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Xप्लेन: TATA ग्रुप का असल मालिक कौन, 25.29 लाख करोड़ का साम्राज्य चलता कैसे है?

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टाटा ग्रुप को लेकर अक्सर एक सवाल उठता है कि आखिर इस विशाल साम्राज्य का मालिक कौन है और इसे चलाता कौन है. 1868 में जमशेदजी टाटा ने एक छोटी ट्रेडिंग कंपनी से जो शुरुआत की थी, वह आज नमक से लेकर सेमीकंडक्टर तक, स्टील से लेकर एयरलाइंस तक, चाय से लेकर कारों तक फैला हुआ है. इस समूह की सबसे अनोखी बात इसका मालिकाना ढांचा है. यहां कोई एक परिवार या कोई एक व्यक्ति सबकुछ नहीं चलाता, बल्कि एक ऐसी संरचना है जिसमें परोपकारी ट्रस्ट मालिक हैं और प्रोफेशनल लोग इसे चलाते हैं. आइए एक्सप्लेनर में समझते हैं कि टाटा साम्राज्य का मालिक कौन है और यह चलता कैसे है…

टाटा ग्रुप का असली मालिक कौन है?

अगर आप सोचते हैं कि टाटा ग्रुप का मालिक कोई एक टाटा परिवार का सदस्य है, तो यह पूरी तरह गलत है. टाटा ग्रुप की मालिकाना हक की कहानी बिल्कुल अलग है. इस पूरे ग्रुप की जड़ में एक कंपनी है- टाटा संस. यह ग्रुप की प्रमुख होल्डिंग कंपनी और प्रमोटर है. यानी टाटा संस ही वह केंद्र है जो पूरे समूह को कंट्रोल करता है. अब सवाल यह है कि टाटा संस का मालिक कौन है?

इसका सीधा जवाब है- टाटा ट्रस्ट्स. ये परोपकारी ट्रस्ट मिलकर टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं. यानी तकरीबन दो-तिहाई मालिकाना हक इन्हीं ट्रस्ट्स के पास है.

सबसे बड़े ट्रस्ट कौन से हैं?

दो ट्रस्ट इस पूरे ढांचे पर सबसे ज्यादा हावी हैं:

  1. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट: इसके पास 27.98 फीसदी हिस्सेदारी है.
  2. सर रतन टाटा ट्रस्ट: इसके पास 23.56 फीसदी हिस्सेदारी है.

इन दोनों ट्रस्ट्स को मिला दें तो 51.54 फीसदी हिस्सेदारी बनती है, यानी टाटा संस में साफ बहुमत इन्हीं के पास है. बाकी बची हुई ट्रस्ट हिस्सेदारी कई छोटे ट्रस्टों में बंटी हुई है, जैसे- JRD टाटा ट्रस्ट (4.01%), टाटा एजुकेशन ट्रस्ट (3.73%), टाटा सोशल वेलफेयर ट्रस्ट (3.73%), RD टाटा ट्रस्ट (2.19%) और सर्वजनिक सेवा ट्रस्ट (0.10%).

बाकी हिस्सेदारी किसके पास है?

ट्रस्ट्स के अलावा टाटा संस में शापूरजी पालोनजी ग्रुप की 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है. यह मिस्त्री परिवार का कारोबार है, जिसने 1965 से 1995 के बीच यह हिस्सेदारी खरीदी थी. इसके अलावा थोड़ी-बहुत हिस्सेदारी कुछ अन्य संस्थाओं के पास है.

तो क्या नोएल टाटा मालिक हैं?

नहीं. नोएल टाटा आज टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन जरूर हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत रूप से टाटा संस के शेयरों के मालिक नहीं हैं. ये शेयर ट्रस्ट की संपत्ति हैं, जिन पर फैसले ट्रस्ट के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ करते हैं. नोएल टाटा एक ट्रस्टी यानी सदस्य हैं, मालिक नहीं. यही इस पूरे समूह की सबसे बड़ी खासियत है कि मालिकी ट्रस्ट के पास है, चलाने की जिम्मेदारी प्रोफेशनल्स के पास.

तो आखिर टाटा साम्राज्य को चलाता कौन है?

अब सबसे अहम सवाल यह है कि अगर मालिक ट्रस्ट हैं, तो इस विशाल ग्रुप का संचालन कौन करता है. इसका जवाब प्याज की तरह है, यानी परतें दर परतें खुलती जाती हैं:

1. टाटा संस का बोर्ड और चेयरमैन

टाटा संस का बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स पूरे ग्रुप की रणनीति और दिशा तय करता है. इस बोर्ड का नेतृत्व चेयरमैन करता है, जो पूरे टाटा ग्रुप का सबसे शक्तिशाली पद होता है.

वर्तमान स्थिति (अगस्त 2026):

वर्तमान चेयरमैन: एन. चंद्रशेखरन.

  • चंद्रशेखरन ने फरवरी 2017 में यह पद संभाला था. वे टाटा परिवार की सीधी विरासत से बाहर के पहले प्रोफेशनल चेयरमैन थे.
  • चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म हो रहा है.
  • 12 अगस्त 2026 को उन्होंने तीसरी बार दोबारा चुने जाने से इनकार कर दिया. इसकी बड़ी वजह यह रही कि बोर्ड में उनकी पुनर्नियुक्ति को लेकर आम सहमति नहीं बन पाई. एक बोर्ड सदस्य ने उनके विस्तार का विरोध किया था.
  • इस फैसले के बाद टाटा ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई और करीब 45,000 हजार करोड़ का मार्केट कैपिटलाइजेशन डूब गया.

टाटा संस बोर्ड में और कौन हैं?

फिलहाल टाटा संस के बोर्ड में छह सदस्य हैं:

  1. नोएल एन. टाटा (टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन)
  2. वेनु श्रीनिवासन (टाटा वेटरन और ट्रस्ट्स के वाइस-चेयरमैन)
  3. सौरभ अग्रवाल (ग्रुप CFO)
  4. हरीश मानवानी (इंडिपेंडेंट डायरेक्टर)
  5. अनीता मारंगोली जॉर्ज (इंडिपेंडेंट डायरेक्ट)
  6. एन. चंद्रशेखरन (चेयरमैन, TCS)

2. टाटा ट्रस्ट्स ही कंट्रोल की असली ताकत

टाटा ट्रस्ट्स, जिनके पास 66 फीसदी मालिकाना हक है, उनका बोर्ड पर निर्णायक प्रभाव रहता है. ट्रस्ट का चेयरमैन, जो इस समय नोएल टाटा हैं, टाटा संस के बोर्ड में बैठता है और बड़े फैसलों में अहम भूमिका निभाते हैं, खासकर चेयरमैन की नियुक्ति में.

3. हर कंपनी का अपना बोर्ड

टाटा ग्रुप की हर कंपनी जैसे TCS, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के तहत स्वतंत्र रूप से काम करती है. टाटा संस उनकी प्रमोटर है, लेकिन हर कंपनी का अपना CEO, अपनी टीम और अपना बोर्ड होता है जो रोजमर्रा का कामकाज देखता है.

Xप्लेन: TATA ग्रुप का असल मालिक कौन, 25.29 लाख करोड़ का साम्राज्य चलता कैसे है?

ट्रस्ट्स के भीतर की राजनीति और गुटबाजी

रतन टाटा के 2024 में निधन के बाद, ट्रस्ट्स के भीतर दो गुट बन गए हैं:

  • पहला गुट: नोएल टाटा के साथ
  • दूसरा गुट: मेहली मिस्त्री के नेतृत्व में, जिसमें प्रमित झावेरी, जहांगीर एच.सी. जहांगीर और डेरियस खंबाटा शामिल हैं. मेहली मिस्त्री, जो रतन टाटा के करीबी सहयोगी थे, SP Group से भी जुड़े हैं, जिससे यह विवाद और गहरा हो गया.

ट्रस्ट्स के ट्रस्टी (सदस्य) कौन हैं?

सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के ट्रस्टी हैं:

  • नोएल टाटा (लाइफ ट्रस्टी)
  • जिमी एन. टाटा (लाइफ ट्रस्टी)
  • जहांगीर एच.सी. जहांगीर (लाइफ ट्रस्टी)
  • वेनु श्रीनिवासन
  • डेरियस खंबाटा
  • विजय सिंह (हाल ही में 14 अगस्त 2026 को उनका कार्यकाल पूरा होने पर वे चले गए)

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के ट्रस्टी हैं:

  • नोएल टाटा
  • नेविल टाटा (नोएल के बेटे, नवंबर 2025 में नियुक्त)
  • भास्कर भट्ट (पूर्व टाइटन प्रमुख)
  • वेनु श्रीनिवासन (उपाध्यक्ष)
  • विजय सिंह (SDTT ट्रस्टी के रूप में बने हुए हैं)

विजय सिंह, जो रतन टाटा के करीबी सहयोगी थे, 2025 में टाटा संस बोर्ड से भी हट गए. अजय पीरामल और राल्फ स्पेथ जैसे स्वतंत्र निदेशक भी बोर्ड से रिटायर हो चुके हैं.

चंद्रशेखरन के जाने के बाद क्या होगा?

चंद्रशेखरन फरवरी 2027 तक अपने पद पर बने रहेंगे. चंद्रशेखरन ने बोर्ड से जल्द से जल्द नए चेयरमैन की तलाश शुरू करने को कहा है. संभावित उत्तराधिकारियों में टी.वी. नरेंद्रन (टाटा स्टील के MD और CEO) का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है. टाटा ट्रस्ट्स के भीतर पहले से दो गुट बन चुके हैं. एक नोएल टाटा के साथ और दूसरा मेहली मिस्त्री के साथ. इस गुटबाजी के चलते ट्रस्ट्स पर नियामकीय जांच भी शुरू हो गई है.

तो क्या यह ढांचा सही है?

टाटा ग्रुप का यह ढांचा दुनिया में अपनी तरह का अनोखा है. एक तरफ ट्रस्ट्स है, जो समाज कल्याण के लिए काम करते हैं, इसके मालिक हैं, तो दूसरी तरफ प्रोफेशनल इसे चलाते हैं. इसका बड़ा फायदा यह है कि मुनाफा किसी एक परिवार की जेब में नहीं जाता, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और कला जैसे सामाजिक कामों में लगता है.

हालांकि, ट्रस्ट्स यानी मालिक और बोर्ड यानी चलाने वाले के बीच मतभेद हो, तो बड़े फैसले लटक जाते हैं. चंद्रशेखरन का जाना इसी टकराव की एक बड़ी मिसाल है. अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि अगला चेयरमैन कौन होगा और क्या वह ट्रस्ट और बोर्ड के बीच की खाई को पाट पाएगा.

एक लाइन में कहें तो टाटा ग्रुप के मालिक ट्रस्ट हैं, चलाने वाला प्रोफेशनल बोर्ड है और फिलहाल नोएल टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से सबसे ताकतवर चेहरा हैं, जबकि चंद्रशेखरन का जाना एक नए दौर की शुरुआत है.

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