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संसद का समीकरण:tmc में दरार, Dmk का अलग रास्ता, क्या मानसून सत्र में पास होगा परिसीमन बिल? समझिए पूरा गणित – Dmk Leaving India Alliance Tmc Crisis Delimitation Bill 2026 Monsoon Session Parliament Number Game

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भारतीय राजनीति में अफवाहें और समीकरण बहुत तेजी से बदलते हैं। इस समय दिल्ली से लेकर कोलकाता और चेन्नई तक एक नई चर्चा गर्म है। खबर है कि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद बागी रुख अपना सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ, दक्षिण भारत में विपक्ष का मजबूत चेहरा मानी जाने वाली डीएमके के भी इंडी गठबंधन से अलग होने के कयास लगाए जा रहे हैं।

अगर यह राजनीतिक उलटफेर हकीकत में बदलता है, तो इसका सबसे बड़ा असर आगामी मानसून सत्र पर पड़ेगा। केंद्र सरकार के लिए उस परिसीमन बिल को पास कराने की राह आसान हो जाएगी, जो हाल ही में संसद के भीतर संख्या बल के चक्रव्यूह में फंसकर गिर गया था। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पिछली बार संसद में इस बिल को लेकर क्या हंगामा हुआ था, विपक्षी दलों को क्या आपत्ति थी, पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर क्या स्टैंड लिया था और अब नए समीकरणों से आंकड़े कैसे बदलेंगे?

पिछली बार संसद में क्यों हुआ था भारी हंगामा?

सरकार जब लोकसभा में परिसीमन बिल, 2026 और उससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई थी, तो सदन में भारी गतिरोध पैदा हो गया था। विपक्ष ने इस बिल को एकतरफा और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया था। विपक्षी सांसदों ने सदन के वेल में आकर नारेबाजी की थी। विपक्ष का मुख्य आरोप था कि सरकार बिना व्यापक सहमति के देश का राजनीतिक नक्शा बदलना चाहती है। संख्या बल के मामले में विपक्ष उस समय पूरी तरह एकजुट था। नतीजा यह हुआ कि सरकार विशेष बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े नहीं जुटा पाई और यह महत्वपूर्ण बिल लोकसभा में गिर गया। इसे सरकार के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा गया था।


किसकी क्या आपत्ति थी, सबसे बड़ा विवाद क्या है?

परिसीमन का मतलब होता है देश में आबादी के हिसाब से लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को दोबारा तय करना और सीटों की संख्या को बढ़ाना। इस प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों, खासकर दक्षिण भारत के राज्यों की तीन बड़ी आपत्तियां थीं।

1. दक्षिण भारत को सजा बनाम उत्तर भारत को इनाम!

डीएमके के नेता एमके स्टालिन और अन्य दक्षिण भारतीय नेताओं का सबसे बड़ा विरोध यह था कि उनके राज्यों ने पिछले पांच दशकों में जनसंख्या नियंत्रण पर बहुत शानदार काम किया है। इसके विपरीत, उत्तर भारत के राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में आबादी तेजी से बढ़ी है। अगर सीटों का निर्धारण पूरी तरह से आबादी के आधार पर हुआ, तो उत्तर भारत की लोकसभा सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व आनुपातिक रूप से कम हो जाएगा। विपक्ष ने इसे अच्छा काम करने पर सजा मिलने जैसा बताया।


2. 1971 के फ्रीज को हटाने पर आपत्ति

देश में सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर ही फ्रीज किया गया था। साल 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इस रोक को 2026 तक के लिए बढ़ा दिया था। सरकार अब इसे हटाकर सीटों की संख्या बढ़ाना चाहती है, जिस पर क्षेत्रीय दलों को अपनी राजनीतिक ताकत घटने का डर है।

1971 की जनगणना को ही आधार क्यों माना गया?

इंदिरा गांधी सरकार के दौरान 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा सीटों को 1971 की जनगणना पर फ्रीज किया गया था। इसका एकमात्र उद्देश्य राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित करना था। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो जो राज्य जनसंख्या कम करने में सफल रहे उनकी संसद सीटें कम हो जातीं और जिन्होंने जनसंख्या बढ़ने दी, उन्हें अधिक सीटें मिल जातीं। इसलिए 1971 को बेंचमार्क बनाया गया। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 84वें संविधान संशोधन के जरिए इस रोक को 25 साल के लिए और बढ़ाकर 2026 तक कर दिया था जिससे राज्य बिना राजनीतिक नुकसान के डर के अपनी जनसंख्या नीतियों पर काम जारी रख सकें।

3. वित्तीय और राजनीतिक नुकसान की चिंता

दक्षिण के दलों का कहना है कि संसद में सीटें कम होने से केंद्र सरकार की नीतियों और टैक्स के बंटवारे में उनकी आवाज कमजोर हो जाएगी। हिंदी भाषी राज्य राजनीतिक रूप से पूरे देश पर हावी हो जाएंगे।

इस विवाद पर पीएम मोदी और सरकार का क्या था स्टैंड?

इस पूरे विवाद और हंगामे के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार ने देश के सामने अपनी बात रखी थी। पीएम मोदी ने साफ कहा था कि परिसीमन का उद्देश्य किसी भी राज्य की ताकत को कम करना नहीं है। उन्होंने विपक्ष पर इस मुद्दे को लेकर राजनीति करने और उत्तर-दक्षिण के नाम पर देश को बांटने का आरोप लगाया था। पीएम का तर्क था कि देश की बढ़ती आबादी को सही प्रतिनिधित्व देने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सीटों का विस्तार जरूरी है। नए संसद भवन का निर्माण भी इसी भविष्य की जरूरतों को देखकर किया गया है।

गृह मंत्री अमित शाह का फॉर्मूला

चर्चा के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में पूरा डाटा रखा था। उन्होंने आश्वासन दिया था कि दक्षिण भारत के राज्यों के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। शाह ने ‘50% सीट वृद्धि मॉडल’ का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने की योजना है।

शाह ने बताया था कि इस मॉडल से दक्षिण भारत की मौजूदा 129 सीटें बढ़कर 195 हो जाएंगी। कुल संसद में दक्षिण का हिस्सा लगभग 24 प्रतिशत ही बना रहेगा। सरकार ने यह भी साफ किया था कि परिसीमन आयोग की रिपोर्ट संसद की मंजूरी के बाद ही लागू होगी और यह प्रक्रिया 2029 के चुनावों से पहले संभव नहीं है।


सदन के नए समीकरण: अब कैसे बदल जाएगा आंकड़ा?

लोकसभा में परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए सरकार को विशेष बहुमत की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि सदन में उपस्थित और वोटिंग करने वाले सांसदों का दो-तिहाई समर्थन मिलना जरूरी है। अगर मानसून सत्र से पहले टीएमसी के 20 सांसद टूटते हैं और डीएमके अलग राह पकड़ती है, तो संसद के भीतर दो ही स्थितियां बनेंगी और दोनों ही सरकार के हक में जाएंगी।

रणनीति 1: अगर विपक्षी सांसद सदन से अनुपस्थित रहते हैं

राजनीति में कई बार दल सीधे समर्थन देने के बजाय वोटिंग के समय सदन से वॉकआउट कर जाते हैं या अनुपस्थित हो जाते हैं। मान लीजिए लोकसभा की कुल सीटें 543 हैं। अगर टीएमसी के 20 बागी और डीएमके के सांसद (कुल मिलाकर 40-50 सांसद) वोटिंग में हिस्सा नहीं लेते हैं, तो सदन की प्रभावी संख्या घटकर करीब 490 से 500 के बीच रह जाएगी।

संख्या कम होते ही बहुमत का जादुई आंकड़ा भी नीचे गिर जाएगा। ऐसी स्थिति में सरकार को दो-तिहाई बहुमत साबित करने के लिए जहां पहले 362 वोटों की जरूरत थी, वह घटकर केवल 330 के आसपास रह जाएगी। इस आंकड़े को एनडीए अपने दम पर और कुछ अन्य मित्र दलों की मदद से बहुत आसानी से हासिल कर लेगा।

रणनीति 2: अगर बागी सांसद सरकार के पक्ष में वोट करते हैं

यदि टीएमसी के बागी गुट के 20 सांसद और विपक्षी गठबंधन से नाराज अन्य नेता खुलकर सरकार के बिल का समर्थन कर देते हैं, तो विपक्ष का विरोध पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। सरकार के पास लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगह भारी बहुमत होगा।

भाजपा के लिए क्यों आसान होने वाली है राह?


कमजोर विपक्ष: इंडी गठबंधन का बिखरना विपक्ष के मनोबल को पूरी तरह तोड़ देगा। संसद में सरकार को आक्रामक तरीके से घेरने की उनकी ताकत खत्म हो जाएगी।

क्षेत्रीय दलों पर दबाव: विपक्ष में इतनी बड़ी दरार देखने के बाद वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल और बीआरएस जैसे अन्य न्यूट्रल क्षेत्रीय दल भी सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने से बचेंगे।

भविष्य की राजनीति पर पकड़: परिसीमन बिल पास होने से हिंदी बेल्ट और भाजपा के मजबूत गढ़ों में सीटों की संख्या बढ़ेगी। इससे आने वाले दशकों के लिए भाजपा की राजनीतिक स्थिति देश में और ज्यादा मजबूत हो जाएगी।

यह भी पढ़ें:TMC में दो-फाड़?: काकोली घोष के दावे को कीर्ति आजाद ने बताया फर्जी, बोले- महज 13 सांसद थे, BJP की कहानी झूठी

 

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