
7 महीने पहले नेपाल की सियासत में एक नया चेहरा आया था बालेन शाह. रैपर से नेता बने इस 35 साल के युवा ने मार्च 2026 में देश के प्रधानमंत्री का पद संभाला था. बालेन की राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (RSP) ने संसद में लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था. युवाओं ने उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ उम्मीद की किरण के रूप में देखा था. लेकिन 12-13 जुलाई 2026 को वही युवा सड़कों पर उतर आए. काठमांडू में सैकड़ों लोगों ने सिंहदरबार सचिवालय के बाहर प्रदर्शन किया. उनके हाथों में तख्तियां थीं और जुबान पर बालेन शाह के इस्तीफे की मांग. आखिर ऐसा क्या हुआ कि हीरो बालेन शाह निशाने पर आ गए…
बालेन शाह की मुश्किलें 4 वजहों से बढ़ीं हैं…
1. बागमती नदी के किनारे झुग्गियों का बुलडोजर
बालेन शाह पर सबसे बड़ा आरोप झुग्गी बस्तियों को बुलडोजर से ढहाने का है. यह उनका पुराना एजेंडा रहा है, जब वे काठमांडू के मेयर थे, तब भी वे ऐसा करना चाहते थे.
नेपाली कानून के मुताबिक, भूमिहीन झुग्गीवासी वह व्यक्ति है, जिसके पास देश में कहीं भी कोई जमीन नहीं है. 2022 में नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, काठमांडू घाटी के तीन जिलों में नदियों के किनारे करीब 3,466 परिवार रहते थे.
बालेन सरकार ने इन झुग्गियों को हटाने के लिए पुलिस और सेना तैनात कर दी. कई लोगों ने खुद ही अपने घर छोड़ दिए, लेकिन बड़ी संख्या में लोग बेघर हो गए. इनमें बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल थे.
नेपाली कानून में पुनर्वास का प्रावधान है, लेकिन सरकार ने उन्हें कोई वैकल्पिक आश्रय नहीं दिया. 2,600 परिवारों के घर ढहाए गए, लेकिन सिर्फ 325 परिवारों को ही अस्थायी आश्रय केंद्रों में जगह मिली. 2 जुलाई 2026 को सरकार ने इन केंद्रों को 6 जुलाई तक खाली करने का आदेश दे दिया. 60 परिवारों ने जाने से मना कर दिया, क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी.
28 सिविल सोसाइटी संगठनों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा, ‘हम सरकार की असंवैधानिक कार्रवाइयों से चिंतित हैं. हम सरकार से मांग करते हैं कि वह इन कार्रवाइयों को रोके और लोकतांत्रिक प्रथाओं का पालन करे.’
12 जुलाई 2026 को सैकड़ों भूमिहीन झुग्गीवासियों और कार्यकर्ताओं ने काठमांडू के मैतीघर में प्रदर्शन किया.
2. तीन दिन में तीन लोगों ने किया आत्मदाह
जुलाई 2026 के पहले हफ्ते में नेपाल में तीन युवाओं ने आत्मदाहकी कोशिश की. इनमें से दो की मौत हो गई, जबकि एक गंभीर रूप से झुलसा हुआ अस्पताल में भर्ती है.
सबसे चर्चित मामला 25 साल के राइड-शेयर ऐप ड्राइवर का था, जिसने ट्रैफिक पुलिस के जुर्माने के बाद आत्मदाह कर लिया. वह जुर्माना चुकाने की स्थिति में नहीं था. काठमांडू पोस्ट के संपादक बिश्वास बराल ने कहा, ‘जब एक युवक ने आत्मदाह किया है और सड़कों पर तनाव है, तो चुप रहना सहानुभूति की कमी माना जा सकता है.’
2023 में जब प्रेम आचार्य ने आत्मदाह किया था, तब तत्कालीन मेयर बालेन शाह ने इसे ‘राज्य की चरम विफलता’ बताया था. अब जब वे खुद प्रधानमंत्री हैं, तो इन घटनाओं पर उनकी चुप्पी विपक्ष और प्रदर्शनकारियों के निशाने पर है.
3. बेरोजगारी और युवाओं की उम्मीदों का टूटना
GenZ नेपाल संगठन ने बालेन शाह पर ‘जनविरोधी और निरंकुश’ तरीके से शासन चलाने का आरोप लगाया है. संगठन का कहना है कि बजट और नीतियों में युवाओं के रोजगार और आय बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए.
यही वह युवा हैं, जिन्होंने सितंबर 2025 में नेपाल में राजनीतिक बदलाव लाया था. युवाओं के विरोध की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा को इस्तीफा देना पड़ा था. उसी युवा ऊर्जा के सहारे बालेन शाह सत्ता में आए थे. लेकिन अब वही युवा उनके खिलाफ हैं.
नेपाली कांग्रेस ने सरकार पर ‘युवाओं में उम्मीद और भरोसा जगाने में विफल’ रहने का आरोप लगाया है.
4. बालेन शाह की सत्तावादी प्रवृत्ति
ट्रिब्यून इंडिया के मुताबिक, बालेन शाह में ‘सत्तावाद की प्रवृत्ति’ साफ दिखती है. वे प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हैं, एकांत में फैसले लेते हैं और मंत्रिमंडल को दरकिनार कर देते हैं. बालेन शाह की चुप्पी एक बड़ा मुद्दा बन गई है:
- मीडिया से बात नहीं करते: मेयर रहते हुए भी उन्होंने नेपाली मीडिया से बात नहीं की. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कोई इंटरव्यू नहीं दिया. बालेन के सोशल मीडिया पोस्ट को ‘चाय की पत्तियां पढ़ने’ जैसा बताया जा रहा है.
- संसद से दूरी: पहले संसद सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण के बीच में ही वे बाहर चले गए. बाद के सत्रों में भी उनकी गैर मौजूदगी चिंता का विषय बनी.
- मीडिया पर दबाव: पोस्ट और अन्य मीडिया संगठनों के कार्यालयों के साथ-साथ नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष गगन थापा के आवास के सामने गाड़ियां खड़ी करके एंट्री गेट बंद कर दिए गए. मानो कहा जा रहा हो, ‘अगर मीडिया ट्रैफिक नियमों को सख्त बता रहा है, तो उसे गलत तरीके से पार्क की गई गाड़ियों की शिकायत नहीं करनी चाहिए.’
इस पूरे बवाल पर बालेन शाह का क्या कहना है?
बालेन शाह ने अभी तक कुछ खास बयान नहीं दिया है और न ही विोध पर प्रतिक्रिया दी है. बालेन के समर्थकों का कहना है कि वे दिन में 10:30 से शाम 5:30 तक सचिवालय में काम करते हैं. विरोधियों के लिए उनकी चुप्पी ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है.
बालेन शाह ने 2023 में आत्मदाह को ‘राज्य की विफलता’ कहा था. अब जब उनकी सरकार में ऐसा हो रहा है, तो उनकी चुप्पी सवालों के घेरे में है.
तो फिर बालेन शाह के सामने क्या चुनौती है?
बालेन शाह ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और बदलाव के नारे पर सत्ता हासिल की थी. बालेन ने जो सत्तावादी रवैया अपनाया है, वह उन्हीं युवाओं को खुद के खिलाफ कर रहा है, जिनके सहारे वे सत्ता में आए थे. अब तीन बड़ी चुनौतियां हैं बालेन शाह के सामने:
- झुग्गीवासियों का पुनर्वास: 2,600 परिवार बेघर हैं, लेकिन सिर्फ 325 को ही आश्रय मिला है. कानून के मुताबिक पुनर्वास देना सरकार की जिम्मेदारी है.
- बेरोजगारी और युवाओं का गुस्सा: तीन दिन में तीन आत्मदाह होने की वजह से युवा संगठनों का आरोप है कि बजट में रोजगार के लिए कोई ठोस कदम नहीं हैं.
- चुप्पी और सत्तावादी छवि: मीडिया से बात न करना, संसद से दूरी और मीडिया कार्यालयों के सामने गाड़ियां खड़ी करना एक ‘निरंकुश’ छवि बना रहा है.
