लोकप्रिय विषय मौसम क्रिकेट ऑपरेशन सिंदूर क्रिकेट स्पोर्ट्स बॉलीवुड जॉब - एजुकेशन बिजनेस लाइफस्टाइल देश विदेश राशिफल आध्यात्मिक अन्य
---Advertisement---

मृत्यु के बाद 13 दिनों तक आत्मा के साथ क्या होता है?

[wplt_featured_caption]

---Advertisement---

Garuda Purana: हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मरने के बाद भी जीवन खत्म नहीं होता है, बल्कि इसके बाद आत्मा का एक नया सफर शुरू होता है. जब बात हमारे ग्रंथों की होती है, तो इनमें गरुड़ पुराण का नाम बहुत ही खास है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इसमें बहुत ही बारीकी से यह बताया गया है कि मौत के बाद आखिर होता क्या है. बहुत से लोग यह सोचते हैं कि जैसे ही किसी की मौत होती, उसकी आत्मा शरीर से निकलकर तुरंत भगवान के पास या फिर स्वर्ग या नर्क में चली जाती है. लेकिन, गरुड़ पुराण के अनुसार ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता है. मौत के बाद के पहले 13 दिन किसी भी आत्मा के लिए बहुत अजीब और जरूरी होते हैं. इन शुरुआती 13 दिनों में आत्मा अपने ही घर में अपने परिवार वालों के बीच रहती है. अगर आपको यह जानने में दिलचस्पी है कि मौत के बाद आत्मा के साथ क्या होता है, तो इस आर्टिकल को जरूर पूरा पढ़िए. इस आर्टिकल में हम आपको आत्मा के इस 13 दिन के सफर को बहुत ही आसान भाषा में समझाने वाले हैं.

what happens to the soul after death
what happens to the soul after death

पहले दिन आत्मा का शरीर से निकलना और यमदूतों का आना

जब किसी भी इंसान की मौत होती है, तो उसके शरीर से आत्मा बाहर निकल जाती है. गरुड़ पुराण के अनुसार, मौत के तुरंत बाद ही यमलोक से दो यमदूत इस आत्मा को लेने के लिए आते हैं. ये दोनों यमदूत आत्मा को अपने साथ लेकर यमलोक चले जाते हैं. आत्मा को वहां ले जाने का मकसद सिर्फ इतना ही होता है कि उसे उसके जीवनभर के अच्छे और बुरे कर्मों का एक छोटा सा हिसाब-किताब दिखाया जा सके. यमराज के दरबार में आत्मा को उसके कर्मों की एक झलक दिखाई जाती है और फिर यमदूत उसे वापस उसी के घर पर छोड़ देते हैं जहां वह रहती थी. इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 24 घंटे यानी एक दिन का समय लग जाता है. इसके बाद आत्मा को अगले 13 दिनों तक अपने परिवार के बीच ही रहना पड़ता है.

दूसरे और तीसरे दिन परिवार का लगाव और छटपटाहट

जब आत्मा यमलोक से वापस अपने घर लौटती है, तो उसे अपने परिवार और अपनी चीजों से बहुत ही ज्यादा लगाव महसूस होने लगता है. वह दूर से अपने मृत पड़े शरीर को देखती है और अपने घरवालों को भी रोते हुए पाती है. इस तरह की चीजों को देखकर आत्मा बहुत ही ज्यादा परेशान हो जाती है. वह अपने घरवालों को चुप कराने की कोशिश करती है, उनसे बात करना चाहती है और उन्हें आवाज भी देती है. लेकिन अब वह पूरी तरह से हवा जैसी एनर्जी बन चुकी होती है, इसलिए कोई भी उसे देख या फिर सुन नहीं सकता है. कई बार आत्मा अपने पुराने शरीर के अंदर घुसने की कोशिश भी करती है, लेकिन नियमों की वजह से वह अपने शरीर में वापस नहीं जा पाती. इस हालत में आत्मा बहुत दुखी और बेचैन हो जाती है.

ये भी पढ़ें: गरुड़ पुराण: किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद क्यों की जाती है 13वीं? जानें यमलोक तक आत्मा की यात्रा का रहस्य 

चौथे से दसवें दिन तक पिंडदान और नए शरीर का मिलना

अब क्योंकि आत्मा के पास कोई हड्डी या मांस का शरीर नहीं होता, इसलिए वह खुद को बहुत कमजोर महसूस करती है. उसे बहुत तेज भूख और प्यास भी लगती है. गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मौत के बाद के पहले 10 दिनों तक परिवार के लोग जो पिंडदान यानी चावल या जौ के आटे से बने गोल लड्डू का दान करते हैं, वह आत्मा के लिए बहुत जरूरी होता है. हर दिन जो पिंडदान किया जाता है, उससे आत्मा की भूख और प्यास शांत होती है. इसी पिंडदान की ताकत से आत्मा को एक नया अदृश्य शरीर मिलता है जिससे वह आगे का सफर तय कर सके. रोज के पिंडदान से इस नए शरीर के अलग-अलग हिस्से बनते हैं, जिससे आत्मा को आगे की यात्रा के लिए ताकत मिलती है.

ग्यारहवें और बारहवें दिन नए शरीर को मिलती है ताकत

ग्यारहवें और बारहवें दिन घर में जो खास पूजा-पाठ और पिंडदान किए जाते हैं, वे आत्मा के नए बने इस अदृश्य शरीर को पूरी तरह से मजबूत और स्थिर बनाते हैं. इन दो दिनों में परिवार के लोग जो प्रार्थना करते हैं, उससे आत्मा को बहुत शांति मिलती है. आत्मा को यह अहसास हो जाता है कि अब उसका इस दुनिया का सफर पूरी तरह से खत्म हो चुका है और उसे आगे बढ़ना ही होगा. इन दिनों की पूजा से आत्मा को वह ताकत मिलती है जिससे वह पृथ्वी लोक को छोड़कर यमलोक के बहुत ही लंबे और कठिन रास्ते पर आसानी से चल सके.

तेरहवीं की रस्म और अंतिम विदाई

तेरहवां दिन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अंतिम और जरूरी दिन होता है, जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में तेरहवीं भी कहते हैं. इस दिन घर पर पंडितों को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है, विशेष पूजा-पाठ होती है, गरीबों और जरूरतमंदों को जरूरी चीजों का दान दिया जाता है. इस दान में मुख्य रूप से अनाज, पानी के बर्तन, छाता, चप्पल, नए कपड़े और बिस्तरों जैसी चीजें शामिल होती हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार, इस दिन जो भी चीजें दान की जाती हैं, उनका फायदा सीधे तौर पर आत्मा को यमलोक के सफर में भोजन, पानी और रास्ते की सुख-सुविधाओं के रूप में प्राप्त होता है. तेरहवीं की यह रस्म पूरी होते ही यमदूत दोबारा आते हैं. इसके बाद आत्मा का इस धरती और अपने परिवार से सारा नाता हमेशा के लिए टूट जाता है और वह यमलोक की अपनी असली और लंबी यात्रा पर निकल पड़ती है, जिसे पूरा करने में उसे लगभग एक साल का समय लग जाता है.

यह भी पढ़ें: Garud Puran : स्त्रियों के लिए गरुड़ पुराण में बताए गए खास कर्म, जानिए फल

Source link

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment