्र सरकार ने देश में मध्यस्थता की कार्यवाही को नियंत्रित करने के लिए मध्यस्थता परिषद का गठन किया है। केंद्रीय कानून मंत्रालय से बृहस्पतिवार रात जारी अधिसूचना में 2023 के मध्यस्थता अधिनियम के तहत मध्यस्थता परिषद बनाए जाने की घोषणा की गई। कानून एवं कार्मिक मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति की रिपोर्ट इस महीने की शुरुआत में संसद में पेश की गई थी। परिषद का काम संस्थागत विवाद के समाधान को नियंत्रित करना होगा। इसके अलावा, परिषद को मध्यस्थता सेवाएं देने वाली संस्थाओं और मध्यस्थता का प्रशिक्षण एवं प्रमाणन देने वाले संस्थानों को मान्यता देने की जिम्मेदारी भी दी गई है। पिछले साल अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भारतीय मध्यस्थता परिषद (एमसीआई) के गठन में देरी के लिए मानव संसाधनों की कमी और वैधानिक संस्थाओं के लिए योग्य उम्मीदवार तलाशने में आने वाली कठिनाइयों को जिम्मेदार बताया था।
2023 में जारी हुई थी अधिसूचना…
समिति ने भारत की मध्यस्थता व्यवस्था पर अपनी रिपोर्ट में कानून मंत्रालय के उस स्पष्टीकरण का जिक्र किया था, जिसमें कहा गया था कि एमसीआई का गठन मध्यस्थता अधिनियम को पूरी तरह लागू करने के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्व शर्त है। इसके साथ विस्तृत नियम और विनियम बनाना भी जरूरी है। एमसीआई के गठन और कामकाज से संबंधित शुरुआती प्रावधानों की अधिसूचना नौ अक्तूबर 2023 को जारी की गई थी। इसके बाद परिषद की संरचना और सदस्यों की सेवा शर्तों से जुड़े नियम भी लागू किए गए।

