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Explainer:अमेरिका और ईरान के बीच कैसे हुआ समझौता, युद्ध के बाद किसने क्या खोया और किसने क्या पाया? – Us Iran Deal Nuclear Talks Profit And Loss Analysis Explainer

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अमेरिका और ईरान के बीच एक अंतरिम समझौता हुआ है। इस समझौते से दोनों देशों के बीच जारी युद्ध पर फिलहाल रोक लग जाएगी। खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होगा। दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल गया है। दोनों देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दोबारा बातचीत शुरू करेंगे। इस डील से ईरान को तुरंत बड़ा फायदा होगा। वह दुनिया में फिर से अपना तेल बेच सकेगा।

इस समझौते की बड़ी बातें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के वर्साय पैलेस में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैकों के साथ डिनर के दौरान इस पर दस्तखत किए। तेहरान में ईरान के राष्ट्रपतिमसूद पेजेशकियान ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। दोनों देश अब 60 दिनों तक नए सिरे से बातचीत करेंगे। वहीं, अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप साल 2015 के परमाणु समझौते से बेहतर डील करा पाएंगे? इस पुरानी डील को उन्होंने आठ साल पहले खुद रद्द कर दिया था।


जलमार्ग खुलेगा और पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा

युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया था। यह रास्ता ईरान का सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ। दुनिया का 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। रास्ता बंद होने से दुनिया भर में ईंधन, खाना और खाद महंगी हो गई थी। अमेरिका में भी महंगाई (मुद्रास्फीति) बढ़कर 4% हो गई थी। इससे वहां होने वाले मध्यावधि चुनावों में ट्रंप की मुश्किलें बढ़ रही थीं।

अब समझौते के तहत यह रास्ता खुल गया है। अमेरिका भी ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी हटा लेगा। अगले 60 दिनों तक इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह मुफ्त रहेगी। इसके बाद फीस ली जा सकती है। इससे दुनिया भर में गैस और तेल की कीमतें कम होंगी। ईरान ने अमेरिका और इस्राइल के उस प्रयास को विफल कर दिया है, जो उसकी सरकार को गिराने के लिए किया गया था। इस युद्ध के शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता और कई बड़े अधिकारी मारे गए थे।

ईरान को मिला अरबों डॉलर का फायदा

इस समझौते के तहत ट्रंप ने ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को तुरंत हटा दिया है। प्रतिबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, बस कुछ समय के लिए रोके गए हैं। अब ईरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में खुलकर अपना कच्चा तेल बेच सकेगा। इससे उसे अरबों डॉलर की कमाई होगी। पिछले साल ईरान ने तेल बेचकर 45 अरब डॉलर कमाए थे। तब प्रतिबंधों के कारण उसका एकमात्र बड़ा खरीदार सिर्फ चीन था। ईरान को छिपकर अपने टैंकर भेजने पड़ते थे, जिससे उसका मुनाफा कम हो जाता था। अप्रैल से लागू अमेरिकी नाकेबंदी के कारण ईरान का तेल निर्यात पूरी तरह ठप था। अब नए खरीदार मिलने से ईरान को तेल के बेहतर दाम मिलेंगे।

ईरान को भविष्य के लिए क्या मिला?


परमाणु कार्यक्रम पर शर्त: ईरान अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम को पतला करेगा। यह काम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की देखरेख में होगा।

प्रतिबंधों से पूरी मुक्ति का वादा: अगर नया परमाणु समझौता हो जाता है, तो ईरान पर लगे सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे। 2015 के समझौते में केवल परमाणु से जुड़े प्रतिबंध हटे थे, लेकिन आतंकवाद और मानवाधिकार के मुद्दे पर प्रतिबंध जारी थे। इस बार पूरी राहत का वादा है।

पुनर्निर्माण के लिए बड़ा फंड: युद्ध के बाद ईरान को दोबारा खड़ा करने के लिए 300 अरब डॉलर का फंड बनाया जाएगा। ट्रंप ने साफ किया है कि अमेरिका इसमें कोई पैसा नहीं देगा।

फंड कितना बड़ा है? तुलना के लिए समझिए कि 13 साल से युद्ध झेल रहे सीरिया को पुनर्निर्माण के लिए 215 अरब डॉलर की जरूरत है। दो साल से तबाह हो रही गाजा पट्टी को 53 अरब डॉलर की जरूरत है। ईरान को मिलने वाला फंड इनसे बहुत बड़ा है। इसके अलावा विदेशों में फ्रीज यानी जब्त पड़े ईरान के अरबों डॉलर भी वापस किए जाएंगे।

ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में अमेरिका ने सैन्य स्तर पर कुछ रणनीतिक सफलताएं पाईं, लेकिन व्यापक भू-राजनीतिक लक्ष्यों, आर्थिक लागत और रक्षा उपकरणों के मामले में उसे बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ा है।

अमेरिका ने इस युद्ध में क्या पाया ?

ईरानी सेना और नौसेना को भारी नुकसान: अमेरिकी और इस्राइली हवाई हमलों ने ईरान की पारंपरिक नौसेना और वायु सेना को लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। 

मिसाइल भंडार में कमी: रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को कई साल पीछे धकेल दिया गया है और उसके मिसाइल स्टॉक का लगभग एक-तिहाई से आधा हिस्सा तबाह हो गया है।

शीर्ष नेतृत्व का खात्मा: युद्ध की शुरुआत (28 फरवरी 2026) में ही अमेरिका-इस्राइल के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए, जिससे ईरानी शासन को गहरा झटका लगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना: युद्ध के दौरान ईरान ने वैश्विक तेल आपूर्ति के इस सबसे महत्वपूर्ण रास्ते को बंद कर दिया था। नए समझौते के तहत अमेरिका इस नाकेबंदी को हटवाने और व्यापारिक जहाजों के लिए इसे फिर से सुरक्षित खुलवाने में सफल रहा।

अमेरिका ने क्या खोया?

महंगे सैन्य विमानों और हथियारों का नुकसान: अमेरिकी इतिहास में पहली बार F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को युद्ध में क्षति पहुंची। इसके अलावा ईरान के जवाबी हमलों में अमेरिका ने 4 F-15E स्ट्राइक ईगल, रिफ्यूलिंग टैंकर्स (KC-135), एडवांस्ड ड्रोन (MQ-9 रीपर और MQ-4C ट्राइटन) समेत करीब 42 सैन्य विमान खोए या क्षतिग्रस्त करवाए, जिसकी कीमत $2.6 अरब से अधिक है।

भारी आर्थिक बोझ: पेंटागन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस युद्ध पर अमेरिका का सीधा सैन्य खर्च $29 अरब (मई 2026 तक) पहुंच चुका था। वहीं, वैश्विक व्यापार व्यवधानों को मिलाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को करीब $210 अरब का अप्रत्यक्ष नुकसान होने का अनुमान है।

अधूरे रणनीतिक लक्ष्य: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मुख्य उद्देश्य ईरान में ‘शासन परिवर्तन’करना और ईरान समर्थित प्रॉक्सी समूहों, जैसे हिजबुल्ला और हूती को पूरी तरह खत्म करना था। हालांकि, भारी हमलों के बावजूद ईरान का शासन तंत्र (अब खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई के तहत) सुरक्षित बचा रहा और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।

परमाणु कार्यक्रम पर अनिश्चितता: अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह नष्ट करना चाहता था。 लेकिन नए समझौते में इस मुख्य मुद्दे को हल करने के बजाय अगले 60 दिनों की तकनीकी वार्ताओं के लिए टाल दिया गया है, जिससे ईरान के पास अभी भी संवर्धित यूरेनियम का भंडार सुरक्षित है।

प्रतिबंधों में ढील और वित्तीय रियायतें: युद्ध रोकने के बदले अमेरिका को ईरान पर से तेल प्रतिबंधों को हटाना पड़ा है और $25 अरब की फ्रीज की गई ईरानी संपत्ति को भी रिलीज करने पर सहमति देनी पड़ी है। इस वजह से अमेरिकी संसद और विपक्ष में ट्रंप सरकार की आलोचना भी हो रही है।

यह भी पढ़ें: अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध विराम: निर्यातकों में जगी आस, 10 लाख टन का बासमती निर्यात पकड़ेगा रफ्तार

मिसाइल और उग्रवादी गुटों पर कोई बात नहीं

अमेरिका ने युद्ध की शुरुआत में कहा था कि वह ईरान के मिसाइल भंडार को पूरी तरह खत्म कर देगा। वह हिजबुल्ला, हुथी और इराकी मिलिशिया जैसे उग्रवादी गुटों को मिलने वाली ईरानी मदद को रोकना चाहता था। अमेरिकी और इस्राइली हमलों में ईरान के मिसाइल ठिकानों को भारी नुकसान तो हुआ है, लेकिन वह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। ईरान ने पिछले हफ्ते भी इस्राइल पर मिसाइलें दागी थीं। उग्रवादी गुटों पर ईरान का प्रभाव पहले जैसा ही मजबूत है। समझौते के मसौदे में ईरान की मिसाइलों और इन गुटों पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है।


लेबनान का युद्ध बिगाड़ सकता है खेल

समझौते में लेबनान में जारी युद्ध को रोकने की बात कही गई है। लेकिन इस्राइल और हिजबुल्ला इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। ईरान चाहता है कि इस्राइल दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटाए। मगर समझौते में केवल लेबनान की ‘क्षेत्रीय अखंडता’ की बात है, सेना हटाने की स्पष्ट शर्त नहीं है। इस्राइल ने सेना न हटाने की बात कही है और हिजबुल्ला ने लड़ते रहने का संकल्प लिया है। अगर इनके बीच लड़ाई नहीं रुकी, तो अमेरिका-ईरान की यह डील भी टूट सकती है।

अमेरिका और इस्राइल के रिश्तों में खटास

इस्राइल को इस पूरी बातचीत से अलग रखा गया। इस कारण इस्राइल के सभी नेता इस डील को एक बड़ी तबाही मान रहे हैं। वे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बेहद नाराज हैं। राष्ट्रपति ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्ते भी खराब हुए हैं। ट्रंप ने नेतन्याहू को ‘सनकी’ तक कह दिया है। ट्रंप का कहना है कि नेतन्याहू को लेबनान के मामले में अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। नेतन्याहू के लिए आने वाले चुनाव में मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि उन्हें इस्राइल में लोकप्रिय लेबनान सैन्य अभियान को ट्रंप के दबाव में रोकना पड़ सकता है।

अब आगे क्या होगा?

सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम समझौता कैसा होता है। 2015 में ओबामा प्रशासन के समय हुए समझौते में ईरान पर 15 साल के लिए सख्त पाबंदियां लगाई गई थीं। तब ईरान एक निश्चित सीमा से अधिक यूरेनियम को समृद्ध नहीं कर सकता था। उसे केवल 300 किलोग्राम यूरेनियम रखने की इजाजत थी और उसकी सेंट्रीफ्यूज मशीनों को कम कर दिया गया था। उस डील की सबसे बड़ी कमी यह थी कि 15 साल बाद ईरान फिर से परमाणु बम बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ सकता था। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप प्रशासन इस बार ईरान पर अधिक समय के लिए और ज्यादा सख्त पाबंदियां लगवा पाएगा?

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