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तुलसी गबार्ड का दावा:डॉक्टर फाउची के पैसों से वुहान में बना था मौत का वायरस, क्या है कोरोना की असली कहानी? – Anthony Fauci Wuhan Lab Funding Covid Origin Tulsi Gabbard Expose

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चीन की वुहान लैब को लेकर एक बहुत बड़ा और सनसनीखेज खुलासा हुआ है। यह वही लैब है जिसके बारे में पूरी दुनिया में कहा जाता है कि इसी ने कोरोना वायरस को पैदा किया था। अब अमेरिकी खुफिया विभाग (ओडीएनआई) की निवर्तमान प्रमुख तुलसी गबार्ड ने दावा किया है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार डॉक्टर एंथनी फाउची ने इस लैब को वित्तीय मदद दी थी।

तुलसी गबार्ड ने पिछले महीने ही डोनाल्ड ट्रंप की इंटेलिजेंस चीफ का पद छोड़ा है। उन्होंने अपने दफ्तर के आखिरी दिन कुछ ऐसे दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं जो आज से पहले कभी नहीं देखे गए थे। इन दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने डॉ. फाउची को सीधे कटघरे में खड़ा किया है।

करोड़ों की अमेरिकी फंडिंग और खतरनाक ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च

तुलसी गबार्ड के कार्यालय की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि 85 वर्षीय डॉ. एंथनी फाउची ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को लाखों डॉलर की फंडिंग दी थी। यह पैसा अमेरिका के आम करदाताओं का था। इस पैसे का इस्तेमाल वुहान की लैब में चमगादड़ों के कोरोना वायरस पर बेहद खतरनाक ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च के लिए किया जा रहा था। इस तरह की रिसर्च में वायरसों को प्रयोगशाला में ज्यादा संक्रामक या जानलेवा बनाया जाता है।

बयान के मुताबिक, डॉ. फाउची ने 38 वर्षों तक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिसीज (एनआईएआईडी) के प्रमुख के रूप में काम किया। उन्होंने दिसंबर 2022 में इस पद को छोड़ा था। उन पर आरोप है कि उन्होंने इस पद पर रहते हुए बड़ी फार्मा कंपनियों से जुड़े ‘जोखिम भरे कोरोना वायरस रिसर्च’ को बढ़ावा दिया ताकि ट्रिलियन डॉलर के ‘यूनिवर्सल वैक्सीन’ बाजार को खड़ा किया जा सके। जब साल 2020 की शुरुआत में कोरोना महामारी ने अमेरिका में दस्तक दी, तो बाइडन सरकार में महामारी से निपटने की पूरी कमान फाउची के ही हाथों में थी।

संसद में झूठ बोलने का खेल

गबार्ड के कार्यालय का आरोप है कि डॉक्टर फाउची ने सरकारी तंत्र में बैठे कुछ राजनीतिकरण का शिकार हो चुके करियर लीडर्स के साथ मिलकर वायरस की लैब-लीक थ्योरी से जुड़े सच को दबाने की कोशिश की। जारी किए गए दस्तावेज दिखाते हैं कि फाउची ने पर्दे के पीछे से रहकर काम किया। उन्होंने अपने पसंदीदा विशेषज्ञों की एक टीम बनाई और अमेरिकी खुफिया कम्युनिटी पर दबाव डाला कि वे कोरोना की उत्पत्ति को पूरी तरह प्राकृतिक और जानवरों से जुड़ा हुआ बताएं।

इसके लिए फाउची ने एक सुनियोजित ‘सर्कुलर रिपोर्टिंग लूप’ तैयार किया था। वे अपने ही विभाग से फंड पाने वाले वैज्ञानिकों को खुफिया कम्युनिटी को सलाह देने के लिए भेजते थे। इन वैज्ञानिकों की इनपुट के आधार पर आधिकारिक खुफिया आकलन तैयार किए जाते थे। फिर बाद में इसी आकलन को सार्वजनिक रूप से ‘वैज्ञानिक आम सहमति’ बताकर पेश किया जाता था ताकि कोई लैब-लीक थ्योरी पर भरोसा न करे। गबार्ड ने आरोप लगाया कि फाउची ने एक फर्जी रिसर्च पेपर को भी बढ़ावा दिया, जिसे तैयार करवाने में उन्होंने खुद मदद की थी, ताकि खुफिया कम्युनिटी उस पर विचार करे। सीनियर विश्लेषक भी फाउची को एक निष्पक्ष मार्गदर्शक मानकर उनकी बातों में आते रहे और उन विशेषज्ञों को नजरअंदाज कर दिया गया जो फाउची के नैरेटिव से असहमत थे।

संसद में झूठी गवाही और व्हिसलब्लोअर्स को प्रताड़ित करने का आरोप

दस्तावेजों में सबसे गंभीर आरोप डॉक्टर फाउची की ओर से अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में झूठ बोलने को लेकर लगाया गया है। जून 2024 में एक पब्लिक संसदीय सुनवाई के दौरान फाउची से बार-बार पूछा गया था कि क्या उन्होंने महामारी के पहले, उसके दौरान या बाद में कभी भी एफबीआई,सीआईए, डीआईए या किसी अन्य अमेरिकी खुफिया एजेंसी से वायरल रिसर्च को लेकर कोई बात की थी। तब फाउची इन सवालों से बचते दिखे और अंत में झूठ बोलते हुए कहा, ‘मेरी जानकारी में कोविड को लेकर ऐसी कोई बात नहीं हुई।’ लेकिन नए दस्तावेज गवाही देते हैं कि फाउची ने संसद से झूठ बोला था।

तुलसी गबार्ड ने कहा कि सच को छुपाने के लिए डॉ. फाउची ने जो हथकंडे अपनाए, वे सीधे तौर पर ‘डीप स्टेट’ की रणनीति का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी ने लाखों अमेरिकी नागरिकों और दुनिया भर के अनगिनत लोगों को भयानक दर्द और मुश्किलें दी हैं। बरसों के झूठ, सेंसरशिप और सच को दबाने के बाद अब अमेरिकी जनता पारदर्शिता, सच्चाई और जवाबदेही की हकदार है।

दस्तावेजों से यह भी पता चला है कि जिन खुफिया विश्लेषकों ने फाउची के कोरोना ओरिजिन निष्कर्षों को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई, उन्हें डराया-धमकाया गया। कई व्हिसलब्लोअर्स की गवाही के अनुसार, सच का साथ देने वाले अधिकारियों को किनारे लगा दिया गया और उनके करियर को नुकसान पहुंचाया गया। इससे पूरी व्यवस्था में असहमति की आवाज को दबा दिया गया और सबूतों को दफन कर दिया गया। फिलहाल इस पूरे मामले पर डॉ. एंथनी फाउची की तरफ से कोई तत्काल प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

जब कोरोना ने दुनिया को रोका और मची भारी तबाही

गौरतलब है कि साल 2019 के आखिरी महीनों में चीन के वुहान शहर से शुरू हुए इस कोरोना वायरस ने साल 2020 आते-आते पूरी दुनिया में पैर पसार लिए थे। इस महामारी ने वैश्विक स्तर पर ऐसी तबाही मचाई जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। करोड़ों लोग इस वायरस की चपेट में आए और लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। दुनिया भर के देशों को महीनों तक सख्त लॉकडाउन लगाना पड़ा, जिससे ट्रेनें, उड़ानें, फैक्ट्रियां और दफ्तर सब कुछ पूरी तरह ठप हो गए। इस संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी, करोड़ों लोगों के रोजगार छीन लिए और स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह घुटनों पर ला दिया।

इस महासंकट के बीच दुनिया की जीवनशैली और बाजारों में रातों-रात अभूतपूर्व बदलाव आ गए। संक्रमण से बचने के लिए बाजार में एन-95 मास्क, फेस शील्ड, हैंड सैनिटाइजर और डॉक्टरों के लिए पीपीई किट जैसी चीजें अनिवार्य हो गईं, जिनकी पहले आम दिनों में कोई खास मांग नहीं थी। इसके साथ ही पल्स ऑक्सीमीटर और घरेलू सैनिटाइजिंग मशीनें हर घर की जरूरत बन गईं। वायरस से लड़ने के लिए रेमडेसिविर जैसी एंटीवायरल दवाइयों और फिर रिकॉर्ड समय में तैयार हुईं फाइजर, मॉडर्ना और कोविशील्ड जैसी वैक्सीन ने ग्लोबल मार्केट में एंट्री ली, जिससे पूरी दुनिया में एक नया मेडिकल बिजनेस मॉडल खड़ा हो गया।

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