राज्यसभा में लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर पूरे दिन चली चर्चा के बाद उस समय राजनीतिक टकराव बढ़ गया, जब कांग्रेस के नेतृत्व में कई विपक्षी दलों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। यह वॉकआउट उस समय हुआ, जब कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह विधेयक पर सरकार की ओर से जवाब देने के लिए खड़े हुए। विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाए और उनके सदन में आने की मांग की।
पूरे दिन चली बहस के बाद भाजपा सांसद कविता पाटीदार ने अपना भाषण समाप्त किया। इसके बाद सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने जितेंद्र सिंह को चर्चा का जवाब देने के लिए बुलाया। इसी दौरान राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि बहस के दौरान लाठीचार्ज और गोलीबारी जैसे मुद्दे उठाए गए हैं, इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि गृह मंत्री अमित शाह सदन में मौजूद रहेंगे। उन्होंने कहा कि गृह मंत्री नहीं आए हैं, इसलिए पहले उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
विपक्ष ने वॉकआउट क्यों किया?
प्रमोद तिवारी की मांग को सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने स्वीकार नहीं किया और जितेंद्र सिंह से अपना जवाब जारी रखने को कहा। इसके बाद कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों के सांसद सदन से वॉकआउट कर गए। विपक्ष का कहना था कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर गृह मंत्री की मौजूदगी जरूरी थी, जबकि सभापति ने कार्यवाही आगे बढ़ाने का फैसला किया।
जेपी नड्डा ने विपक्ष पर क्या आरोप लगाए?
- विपक्ष के वॉकआउट के बाद सदन के नेता जेपी नड्डा ने इस कदम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि इससे साफ हो गया है कि विपक्ष के पास अब कोई मुद्दा नहीं बचा है। नड्डा ने कहा कि करीब आठ घंटे तक चर्चा चली और हर सदस्य को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब मंत्री जवाब देने के लिए खड़े हुए, तभी प्रमोद तिवारी ने विरोध शुरू कर दिया, जो गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार है।
- जेपी नड्डा ने कहा कि विपक्ष को लोकतंत्र और संसदीय प्रक्रियाओं का सम्मान नहीं है। उनके अनुसार, अगर विपक्ष वास्तव में चर्चा में रुचि रखता तो वह मंत्री का जवाब सुनता। उन्होंने कहा कि मंत्री के जवाब से पहले सदन छोड़ देना यह दिखाता है कि विपक्ष बहस को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं रखता था।
विधेयक से जुड़े प्रवाधानों में क्या आया सामने?
कड़ी सजा और जुर्माना… पेपर लीक या अनुचित साधनों में शामिल किसी भी व्यक्ति के लिए न्यूनतम जेल की सजा को बढ़ाकर तीन से पांच साल और अधिकतम जेल की सजा को पांच साल से बढ़ाकर 10 साल तक करने का प्रावधान है। इसके अलावा जुर्माने को अधिकतम 10 लाख से 50 लाख रुपये करने का भी प्रस्ताव रखा गया है। इसके अलावा संगठित अपराधों के मामले में विधेयक में कम से कम सात साल की जेल (जिसे 10 साल तक बढ़ाया जा सकेगा) और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का भी प्रस्ताव है।
सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों पर नकेल… अगर कोई परीक्षा कराने वाली कंपनी दोषी पाई जाती है, तो उस पर पांच करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और उसे आठ साल तक कोई भी सार्वजनिक परीक्षा आयोजित करने से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा।
दोषी फर्म के वरिष्ठ प्रबंधन को भी कम से कम पांच से 10 साल तक की जेल और पांच करोड़ रुपये के जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। वहीं, धांधली में शामिल दोषी संस्थानों और माफियाओं की संपत्तियों को कुर्क और जब्त भी किया जा सकेगा।
फास्ट-ट्रैक अदालतें और तत्काल न्याय… सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का अधिकार दिया जाएगा। इन अदालतों में दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई होगी।
पेपर लीक मामलों की जांच भी दो महीने के अंदर पूरी किया जाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के अंदर ट्रायल पूरा किया जाने का नियम भी रखा गया है।
स्पेशल टास्क फोर्स के गठन का प्रावधान… यह संशोधन विधेयक केंद्र सरकार को किसी भी अपराध की जांच के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स गठित करने का अधिकार भी देता है।
छात्रों को कार्रवाई से छूट… इस विधेयक में पढ़ाई करने वाले आम और नियमित छात्रों के हितों की पूरी सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को इन गंभीर आपराधिक और दंडात्मक धाराओं से बाहर रखा गया है। इससे निष्पक्ष परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों पर बेवजह कोई कानूनी दबाव नहीं पड़ेगा।


