स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसके बाद से इस शब्द ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष इसे लेकर अपने-अपने दावे कर रहे हैं। दोनों ओर से इस शब्द के जरिए सियासी समीकरण साधे जा रहे हैं। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, राकेश शुक्ल, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
पीयूष पंत: प्रधानमंत्री का ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पुरानी बात को नए पैकेट में पेश करने जैसा है। जब भी सरकार की आलोचना होती है, उसे अति-वामपंथ के व्याकरण में रखकर निशाना बनाया जाता है। पहले इसे ‘अर्बन नक्सल’ कहते थे और अब ‘दिमागी नक्सल’ का रूप दे दिया गया है। जो लोग रिएक्ट करते हैं, जो क्रिटिकल एप्रेजल करते हैं, जो आपकी बातों को आलोचनात्मक रूप से एनलाइज करते हैं उसके खिलाफ दुनियाभर की दक्षिणपंथ की विचारधारा हमेशा से रही है। ये एक तरह से क्रिटिकल थॉट को टारगेट करने की कोशिश है।