पाकिस्तान की सरकार ने मोहम्मद अली जिन्ना की बीमारी दुनिया से छुपाने और उनका इलाज करने वाले दो भारतीय डॉक्टर्स को मरणोपरांत निशान-ए-कायद-ए-आजम पुरस्कार देने की घोषणा की है. 14 अगस्त को पाकिस्तान की सरकार की तरफ से जारी नोटिफिकेशन में कुल 372 लोगों को सिविल अवार्ड देने की घोषणा की गई थी, जिसमें दो भारतीय डॉक्टर्स का भी मरणोपरांत नाम है.
14 अगस्त को पाकिस्तान की सरकार की तरफ़ से जारी नोटिफिकेशन में कुल 372 लोगों को सिविल अवार्ड देने की घोषणा की गई थी जिसमें दो भारतीय डॉक्टर्स का नाम भी मरणोपरांत नाम है. साल 1957 में शुरू हुआ निशान-ए-कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना की याद में समाज सेवा के क्षेत्र में दिया जाने वाला पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान है और इससे पहले 4 अन्य लोगो को ये अवार्ड दिया जा चुका है.
इतिहासकार अकबर अहमद की किताब और प्रसिद्ध पुस्तक ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के अनुसार, जिन्ना 1930 के दशक से ही टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. उस समय यह बीमारी बेहद खतरनाक थी और इसका कोई प्रभावी एंटीबायोटिक इलाज उपलब्ध नहीं था. साल 1946 में जब इन दोनों पारसी डॉक्टर्स ने जिन्ना के फेफड़ों का एक्स-रे देखा, तो उन्हें समझ आ गया था कि जिन्ना एक-दो साल ही जीवित रह सकते हैं. इन दोनों डॉक्टर्स ने यह बात जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी या अंग्रेजों को नहीं बताई थी.

अहमद ने अपनी किताब में लिखा, ‘साल 1938 से ही वे लगातार मानसिक तनाव और शारीरिक कमजोरी से परेशान थे. इसके बाद वे अक्सर बीमार रहने लगे, लेकिन उनकी इस बीमारी को पूरी तरह से सीक्रेट रखा गया था.’ जिन्ना की बीमारी का पता केवल उनके कुछ बेहद करीबी लोगों को ही था, जिनमें उनकी बहन फातिमा जिन्ना भी शामिल थीं. ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि डर था कि अगर यह खबर बाहर आई, तो उनकी राजनीतिक साख को नुकसान पहुंच सकता है.
अगर उस वक्त लॉर्ड माउंटबेटन को जिन्ना की गिरती सेहत का पता चल जाता तो वे आजादी के फैसले को कुछ महीनों के लिए टाल देते. माउंटबेटन ने बाद में खुद माना था कि यदि उन्हें जिन्ना की बीमारी की खबर होती, तो विभाजन टल जाता और पाकिस्तान कभी नहीं बन पाता. आजादी के महज एक साल बाद, 11 सितंबर 1948 को जिन्ना का निधन हो गया था.

