'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- दुर्वह, जिसका अर्थ है- जिसे वहन करना कठिन हो। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- साँस का पुतला
वासना को बाँधने को
तूमड़ी जो स्वर-तार बिछाती है-
आह! उसी में कैसी एकांत निविड़
वासना थरथराती है !
तभी तो साँप की कुण्डली हिलती नहीं-
फन डोलता है ।
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‘We are VIPs’| India Newsकभी रात मुझे घेरती है,
कभी मैं दिन को टेरता हूँ,
कभी एक प्रभा मुझे हेरती है,
कभी मैं प्रकाश-कण बिखेरता हूँ।
कैसे पहचानूँ कब प्राण-स्वर मुखर है,
कब मन बोलता है ?
साँस का पुतला हूँ मैं:
जरा से बँधा हूँ और
मरण को दे दिया गया हूँ:
पर एक जो प्यार है न, उसी के द्वारा
जीवनमुक्त मैं किया गया हूँ ।
काल की दुर्वह गदा को एक
कौतुक-भरा बाल क्षण तोलता है !
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24 minutes ago

